
खुलकर कही अपनी बातें शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार से— यह केवल एक धार्मिक असहमति नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और शासन व्यवस्था के बीच टकराव का वह क्षण है, जहां सवाल सिर्फ अधिकारों का नहीं बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं और नैतिक जिम्मेदारियों का भी है।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और सरकार के बीच माघ मेला एवं संगम स्नान को लेकर उपजा विवाद अब गौ माता, गौ हत्या और राजनीतिक वादों की पूर्ति जैसे गहरे मुद्दों तक पहुंच चुका है।
शंकराचार्य ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वे राजनीति नहीं कर रहे, बल्कि वर्षों से किए गए वादों की स्मृति सरकार को दिला रहे हैं।
गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने की मांग क्यों फिर उठी?
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करना केवल धार्मिक आस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना का विषय है।
उनका आरोप है कि भारतीय जनता पार्टी ने अपने घोषणापत्रों और सार्वजनिक मंचों से गौ माता को राष्ट्र माता बनाने और गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की बात कही थी, लेकिन सत्ता में आने के बाद इस दिशा में ठोस पहल नहीं की गई।
शंकराचार्य ने तीखा सवाल उठाया— जब वादा खुद सरकार ने किया था, तो अब उससे पीछे क्यों हटा जा रहा है?
“अगर गौ हत्या बंद हो जाए, तो मुझे बोलने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी”
बीजेपी की ओर से यह आरोप लगाया जा रहा है कि शंकराचार्य राजनीति से प्रेरित होकर सरकार पर हमला कर रहे हैं।
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए शंकराचार्य ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी दल विशेष को निशाना बनाना नहीं है।
उन्होंने दो टूक कहा कि यदि सरकार वास्तव में गौ हत्या पर सख्त कानून बना दे और उसे ईमानदारी से लागू करे, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से बोलने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी।
उनके अनुसार, सरकार की निष्क्रियता ही उनके वक्तव्यों का कारण है।
माघ मेला प्राधिकरण बनाम शंकराचार्य: अधिकार क्षेत्र पर सवाल
माघ मेला और संगम स्नान को लेकर उपजे विवाद में शंकराचार्य ने मेला प्राधिकरण की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े किए।
उन्होंने पूछा कि क्या मेला प्राधिकरण को यह अधिकार है कि वह शंकराचार्य की मर्यादा, गरिमा और परंपरागत अधिकारों पर प्रश्नचिह्न लगाए।
उनका कहना है कि प्राधिकरण अपने अधिकार क्षेत्र और सीमाओं को भूलकर ऐसे निर्णय ले रहा है, जो न केवल धार्मिक परंपराओं के खिलाफ हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी प्रभावित कर सकते हैं।
सम्मानजनक समाधान की शर्तें: पहले स्नान, फिर संवाद
विवाद के समाधान को लेकर शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे संगम में सम्मानजनक तरीके से स्नान करेंगे, उसके बाद ही शिविर में प्रवेश करेंगे।
उनका मानना है कि आस्था के प्रतीकों के साथ किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं हो सकता।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि समाधान केवल प्रशासनिक आदेशों से नहीं, बल्कि परस्पर सम्मान और संवाद से निकलेगा।
संन्यासियों और मातृशक्ति से क्षमा याचना की मांग
शंकराचार्य ने सरकार से यह भी मांग की कि जिन संन्यासियों, ब्रह्मचारियों और मातृशक्ति के साथ कथित रूप से दुर्व्यवहार हुआ है, उनसे सार्वजनिक रूप से क्षमा याचना की जाए।
उनका कहना है कि सम्मानजनक समाधान में हो रही देरी समझ से परे है और यह देरी ही विवाद को और गहरा कर रही है।
उन्होंने चेतावनी भरे स्वर में कहा कि आस्था से जुड़े प्रश्नों को लंबे समय तक टालना सामाजिक असंतोष को जन्म दे सकता है।
आस्था, राजनीति और शासन: टकराव या अवसर?
यह पूरा विवाद केवल एक शंकराचार्य और सरकार के बीच का टकराव नहीं है।
यह उस व्यापक प्रश्न को सामने लाता है, जहां आस्था, राजनीति और शासन व्यवस्था आमने-सामने खड़ी दिखाई देती हैं।
एक ओर सरकार कानून और व्यवस्था की बात करती है, तो दूसरी ओर धार्मिक नेतृत्व परंपराओं और सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा की मांग करता है।
विश्लेषकों का मानना है कि यदि इस टकराव को संवाद और संवेदनशीलता से नहीं सुलझाया गया, तो इसके दूरगामी सामाजिक और राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।
अंततः, खुलकर कही अपनी बातें शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने सरकार से— यह शीर्षक केवल एक बयान नहीं, बल्कि उस बेचैनी का प्रतीक है, जो धार्मिक समुदायों में पनप रही है।
अब देखना यह होगा कि सरकार इस चुनौती को टकराव के रूप में लेती है या संवाद और समाधान के अवसर के रूप में।
आस्था और शासन के इस संगम पर लिया गया निर्णय न केवल वर्तमान विवाद की दिशा तय करेगा, बल्कि भविष्य की सामाजिक समरसता की नींव भी रखेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरकार से किस मुद्दे पर नाराज हैं?
वे गौ माता को राष्ट्र माता घोषित करने, गौ हत्या पर सख्त कानून और माघ मेला-संगम स्नान में सम्मानजनक व्यवहार की मांग कर रहे हैं।
क्या शंकराचार्य पर राजनीति करने का आरोप सही है?
शंकराचार्य का कहना है कि वे राजनीति नहीं, बल्कि सरकार के पुराने वादों की याद दिला रहे हैं।
माघ मेला प्राधिकरण पर क्या आरोप लगाए गए हैं?
उनका आरोप है कि प्राधिकरण अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर शंकराचार्य की मर्यादा पर सवाल कर रहा है।
विवाद का समाधान कैसे संभव है?
शंकराचार्य के अनुसार सम्मानजनक संवाद, संगम स्नान की अनुमति और क्षमा याचना से समाधान संभव है।










