उमाशंकर पांडे कैसे बने ज्योतिष पीठ के अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती—यह सवाल इन दिनों धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है। प्रयागराज में माघ मेला के दौरान मौनी अमावस्या स्नान को लेकर उपजा विवाद हो या शंकराचार्य पद की वैधता पर चल रहा कानूनी संघर्ष, उमाशंकर पांडे कैसे बने ज्योतिष पीठ के अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की कथा केवल एक व्यक्ति की यात्रा नहीं, बल्कि परंपरा, सत्ता, संत-समाज और राज्य-प्रशासन के जटिल रिश्तों का दस्तावेज़ है।
मौनी अमावस्या विवाद: परंपरा बनाम व्यवस्था
माघ मेला के दौरान संगम तट पर मौनी अमावस्या स्नान के समय स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को स्नान से रोके जाने की घटना ने धार्मिक परंपराओं और प्रशासनिक प्रबंधन के टकराव को उजागर कर दिया। एक ओर करोड़ों श्रद्धालुओं का जनसैलाब था, दूसरी ओर संतों के लिए अलग व्यवस्था और सुरक्षा मानकों की दलीलें। यही टकराव देखते-देखते सोशल मीडिया, राजनीतिक गलियारों और साधु-संतों की बैठकों तक जा पहुंचा।
शंकराचार्य पद की वैधता पर प्रश्न
संत समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी उन्हें शंकराचार्य मानने से इनकार करता है। आरोप है कि गुरु के देहांत के बाद उन्होंने स्वयं को शंकराचार्य घोषित कर लिया। इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है। यह विवाद केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि चार पीठों की परंपरा, उत्तराधिकार और धर्मशास्त्रीय मान्यताओं से जुड़ा है—जिसने उमाशंकर पांडे कैसे बने ज्योतिष पीठ के अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को एक संवेदनशील राष्ट्रीय बहस में बदल दिया।
उमाशंकर पांडे: गांव से संन्यास तक
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के ब्राह्मणपुर गांव में जन्मे उमाशंकर पांडे का प्रारंभिक जीवन साधारण था। गांव में कक्षा छह तक शिक्षा के बाद वे पिता के साथ गुजरात चले गए। यहीं से जीवन की दिशा बदली। काशी प्रवास के दौरान संत रामचैतन्य से भेंट ने उनके भीतर वैराग्य का बीज बोया। धीरे-धीरे सांसारिक आकांक्षाओं से दूरी बनती गई और संन्यास का मार्ग प्रशस्त हुआ।
काशी, संस्कृत और गुरु-परंपरा
काशी में उनका सान्निध्य मिला प्रख्यात संत स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती को। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त करते हुए वे शास्त्र, वेदांत और परंपरागत दर्शन में प्रवीण हुए। गुरु के प्रिय शिष्यों में गिने जाने लगे। यही वह चरण था जहां उमाशंकर पांडे का व्यक्तित्व ‘अविमुक्तेश्वरानंद’ के रूप में आकार लेने लगा।
2022: उत्तराधिकार और विवाद
वर्ष 2022 में गुरु के देहांत के बाद उन्हें ज्योतिष पीठ का शंकराचार्य घोषित किया गया। समर्थकों का कहना है कि यह परंपरा के अनुरूप था, जबकि विरोधियों के अनुसार प्रक्रिया अधूरी और विवादित रही। यही असहमति आज अदालतों से लेकर अखाड़ों तक गूंज रही है।
आंदोलन, अनशन और मुखरता
अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का सार्वजनिक जीवन आंदोलनों से भरा रहा है। 2008 में गंगा स्वच्छता के लिए 112 दिनों का अनशन उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाता है। 2015 में गणेश विसर्जन के दौरान संतों पर लाठीचार्ज में घायल होना, 2018 में काशी कॉरिडोर के विरोध में मुखर भूमिका—ये सभी घटनाएं उनके सख्त रुख को रेखांकित करती हैं।
ज्ञानवापी से प्रयागराज तक
2022 में ज्ञानवापी परिसर में कथित शिवलिंग की पूजा का ऐलान हो या 2026 के माघ मेले में मौनी अमावस्या विवाद—हर प्रसंग में उन्होंने परंपरा की दुहाई दी और प्रशासनिक सीमाओं को चुनौती दी। यही कारण है कि समर्थक उन्हें धर्मरक्षक मानते हैं, जबकि आलोचक टकराव की राजनीति का प्रतीक।
धर्म, राजनीति और सोशल मीडिया
आज का भारत केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि त्वरित संचार और राजनीतिक ध्रुवीकरण का भी देश है। ऐसे में हर बड़ा धार्मिक विवाद तुरंत ट्रेंड बन जाता है। उमाशंकर पांडे कैसे बने ज्योतिष पीठ के अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की कथा भी इसी डिजिटल दौर में नए अर्थ ग्रहण करती है—जहां हर बयान, हर निर्णय राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है।
क्या यह अंत है या नई शुरुआत?
मौनी अमावस्या विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या धार्मिक परंपराएं प्रशासनिक नियमों से ऊपर हैं, या आधुनिक व्यवस्था में संतुलन जरूरी है। अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की भूमिका इस बहस के केंद्र में है। अदालतों के फैसले, संत समाज की सहमति और जनमत—तीनों मिलकर तय करेंगे कि यह यात्रा किस मोड़ पर पहुंचती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
उमाशंकर पांडे कैसे बने ज्योतिष पीठ के अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती?
उन्होंने काशी में गुरु-परंपरा के तहत शिक्षा और दीक्षा प्राप्त की और 2022 में गुरु के देहांत के बाद शंकराचार्य घोषित हुए।
उनके शंकराचार्य पद को लेकर विवाद क्यों है?
कुछ मठ और संत उत्तराधिकार प्रक्रिया को विवादित मानते हैं, इसी कारण मामला न्यायालय में लंबित है।
मौनी अमावस्या विवाद का मुख्य कारण क्या था?
स्नान व्यवस्था, सुरक्षा प्रोटोकॉल और परंपरागत अधिकारों के टकराव ने विवाद को जन्म दिया।








