श्रीकृष्ण संकीर्तन की लय पर नाचते-गाते विदेशी भक्त, तीर्थराज विमलकुंड की परिक्रमा और विमल बिहारी के दर्शन—कामवन में भक्ति का वह दृश्य, जिसने ब्रज की वैश्विक चेतना को एक साथ बाँध दिया।
विदेशी श्रद्धालुओं की ब्रज 84 कोस यात्रा के अंतर्गत इस्कॉन के देशी-विदेशी भक्तों का ऐतिहासिक जत्था जब कामवन पहुँचा, तो पूरे क्षेत्र में भक्ति, उल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत संगम दिखाई दिया। श्रीकृष्ण संकीर्तन के साथ नाचते-गाते विदेशी भक्तों को देखने के लिए स्थानीय श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। परंपरा के अनुरूप सभी भक्तों ने तीर्थराज विमलकुंड की परिक्रमा की, पावन स्नान-आचमन किया और मुख्य मंदिर में श्री विमल बिहारी के दर्शन-पूजन कर ब्रज की अखंड परंपरा में स्वयं को समर्पित किया।
संकीर्तन, परिक्रमा और दर्शन—कामवन में उमड़ा श्रद्धा का सैलाब
कामवन आगमन के साथ ही संकीर्तन की मधुर ध्वनि ने वातावरण को भक्तिमय कर दिया। विदेशी श्रद्धालु न केवल हरिनाम संकीर्तन में लीन दिखे, बल्कि ब्रज की लोकधारा और परंपराओं के प्रति गहरी आस्था भी प्रदर्शित की। विमलकुंड की परिक्रमा के दौरान ‘हरे कृष्ण’ महामंत्र की गूंज से कुंड तट आध्यात्मिक ऊर्जा से भर उठा। स्नान-आचमन के पश्चात विमल बिहारी मंदिर में विधिवत दर्शन-पूजन हुआ, जहाँ सेवायतों द्वारा ब्रज की महिमा का भावपूर्ण वर्णन किया गया।
ब्रज की रज और 84 कोस की अवधारणा—आस्था का भूगोल
श्री विमल बिहारी के सेवायत संजय लवानियां ने ब्रज धाम की महिमा पर प्रकाश डालते हुए बताया कि मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी 84 उंगलियों के आकार में रज ग्रहण की। यही रज 84 कोस—लगभग 252 किलोमीटर—के विस्तार में यमुना नदी के क्षेत्र में फैली हुई है। बिरिजा नदी तथा गोलोक धाम की रज के मिश्रण से इस पावन भूभाग का नाम ‘ब्रज’ पड़ा। यही कारण है कि ब्रज 84 कोस परिक्रमा केवल भौगोलिक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, स्मृति और साधना का समग्र मार्ग है।
12 वन, 24 उपवन और तीर्थों की परंपरा
ब्रज क्षेत्र में 12 वन, 24 उपवन, 20 कुंड तथा असंख्य ग्रामों की समृद्ध परंपरा है। नंदगांव, बरसाना, गोवर्धन, वृंदावन, मथुरा, कामवन, कोसी, राधाकुंड जैसे तीर्थ स्थल ब्रज की आध्यात्मिक पहचान को रेखांकित करते हैं। मान्यता है कि ब्रज के निर्माण के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने गोलोक धाम के वृक्षों, पक्षियों और जीवों से भी ब्रज में अवतरण का अनुरोध किया। इस प्रकार ब्रज ने इस मृत्युलोक में गोलोक धाम से अवतरण लेकर स्वयं को दिव्य धरोहर के रूप में स्थापित किया।
तीर्थराज विमलकुंड—मोक्ष की परंपरा और पुराणों का साक्ष्य
स्कंद पुराण के अनुसार तीर्थराज विमलकुंड में स्नान करने से समस्त पापों से मुक्ति मिलती है। यह भी मान्यता है कि जो व्यक्ति इस कुंड तट पर देह त्याग करता है, उसे श्रीकृष्ण का लोक प्राप्त होता है। यही कारण है कि विमलकुंड केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि मोक्ष-परंपरा का जीवंत प्रतीक है। देश-विदेश से श्रद्धालु वर्षभर यहाँ दर्शन-स्नान के लिए आते हैं और ब्रज की दिव्यता का साक्षात्कार करते हैं।
वैश्विक सहभागिता—कई देशों के भक्त शामिल
इस ब्रज यात्रा में अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, मलेशिया, रूस, श्रीलंका, मालदीव, बांग्लादेश, ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों के विदेशी भक्तजन भाग ले रहे हैं। विभिन्न संस्कृतियों और भाषाओं से आए श्रद्धालुओं का एक ही स्वर में संकीर्तन करना ब्रज की सार्वभौमिक चेतना को रेखांकित करता है। स्थानीय लोगों के लिए यह दृश्य उत्सुकता और गर्व का विषय बना, वहीं विदेशी भक्तों के लिए ब्रज की परंपरा आत्मिक अनुभव में परिवर्तित हो गई।
कामवन—परंपरा, अनुशासन और अतिथि-भाव
कामवन में यात्रा के दौरान अनुशासन, स्वच्छता और परंपरा का विशेष ध्यान रखा गया। सेवायतों और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से दर्शन-परिक्रमा सुचारु रूप से संपन्न हुई। श्रद्धालुओं ने स्थानीय रीति-रिवाजों का सम्मान करते हुए ब्रज की जीवन-शैली को अपनाया। यह अतिथि-भाव और समन्वय ब्रज की पहचान को और सुदृढ़ करता है।
कुल मिलाकर, विदेशी श्रद्धालुओं की ब्रज 84 कोस यात्रा का कामवन आगमन केवल एक धार्मिक पड़ाव नहीं, बल्कि ब्रज की वैश्विक स्वीकृति, सांस्कृतिक संवाद और आध्यात्मिक निरंतरता का प्रमाण है। संकीर्तन, परिक्रमा और दर्शन के इस समन्वय ने यह दिखा दिया कि ब्रज की परंपरा सीमाओं से परे जाकर मानवता को जोड़ती है—यही इसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
