मिनी जलियांवाला बाग लालबाग—यह नाम सुनते ही सीतापुर की धरती पर घटित उस ऐतिहासिक क्षण की स्मृति जीवित हो उठती है, जब आज़ादी की चाह में निहत्थे राष्ट्रभक्तों ने ब्रिटिश सत्ता की गोलियों का सामना किया। शहर का ऐतिहासिक मोतीबाग, जिसे आज लालबाग पार्क के नाम से जाना जाता है, केवल एक सार्वजनिक उद्यान नहीं, बल्कि बलिदान, साहस और राष्ट्रभक्ति की अमर गाथा का साक्षी है। 18 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहाँ जो हुआ, उसने सीतापुर को इतिहास के पन्नों में एक विशेष स्थान दिलाया।
लालबाग: जहां तिरंगा हाथ में और कफन सिर पर था
जब देश भर में महात्मा गांधी के आह्वान पर भारत छोड़ो आंदोलन की लहर उठ रही थी, तब सीतापुर का लालबाग भी इस जनांदोलन से अछूता नहीं रहा। निहत्थे राष्ट्रभक्त हाथों में तिरंगा, जुबां पर वंदेमातरम और हृदय में स्वतंत्रता का स्वप्न लिए ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध एकत्र हुए। परंतु साम्राज्यवादी सत्ता ने जनभावनाओं को कुचलने के लिए गोलियों का सहारा लिया। इस बर्बर गोलीकांड में लाल कुल्लूराम, मैकूलाल, चंद्रभाल मिश्र, मुन्नेलाल, बाबूशाह और मोहर्रम अली वीरगति को प्राप्त हुए।
इन छह शहीदों की स्मृति में लालबाग पार्क में शहीद स्मृति स्तंभ स्थापित किया गया, जिस पर उनकी गौरवगाथा उत्कीर्ण है। यह स्थान आज भी सीतापुर के लिए प्रेरणा-स्थल है, परंतु विडंबना यह रही कि इतने वर्षों तक यह बलिदान केवल पत्थरों पर लिखा रहा, साहित्य के पन्नों में इसकी कोई उपस्थिति नहीं थी।
77वें गणतंत्र दिवस पर इतिहास को मिला साहित्यिक स्वर
देश के 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर यह ऐतिहासिक रिक्तता पहली बार भरी गई। वरिष्ठ साहित्यकार रामकृष्ण पांडेय ‘संजय’ ने लालबाग के इस मिनी जलियांवाला बाग कांड को काव्य रूप में पिरोते हुए ‘शहीद अष्टक’ की रचना की। यह काव्य संकलन न केवल एक साहित्यिक उपलब्धि है, बल्कि सीतापुर की ऐतिहासिक चेतना को राष्ट्रीय साहित्य से जोड़ने का प्रयास भी है।
शहीद अष्टक में लालबाग के छह बलिदानियों को आठ छंदों के माध्यम से श्रद्धांजलि दी गई है। प्रत्येक छंद में संघर्ष, बलिदान और राष्ट्रप्रेम की वह ज्वाला दिखाई देती है, जिसने 1942 में आम जन को भी स्वतंत्रता सेनानी बना दिया था।
भारत छोड़ो आंदोलन और लालबाग का रक्तरंजित अध्याय
इस काव्य संकलन में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन का विस्तार से उल्लेख किया गया है। उस दौर में ब्रिटिश प्रशासन किस प्रकार शांतिपूर्ण आंदोलनों को कुचलने के लिए अमानवीय दमन करता था, लालबाग की घटना उसका जीवंत उदाहरण है। निहत्थे नागरिकों पर गोलियां चलाना, केवल सत्ता की क्रूरता नहीं, बल्कि स्वतंत्रता की कीमत को भी दर्शाता है।
रामकृष्ण पांडेय ‘संजय’ के अनुसार, देश में अनेक शहीदों की गौरवगाथाएं साहित्य और इतिहास में दर्ज हैं, किंतु सीतापुर के ये बलिदानी लंबे समय तक उपेक्षित रहे। शहीद अष्टक के माध्यम से यह प्रयास किया गया है कि आने वाली पीढ़ियां इन नामों को केवल स्मारक तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें अपने सांस्कृतिक और वैचारिक उत्तराधिकार का हिस्सा बनाएं।
परमवीर चक्र विजेता कैप्टन मनोज पांडेय को काव्यांजलि
इस काव्य संकलन की एक विशेष उपलब्धि यह भी है कि इसमें सीतापुर के गौरव, परमवीर चक्र विजेता अमर शहीद कैप्टन मनोज पांडेय को भी भावभीनी काव्यांजलि दी गई है। हाल ही में राष्ट्रपति भवन की परमवीर दीर्घा में उनके नाम के शामिल होने से सीतापुर को एक बार फिर राष्ट्रीय गौरव प्राप्त हुआ है।
कवि का मानना है कि कैप्टन मनोज पांडेय का जीवन और बलिदान आज के युवाओं के लिए साहस, अनुशासन और राष्ट्रसेवा का आदर्श है। शहीद अष्टक के माध्यम से उनकी वीरता को काव्यात्मक स्वर देकर युवाओं तक पहुँचाने का प्रयास किया गया है।
डिजिटल लाइब्रेरी के माध्यम से गांव-गांव तक पहुंचेगी गौरवगाथा
इस काव्य संकलन को प्रत्येक ग्राम पंचायत की डिजिटल लाइब्रेरी तक पहुंचाने की योजना बनाई जा रही है। इसका उद्देश्य केवल साहित्य का प्रसार नहीं, बल्कि ग्रामीण अंचलों के युवाओं को अपने क्षेत्र के इतिहास से जोड़ना है। जब युवा यह जानेंगे कि उनके ही जनपद की मिट्टी ने कैसे बलिदानियों को जन्म दिया, तो उनमें स्वाभाविक रूप से राष्ट्रप्रेम और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना विकसित होगी।
शहीद अष्टक, सीतापुर की धरती में जन्मे उन वीरों को समर्पित है, जिन्होंने स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। यह रचना स्मृति और साहित्य के बीच की दूरी को पाटने का एक सशक्त प्रयास है।
स्मृति से साहित्य तक का यह सफर क्यों जरूरी है
इतिहास यदि केवल स्मारकों और सरकारी अभिलेखों तक सीमित रह जाए, तो वह धीरे-धीरे जनस्मृति से विलुप्त होने लगता है। साहित्य ही वह माध्यम है, जो इतिहास को संवेदना देता है, उसे पीढ़ियों तक जीवित रखता है। लालबाग के मिनी जलियांवाला बाग की यह काव्यात्मक प्रस्तुति उसी आवश्यकता की पूर्ति करती है।
शहीद अष्टक न केवल एक काव्य संकलन है, बल्कि यह सीतापुर की सामूहिक चेतना का दस्तावेज भी है—एक ऐसा दस्तावेज, जो बताता है कि स्वतंत्रता केवल बड़े शहरों या नामचीन नेताओं की देन नहीं, बल्कि कस्बों और गांवों की मिट्टी में लहू बनकर भी बहती रही है।










