उत्तर प्रदेश की झांकी ने कर्तव्य पथ पर बुंदेलखंड की शाश्वत भव्यता और आधुनिक विजन से रचा इतिहास

कर्तव्य पथ पर गणतंत्र दिवस परेड में उत्तर प्रदेश की झांकी, जिसमें कालिंजर किला, एकमुखी शिवलिंग, बुंदेलखंड की शिल्पकला और लोकसंस्कृति का भव्य प्रदर्शन

कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
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उत्तर प्रदेश की झांकी ने देश के 77वें गणतंत्र दिवस पर राजधानी दिल्ली के कर्तव्य पथ पर ऐसा दृश्य रचा, जिसने परंपरा और प्रगति के बीच सेतु का सशक्त संदेश दिया। झांकी में बुंदेलखंड की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिक चेतना और जीवंत लोक परंपराओं को आधुनिक उत्तर प्रदेश के गतिशील विकास मॉडल के साथ इस तरह पिरोया गया कि पूरा देश मंत्रमुग्ध नजर आया।

कर्तव्य पथ पर संस्कृति और आत्मविश्वास का संगम

राजधानी दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड के दौरान जैसे ही उत्तर प्रदेश की झांकी कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ी, दर्शक दीर्घा में मौजूद लोगों की निगाहें उसी पर ठहर गईं। यह झांकी केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि यह उस उत्तर प्रदेश की कहानी कह रही थी, जो अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ा है और साथ ही भविष्य की ओर पूरे आत्मविश्वास के साथ अग्रसर है। बुंदेलखंड की शाश्वत भव्यता को केंद्र में रखकर तैयार की गई इस झांकी ने यह स्पष्ट कर दिया कि प्रदेश की विकास यात्रा उसकी विरासत को साथ लेकर चल रही है, न कि उसे पीछे छोड़कर।

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बुंदेलखंड की आध्यात्मिक चेतना का जीवंत चित्र

झांकी का अग्रभाग बुंदेलखंड की आध्यात्मिक पहचान का प्रतीक था। इसमें कालिंजर के प्रसिद्ध एकमुखी लिंग का प्रभावशाली चित्रण किया गया। यह प्रस्तुति केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं थी, बल्कि यह बुंदेलखंड की सदियों पुरानी आध्यात्मिक चेतना और स्थापत्य कौशल का प्रतिनिधित्व कर रही थी। पत्थर पर उकेरी गई इस मूर्ति ने दर्शकों को उस कालखंड की याद दिलाई, जब कला, आस्था और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक थे।

जीवित शिल्प परंपराओं का प्रभावी प्रदर्शन

झांकी के मध्य भाग में बुंदेलखंड की जीवंत शिल्प परंपराओं को विशेष स्थान दिया गया। मिट्टी के बर्तन, मनके का काम, हस्तशिल्प और स्थानीय हाट के दृश्य यह दर्शा रहे थे कि यह क्षेत्र आज भी अपनी पारंपरिक आजीविकाओं के माध्यम से आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इन शिल्पों को केवल सांस्कृतिक धरोहर के रूप में नहीं, बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण के साधन के रूप में प्रस्तुत किया गया, जो झांकी को एक समकालीन संदर्भ प्रदान करता है।

ओडीओपी योजना से आत्मनिर्भरता की ओर कदम

बुंदेलखंड की शिल्पकला को उत्तर प्रदेश सरकार की ओडीओपी यानी वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट योजना के अंतर्गत पहचान दिलाई गई है। झांकी में इस तथ्य को प्रभावशाली ढंग से उभारा गया कि किस तरह स्थानीय उत्पाद अब वैश्विक बाजार तक अपनी पहुंच बना रहे हैं। यह प्रस्तुति बताती है कि पारंपरिक कारीगरों और शिल्पकारों को सरकारी नीतियों के माध्यम से नई आर्थिक दिशा मिली है, जिससे स्थानीय स्तर पर रोजगार और आत्मनिर्भरता को बल मिला है।

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कालिंजर किला और नीलकंठ महादेव का ऐतिहासिक संदेश

झांकी में कालिंजर किले के नक्काशीदार पत्थर के खंभों और भव्य द्वारों का चित्रण विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। इसके पीछे की ओर नीलकंठ महादेव मंदिर को दर्शाया गया, जो बुंदेलखंड की धार्मिक और ऐतिहासिक परंपरा का प्रतीक है। यह संयोजन इस बात को रेखांकित करता है कि बुंदेलखंड की पहचान केवल युद्ध और किलों तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें आध्यात्मिक गहराई भी समान रूप से मौजूद है।

बुंदेली लोकसंस्कृति के रंगों से सजा कर्तव्य पथ

झांकी के साथ प्रस्तुत किए गए पारंपरिक बुंदेली लोकनृत्य और संगीत ने माहौल को जीवंत बना दिया। लोक कलाकारों की रंगीन वेशभूषा, लयबद्ध कदम और ऊर्जावान प्रस्तुति ने दर्शकों को बुंदेलखंड की सांस्कृतिक आत्मा से जोड़ दिया। भगवान शिव की स्तुति के स्वर वातावरण में गूंजते रहे, जिससे कर्तव्य पथ पर कुछ क्षणों के लिए एक भक्तिमय अनुभूति छा गई।

आधुनिक उत्तर प्रदेश का आत्मविश्वासी स्वरूप

झांकी का पिछला हिस्सा आधुनिक उत्तर प्रदेश के शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक था। किले से प्रेरित वास्तुकला के भीतर एक्सप्रेसवे, औद्योगिक गलियारे, आधुनिक बुनियादी ढांचे और नए जमाने के विनिर्माण के दृश्य दिखाए गए। यह दृश्य स्पष्ट रूप से यह संदेश दे रहे थे कि उत्तर प्रदेश अब केवल अपनी ऐतिहासिक पहचान पर ही गर्व नहीं करता, बल्कि वह आर्थिक और औद्योगिक विकास में भी देश के अग्रणी राज्यों में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है।

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दर्शकों की प्रतिक्रिया और राष्ट्रीय संदेश

उत्तर प्रदेश की झांकी के प्रदर्शन के दौरान कर्तव्य पथ पर मौजूद बड़ी संख्या में लोग खड़े होकर तालियां बजाते नजर आए। कई दर्शक इस ऐतिहासिक प्रस्तुति को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते दिखे। यह प्रतिक्रिया इस बात का प्रमाण थी कि झांकी ने न केवल दृश्यात्मक प्रभाव छोड़ा, बल्कि उसने भावनात्मक और वैचारिक स्तर पर भी लोगों को जोड़ा।

परंपरा और प्रगति का संतुलित संदेश

कुल मिलाकर, उत्तर प्रदेश की झांकी ने यह स्पष्ट कर दिया कि विकास का अर्थ परंपराओं से दूरी बनाना नहीं है। बल्कि, जब सांस्कृतिक जड़ों को मजबूती से थामकर आगे बढ़ा जाए, तो विकास अधिक समावेशी और टिकाऊ बनता है। बुंदेलखंड की शाश्वत भव्यता और आधुनिक उत्तर प्रदेश के विजन का यह संगम गणतंत्र दिवस के अवसर पर देश के सामने एक प्रेरणादायक उदाहरण बनकर उभरा।

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