उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर राज्य निर्वाचन आयोग ने अपनी प्रशासनिक तैयारियों को तेज कर दिया है। चुनाव की औपचारिक घोषणा भले ही अभी न हुई हो, लेकिन जमीनी स्तर पर मशीनरी को सक्रिय किया जा चुका है। इसी क्रम में राज्य के विभिन्न जिलों में मतपत्र भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। अनुमान के अनुसार सभी जिलों में लगभग 60 करोड़ मतपत्र भेजे जाने हैं, जो इस बात का संकेत है कि आयोग किसी भी स्थिति में चुनावी ढांचे को तैयार रखने के मूड में है।
मतपत्र वितरण की प्रक्रिया क्यों शुरू हुई पहले
राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकारियों के अनुसार मतपत्रों की छपाई और उनके सुरक्षित परिवहन में लंबा समय लगता है। पंचायत चुनाव में ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और जिला पंचायत—तीनों स्तरों पर अलग-अलग पदों के लिए मतदान होता है, जिससे मतपत्रों की संख्या असाधारण रूप से अधिक हो जाती है। इसी कारण आयोग ने चुनाव की तारीख घोषित होने से पहले ही मतपत्र भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, ताकि समय आने पर कोई प्रशासनिक बाधा न उत्पन्न हो।
मतपत्रों को जिलों तक पहुंचाने के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था, गोपनीय पैकेजिंग और चरणबद्ध लॉजिस्टिक प्लान तैयार किया गया है। यह प्रक्रिया अपने आप में इस बात का प्रमाण है कि आयोग चुनाव कराने के लिए तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर पूरी तरह तैयार रहना चाहता है।
मतदाता पुनरीक्षण : अंतिम सूची 28 मार्च को
पंचायत चुनाव से पहले मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक संवेदनशील और अनिवार्य प्रक्रिया होती है। राज्य निर्वाचन आयोग मतदाता पुनरीक्षण की पहली सूची पहले ही जारी कर चुका है। उस सूची पर प्राप्त दावों और आपत्तियों का निस्तारण वर्तमान में किया जा रहा है। आयोग ने स्पष्ट किया है कि सभी वैध आपत्तियों का परीक्षण कर 28 मार्च को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी।
यह अंतिम सूची पंचायत चुनाव की वैधानिक रीढ़ मानी जाती है, क्योंकि इसी के आधार पर मताधिकार और मतदान केंद्रों की अंतिम संरचना तय होती है। आयोग का दावा है कि सूची तैयार करने में पारदर्शिता और निष्पक्षता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा रही है।
समय पर चुनाव पर क्यों मंडरा रहा है संकट
हालांकि प्रशासनिक तैयारी तेज है, लेकिन पंचायत चुनाव समय पर होंगे या नहीं—इस पर बड़ा सवाल बना हुआ है। इसका मुख्य कारण है समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग (ओबीसी आयोग) का अब तक गठन न होना। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व निर्देशों के अनुसार पंचायत चुनाव से पहले ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए एक समर्पित आयोग का गठन अनिवार्य है।
ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के बिना आरक्षण निर्धारण करना संविधान और न्यायिक आदेशों के खिलाफ माना जाएगा। यही कारण है कि राज्य निर्वाचन आयोग भले ही तकनीकी तैयारी कर रहा हो, लेकिन चुनाव की तिथि घोषित करने से पहले सरकार की ओर देख रहा है।
निर्वाचन आयोग की स्थिति : तैयारी पूरी, फैसला सरकार पर
राज्य निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि उनकी ओर से सभी तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं। जैसे ही समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन होगा और उसकी रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण अधिसूचना जारी होगी, वैसे ही चुनाव कार्यक्रम घोषित कर दिया जाएगा।
आयोग यह भी स्पष्ट कर चुका है कि चुनाव टालना उसकी प्राथमिकता नहीं है, लेकिन संवैधानिक प्रक्रिया की अनदेखी कर चुनाव कराना संभव भी नहीं है।
ओबीसी आयोग गठन को लेकर हाईकोर्ट में पीआईएल
इसी मुद्दे को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई है। स्थानीय अधिवक्ता मोतीलाल यादव द्वारा दायर इस याचिका में राज्य सरकार को पंचायत चुनाव से पहले ओबीसी आयोग के गठन के निर्देश देने की मांग की गई है।
मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने इस याचिका को गंभीर मानते हुए 4 फरवरी को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। याची का तर्क है कि ओबीसी आयोग के बिना चुनाव कराना न केवल असंवैधानिक होगा, बल्कि भविष्य में पूरे चुनाव को कानूनी चुनौती के दायरे में ला सकता है।
आरक्षण और पंचायत लोकतंत्र का संवैधानिक संबंध
त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली भारतीय लोकतंत्र की जड़ मानी जाती है। इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण का स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान है। ओबीसी आरक्षण तय करने के लिए समर्पित आयोग का गठन इसलिए आवश्यक है ताकि “ट्रिपल टेस्ट” की शर्तें पूरी की जा सकें।
यदि इन शर्तों की अनदेखी की जाती है तो चुनाव परिणाम बाद में रद्द किए जा सकते हैं, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासन—दोनों पर गंभीर असर पड़ेगा।
राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव
एक ओर ग्रामीण क्षेत्रों में निर्वाचित प्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है या होने वाला है, वहीं दूसरी ओर चुनाव में देरी को लेकर राजनीतिक दल भी सक्रिय हो गए हैं। विपक्ष इसे सरकार की विफलता बता रहा है, जबकि सत्तापक्ष संवैधानिक प्रक्रिया का हवाला दे रहा है।
इन सबके बीच राज्य निर्वाचन आयोग की भूमिका संतुलन साधने की है—जहां एक तरफ समय पर चुनाव का दबाव है, वहीं दूसरी ओर कानूनी वैधता का प्रश्न भी उतना ही अहम है।
आगे क्या होगा
अब सबकी निगाहें 4 फरवरी को होने वाली हाईकोर्ट की सुनवाई पर टिकी हैं। यदि कोर्ट सरकार को शीघ्र ओबीसी आयोग गठित करने का निर्देश देता है, तो पंचायत चुनाव की राह साफ हो सकती है। अन्यथा चुनाव कार्यक्रम और अधिक लटक सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव की तैयारी किस स्तर तक पहुंच चुकी है?
राज्य निर्वाचन आयोग ने मतदाता पुनरीक्षण, मतपत्र छपाई और जिलों तक मतपत्र भेजने जैसी प्रमुख तैयारियां शुरू कर दी हैं।
कुल कितने मतपत्र भेजे जा रहे हैं?
लगभग 60 करोड़ मतपत्र राज्य के विभिन्न जिलों में भेजे जाने हैं।
पंचायत चुनाव में देरी का मुख्य कारण क्या है?
समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग (ओबीसी आयोग) का गठन न होना सबसे बड़ा कारण है।
ओबीसी आयोग से जुड़ी पीआईएल की सुनवाई कब होगी?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में 4 फरवरी को सुनवाई होगी।
अंतिम मतदाता सूची कब जारी होगी?
राज्य निर्वाचन आयोग 28 मार्च को अंतिम मतदाता सूची जारी करेगा।










