
भाजपा ने एक बार फिर चेहरा बदला है, राजनीति नहीं। युवा अध्यक्ष, जेन जी का नैरेटिव और सत्ता का पुराना ढांचा— क्या ‘नबीन दौर’ सच में बदलाव है या रणनीतिक निरंतरता?
✍️ लेखक परिचय:
मोहन द्विवेदी शिक्षाविद हैं और वर्तमान में देवरिया के नामचीन विद्यालय के प्रधानाचार्य हैं और समाचार दर्पण के अवैतनिक कार्यकारी संपादक भी हैं। पार्टी संगठन, चुनावी रणनीति और समकालीन सत्ता विमर्श पर उनके लेख राष्ट्रीय राजनीति की गहराई और दस्तावेज़ी समझ के लिए जाने जाते हैं।
भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह केवल चुनाव जीतने वाली पार्टी नहीं, बल्कि सत्ता, संगठन और रणनीति का एक सुव्यवस्थित राजनीतिक तंत्र है। नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन का निर्विरोध चयन इसी तंत्र की स्वाभाविक परिणति है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में भव्य समारोह, 37 नामांकन प्रस्ताव और विरोध का पूर्ण अभाव—यह सब इस बात का संकेत है कि भाजपा में नेतृत्व चयन प्रतिस्पर्धा से नहीं, सहमति के नाम पर शीर्ष निर्णय से तय होता है।
निर्विरोध चयन: परंपरा या केंद्रीकरण?
भाजपा की यह स्थापित परंपरा रही है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम पर कभी आंतरिक चुनाव या चुनौती देखने को नहीं मिली। एक नाम तय होता है और पूरा संगठन उस पर स्वीकृति की मुहर लगा देता है। इसे अनुशासन कहा जाए या केंद्रीकरण—यह दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। लेकिन यह तथ्य निर्विवाद है कि भाजपा में ‘असहमति’ नेतृत्व चयन का हिस्सा नहीं रही है। नितिन नबीन का चयन भी इसी सिलसिले की अगली कड़ी है।
सबसे युवा अध्यक्ष: प्रतीक और संदेश
45 वर्षीय नितिन नबीन भाजपा के अब तक के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। उनसे पहले अमित शाह 49 वर्ष और नितिन गडकरी 52 वर्ष की उम्र में यह जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। उम्र के इस आंकड़े को भाजपा केवल संयोग के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश के रूप में पेश कर रही है। पार्टी यह दिखाना चाहती है कि वह पीढ़ी परिवर्तन के दौर में प्रवेश कर चुकी है और युवा नेतृत्व को आगे बढ़ा रही है।
70% पद युवा चेहरों को: घोषणा या संकेत?
भाजपा संगठन से यह संकेत भी सामने आया है कि आने वाले समय में संगठन के 70 प्रतिशत पद 60 वर्ष से कम उम्र के नेताओं को दिए जाएंगे। यह घोषणा सुनने में आकर्षक है, लेकिन इसका वास्तविक अर्थ सत्ता संरचना में बदलाव से अधिक राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने का प्रयास प्रतीत होता है। नेतृत्व युवा होगा, लेकिन दिशा और निर्णय वही तय करेंगे जो वर्षों से सत्ता के केंद्र में हैं।
‘जेन जी’ राजनीति और आंकड़ों का खेल
भाजपा यह प्रचारित कर रही है कि देश की 65 प्रतिशत आबादी युवा है और पार्टी ‘जेन जी’ की पहली पसंद बन चुकी है। 2024 के लोकसभा चुनावों में 39 प्रतिशत से अधिक युवाओं का समर्थन भाजपा-एनडीए को मिला। राज्य स्तरीय चुनावों में यह आंकड़ा 45–47 प्रतिशत तक पहुंचा। इन आंकड़ों को भाजपा केवल उपलब्धि नहीं, बल्कि भविष्य की वैचारिक रणनीति का आधार बना रही है।
मोदी–शाह की रणनीति और नबीन चयन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति स्पष्ट है—एक ऐसा अध्यक्ष, जो युवा हो, संगठन का अनुभवी हो और किसी विवाद का कारण न बने। नितिन नबीन का चयन इसी संतुलन का परिणाम है। यह चयन अचानक नहीं था; जब नाम सामने आया, तब भी राजनीतिक हलकों में इसे ‘पूर्व निर्धारित’ माना गया।
जनसंघ से भाजपा तक: वैचारिक निरंतरता
भाजपा की स्थापना 6 अप्रैल 1980 को हुई थी और अटल बिहारी वाजपेयी इसके प्रथम राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। लेकिन पार्टी की वैचारिक जड़ें भारतीय जनसंघ में थीं, जिसकी स्थापना 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी। आपातकाल, जनता पार्टी, उसका विघटन और अंततः भाजपा का गठन—यह सब भारतीय राजनीति के संक्रमण का इतिहास है।
सत्ता विस्तार और भविष्य की महत्वाकांक्षा
आज देश के 21 राज्यों में भाजपा-एनडीए की सरकारें हैं और करीब 68 प्रतिशत भूभाग पर उनका शासन है। बिहार चुनाव के बाद भाजपा के 1654 विधायक और एनडीए के 2300 से अधिक विधायक हैं। लक्ष्य साफ है—अगले दो वर्षों में भाजपा अपने विधायकों की संख्या 1800 तक पहुंचाना चाहती है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों को लेकर पार्टी आश्वस्त दिखाई देती है।
सामाजिक विस्तार बनाम वैचारिक कठोरता
भाजपा अब केवल सवर्ण या व्यापारी वर्ग की पार्टी नहीं रही। ओबीसी, दलित, आदिवासी और सीमित संख्या में मुसलमानों का समर्थन भी उसे मिला है। इसके बावजूद पार्टी अपनी दक्षिणपंथी, हिंदूवादी और मंदिरवादी पहचान से पीछे हटने को तैयार नहीं है। मुस्लिम तुष्टिकरण के विरोध की राजनीति से ध्रुवीकरण होता है और भाजपा को चुनावी लाभ मिलता है—भले ही कई बार यह देशहित के विरुद्ध क्यों न हो।
नबीन दौर: बदलाव या वही पुरानी राजनीति?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या ‘नबीन दौर’ वास्तव में बदलाव का संकेत है या केवल निरंतरता का नया नाम। युवा चेहरा, जेन जी का नैरेटिव और संगठनात्मक फेरबदल—यह सब बदलाव का आभास देता है। लेकिन सत्ता का वास्तविक केंद्र, निर्णय प्रक्रिया और वैचारिक दिशा लगभग अपरिवर्तित है।
भाजपा समय के साथ अपने चेहरे बदल सकती है, लेकिन अपनी राजनीति नहीं। नितिन नबीन का अध्यक्ष बनना इसी सत्य का विस्तार है। सवाल यह नहीं कि भाजपा कितनी युवा हो रही है, सवाल यह है कि क्या वह उतनी ही लोकतांत्रिक भी हो रही है। इस प्रश्न का उत्तर भविष्य देगा, लेकिन इतना तय है कि ‘नबीन दौर’ भाजपा की सत्ता-रणनीति का अगला चरण है।
नितिन नबीन का चयन निर्विरोध क्यों हुआ?
भाजपा की परंपरा के अनुसार शीर्ष नेतृत्व एक नाम तय करता है और संगठन उसे स्वीकार करता है।








