हनुमंत कथा के अंतिम दिन आस्था का ऐसा विराट दृश्य सामने आया, जिसने इस आयोजन को
एक ऐतिहासिक धार्मिक महोत्सव के रूप में स्थापित कर दिया। पांच दिवसीय इस कथा के
समापन अवसर पर पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री
के ओजस्वी और भावपूर्ण संबोधन के दौरान जय श्रीराम और जय हनुमान के
गगनभेदी उद्घोषों से पूरा पंडाल भक्तिरस में डूब गया।
पांच दिनों में जनआस्था का महाकुंभ
पांच दिनों तक चली हनुमंत कथा ने जनआस्था के महाकुंभ का स्वरूप ग्रहण कर लिया।
आयोजकों के अनुसार कथा अवधि में 20 से 30 लाख श्रद्धालुओं ने अलग-अलग दिनों में
कथा स्थल पर पहुंचकर श्रवण किया, जबकि समापन दिवस पर ही तीन लाख से अधिक
श्रद्धालुओं की मौजूदगी दर्ज की गई। भगवा ध्वजों, भक्ति संगीत और धार्मिक नारों से
पूरा वातावरण राममय और हनुमानमय नजर आया।
ओजस्वी वक्तव्य और गूंजते जयकारे
समापन अवसर पर पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के संबोधन ने श्रद्धालुओं के भीतर
भावनात्मक ऊर्जा और जोश भर दिया। उन्होंने अपने तीखे वक्तव्य में कहा कि
जो लोग भारत का अन्न खाते हैं और पाकिस्तान की भलाई की बात करते हैं,
वे मानसिक रूप से भूत समान हैं। उन्होंने कहा कि बागेश्वरधाम सरकार
ऐसी कुंठित मानसिकता वाले विचारों को समाज से दूर भगाने का कार्य करती है।
इस बयान के बाद पूरा कथा पंडाल जयकारों से गूंज उठा।
हनुमान भक्ति: शक्ति और श्रीराम कृपा का सेतु
कथा के दौरान हनुमान जी की भक्ति, शक्ति और श्रीराम कृपा के महत्व को
अनेक रोचक प्रसंगों के माध्यम से समझाया गया।
अहिरावण वध की कथा सुनाते हुए पं. शास्त्री ने
हनुमान जी के पंचमुखी स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया और कहा कि
हनुमान भक्ति ही वह शक्ति है, जो भक्त को प्रभु श्रीराम की कृपा तक पहुंचाने
का माध्यम बनती है।
भूत-पिशाच, ऊर्जा और हनुमान चालीसा
भूत-पिशाच के विषय में चर्चा करते हुए उन्होंने इसे
वैज्ञानिक दृष्टि से सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से जोड़कर समझाया।
हनुमान चालीसा की चौपाई—
“भूत-पिशाच निकट नहीं आवै, महावीर जब नाम सुनावै”—
की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा कि जब मन भगवान में समर्पित हो जाता है,
तो नकारात्मक शक्तियां स्वतः ही दूर हो जाती हैं।
माता-पिता और गुरु: जीवन की आधारशिला
कथा के दौरान माता-पिता और गुरु की महिमा पर विशेष बल दिया गया।
पं. शास्त्री ने कहा कि जिसने माता-पिता की डांट और गुरु की कठोर सीख
नहीं पाई, उसका जीवन अधूरा रह जाता है।
संस्कार, अनुशासन और मर्यादा ही जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं।
सनातन सेवा और कन्या विवाह महोत्सव
सनातन धर्म की सेवा को सर्वोच्च कर्तव्य बताते हुए उन्होंने
15 फरवरी को आयोजित होने वाले कन्या विवाह महोत्सव में
श्रद्धालुओं को शामिल होने का आमंत्रण दिया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि श्रद्धालुओं के चढ़ावे से
व्यक्तिगत भवन या मंदिर नहीं, बल्कि गरीब और आदिवासी परिवारों
की बेटियों का घर बसाने का कार्य किया जाता है।
छोटी काशी और छोटी गंगा का भाव
अपने संबोधन के अंत में पं. धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने
इस क्षेत्र को छोटी काशी और केन नदी को छोटी गंगा बताते हुए
इस भूमि की आध्यात्मिक महत्ता को रेखांकित किया।
उन्होंने शीघ्र पुनः आने का भरोसा भी दिया,
जिस पर श्रद्धालुओं ने तालियों और जयकारों के साथ प्रतिक्रिया दी।
समापन दिवस पर यह स्पष्ट हो गया कि हनुमंत कथा
केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना,
भक्ति, संस्कार और सनातन मूल्यों को जनमानस तक
पहुंचाने वाला एक प्रभावशाली मंच बन चुकी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हनुमंत कथा कितने दिनों तक चली?
यह कथा लगातार पांच दिनों तक आयोजित की गई।
समापन दिवस पर कितनी भीड़ रही?
समापन के दिन तीन लाख से अधिक श्रद्धालुओं की मौजूदगी दर्ज की गई।
कथा में मुख्य संदेश क्या रहा?
हनुमान भक्ति, श्रीराम कृपा, संस्कार, सनातन धर्म और सामाजिक सेवा।










