ट्रैक्टर परेड : लंबित मांगों को लेकर किसानों का संगठित शक्ति प्रदर्शन

संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर गणतंत्र दिवस पर निकली ट्रैक्टर परेड में झंडों के साथ सड़कों पर चलते किसान ट्रैक्टर

मनदीप सिंह की रिपोर्ट

गणतंत्र दिवस के मौके पर किसानों ने ट्रैक्टरों के साथ सड़कों पर उतरकर यह संकेत दिया है कि उनकी समस्याएं केवल काग़ज़ी नहीं, बल्कि ज़मीन से जुड़ी हुई हैं—और अब वे जवाब चाहते हैं।

ट्रैक्टर परेड के ज़रिए रोहतक में किसानों ने एक बार फिर अपनी लंबित मांगों को लेकर सरकार और प्रशासन का ध्यान खींचने की कोशिश की है। गणतंत्र दिवस के अवसर पर संयुक्त किसान संगठनों के आह्वान पर निकाली गई इस परेड को केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि किसानों के असंतोष, धैर्य और लोकतांत्रिक चेतना की अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा रहा है। फसल खरीद की कानूनी गारंटी, फसल खराबे का मुआवजा, बीमा क्लेम और स्मार्ट मीटर योजना जैसे मुद्दे आज भी किसानों के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने वर्षों पहले थे।

संयुक्त किसान मोर्चा के आह्वान पर संगठित किसान प्रदर्शन

गणतंत्र दिवस पर आयोजित ट्रैक्टर परेड संयुक्त किसान संगठनों के साझा मंच संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले निकाली गई। इस परेड में अखिल भारतीय किसान सभा की सक्रिय भूमिका रही। किसान नेताओं का कहना है कि यह प्रदर्शन किसी राजनीतिक एजेंडे से प्रेरित नहीं, बल्कि किसानों के संवैधानिक अधिकारों और आजीविका से जुड़े सवालों को सामने रखने का प्रयास है।

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परेड से पहले किसान सभा के कार्यकर्ताओं ने गांवों में व्यापक जनसंपर्क और जागरूकता अभियान चलाया। इन बैठकों के दौरान किसानों को मौजूदा कृषि नीतियों, लंबित मांगों और आंदोलन के उद्देश्य के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। ग्रामीण स्तर पर हुई इन चर्चाओं से यह स्पष्ट हुआ कि किसानों का असंतोष किसी एक समस्या तक सीमित नहीं, बल्कि यह पूरी कृषि व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।

किसान नेताओं का आरोप: सरकार किसानों की मांगों के प्रति उदासीन

किसान सभा के प्रदेश महासचिव सुमित दलाल ने कहा कि ट्रैक्टर परेड के माध्यम से किसानों की उन मांगों को दोहराया जा रहा है, जिन पर सरकार लंबे समय से कोई ठोस निर्णय नहीं ले पाई है। उनका कहना है कि फसल खरीद की कानूनी गारंटी किसानों की बुनियादी जरूरत है, लेकिन इस पर लगातार चुप्पी साधी जा रही है।

उन्होंने यह भी कहा कि फसल बीमा योजना के तहत बीमा कंपनियों की मनमानी किसानों के लिए एक बड़ी समस्या बन चुकी है। कई मामलों में किसानों को पूरा क्लेम नहीं मिलता, जबकि कहीं प्रक्रिया इतनी जटिल होती है कि किसान थक-हारकर दावा छोड़ देता है। सुमित दलाल के अनुसार, जब तक इन खामियों को दूर नहीं किया जाएगा, तब तक किसानों की आर्थिक सुरक्षा अधूरी ही रहेगी।

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स्मार्ट मीटर योजना पर किसानों का बढ़ता विरोध

ट्रैक्टर परेड के दौरान उठाई गई प्रमुख मांगों में स्मार्ट मीटर योजना की वापसी भी शामिल रही। किसान नेताओं का कहना है कि यह योजना खेती की लागत को और बढ़ा देती है। पहले से ही खाद, बीज और डीज़ल के दामों से परेशान किसान अब बिजली बिल को लेकर भी असमंजस में हैं।

किसान सभा का तर्क है कि यदि सरकार वास्तव में खेती को लाभकारी बनाना चाहती है, तो उसे ऐसी योजनाओं पर पुनर्विचार करना चाहिए जो सीधे तौर पर किसानों पर आर्थिक बोझ डालती हैं। स्मार्ट मीटर को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में फैली आशंकाएं इस विरोध की बड़ी वजह हैं।

खरीफ फसलों के नुकसान का मुआवजा अब भी अधर में

किसान सभा के जिला उपप्रधान प्रीत सिंह ने कहा कि पिछले खरीफ सीजन में किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। प्राकृतिक आपदाओं और मौसम की मार से फसलें बर्बाद हो गईं, लेकिन बड़ी संख्या में किसान आज तक मुआवजे से वंचित हैं।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द ही किसानों के मुआवजे का भुगतान नहीं किया गया, तो किसान सभा जिला प्रशासन के सामने धरना देने को मजबूर होगी। प्रीत सिंह के अनुसार, ट्रैक्टर परेड सरकार के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि किसान अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट नहीं होने वाले।

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अनाज मंडी से दिल्ली बाईपास तक निकली ट्रैक्टर परेड

सुमित दलाल ने जानकारी दी कि ट्रैक्टर परेड की शुरुआत अनाज मंडी से हुई और यह भिवानी चुंगी, पुराना बस स्टैंड, भिवानी स्टैंड, अंबेडकर चौक और मेडिकल मोड़ से होते हुए दिल्ली बाईपास तक निकाली गई। बड़ी संख्या में ट्रैक्टरों और किसानों की मौजूदगी ने पूरे आयोजन को प्रभावशाली बना दिया।

किसान नेताओं ने जिला प्रशासन से अपील की कि परेड के दौरान यातायात व्यवस्था में सहयोग किया जाए, ताकि आम नागरिकों को किसी प्रकार की अनावश्यक परेशानी न हो। उनका कहना है कि यह प्रदर्शन पूरी तरह शांतिपूर्ण और अनुशासित तरीके से किया जा रहा है।

कुल मिलाकर, ट्रैक्टर परेड किसानों की वर्षों से लंबित मांगों की याद दिलाने वाला एक संगठित और लोकतांत्रिक प्रयास है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और प्रशासन इस संदेश को कितनी गंभीरता से लेते हैं और क्या किसानों की समस्याओं का समाधान वास्तव में ज़मीनी स्तर पर हो पाता है या नहीं।

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