क्या मर्द को दर्द नहीं होता?

मर्दानगी की सामाजिक जकड़न में भावनात्मक पीड़ा झेलता एक पुरुष, जो अपने दर्द को छिपाने को मजबूर है।

क्या मर्द सच में मज़बूत होता है?

वह जो रो नहीं सकता, टूट नहीं सकता, थक नहीं सकता — क्योंकि समाज ने उसे यही सिखाया है।
लेकिन जब भावनाओं पर ताले लगते हैं, तब भीतर क्या मरता है?
यह लेख उसी अनकहे दर्द, उसी घातक चुप्पी और उसी मर्दानगी की जकड़न पर एक ज़रूरी सवाल है।

(मर्दानगी की घातक जकड़न में पुरुष)
— केवल कृष्ण पनगोत्रा

✍ लेखक परिचय

केवल कृष्ण पनगोत्रा सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर गहरी पकड़ रखने वाले लेखक हैं।
उनके लेख पुरुष मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक रूढ़ियों, भावनात्मक दमन और मानवीय संवेदनाओं के
उन पहलुओं को उजागर करते हैं, जिन पर प्रायः खुलकर बात नहीं की जाती।
उनकी लेखनी प्रश्न उठाती है, झकझोरती है और सोचने के लिए मजबूर करती है।

क्या मर्द को दर्द नहीं होता? सामाजिक मान्यताओं की दृष्टि से पुरुष के लिए कुछ प्रतिमान स्थापित कर दिए गए हैं। पुरुष अगर भावनाओं के उद्वेग को रोक नहीं पाए और आँसू छलक उठें, तो अक्सर सवाल उठा दिया जाता है कि मर्द होकर औरतों की तरह आँसू बहा रहे हो? माना कि दैहिक बनावट ने पुरुष को महिला से सशक्त बनाया है, लेकिन मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक दृष्टि के आलोक में मर्द को भी दर्द ज़रूर होता है।

अगर पुरुषों में आत्महत्या की बात करें तो अक्सर निराशा, अवसाद, द्विध्रुवीय विकार, मनोभाजन, शराब की लत या मादक दवाओं का सेवन जैसे मानसिक विकारों को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। इसके अलावा वित्तीय कठिनाइयाँ या पारस्परिक संबंधों में परेशानियाँ भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

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अगर महिलाओं में आत्महत्या की बात करें तो गंभीर अवसाद को एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। एक डेनिश अध्ययन के अनुसार, गंभीर अवसाद महिलाओं में लगभग “दोगुना आम है, और आधे से ज़्यादा आत्महत्याओं का कारण भी यही माना जाता है”, जो महिलाओं में आत्मघाती व्यवहार की बढ़ती दर का संभावित कारण हो सकता है।

आत्महत्या के मामलों में हर दस में से एक महिला अवसाद की शिकार है, लेकिन पुरुषों में आत्महत्या का ग्राफ अधिक है।

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) ने साल 2023 में हुई खुदकुशी को लेकर रिपोर्ट जारी की। इसमें कई अलग-अलग पैटर्न सामने आए। उम्र के लिहाज़ से 30 से 45 वर्ष के लोगों में आत्महत्या की संख्या सबसे अधिक रही। महिलाओं की तुलना में लगभग तीन गुना पुरुषों ने मौत को गले लगाया। पूरी दुनिया में पुरुषों की आत्महत्या की दर, महिलाओं से दोगुनी या उससे भी अधिक है।

आमतौर पर किसी परिवार में यदि कोई मृत्यु हो जाए तो घर के दूसरे वरिष्ठ, ज़िम्मेदार पुरुष सदस्य को यह कहकर भावनाओं पर नियंत्रण रखने को कहा जाता है कि यदि आप रोते रहे तो बाकी छोटे सदस्यों को कौन संभालेगा। इस तरह घर का वरिष्ठ पुरुष सदस्य भावनाओं की जकड़न में जकड़ कर रह जाता है। महिलाएँ तो रो लेती हैं, मगर पुरुष को मानसिक और भावनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यही चुनौतियाँ आगे चलकर शारीरिक अक्षमताओं का कारण भी बन सकती हैं।

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यह सामान्य धारणा है कि पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ अधिक भावुक और संवेदनशील होती हैं। यह भी माना जाता है कि महिलाएँ मानसिक और भावनात्मक रूप से दुर्बल होती हैं, इसलिए महिलाओं में आत्महत्या का अनुपात अधिक होता है। लेकिन आँकड़े इस धारणा से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते।

सदियों से सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से पुरुष को शक्तिशाली, पीड़ाविहीन और भावनारहित माना गया। इस प्रतिमान ने पुरुष से उसकी भावनाओं की अभिव्यक्ति का अधिकार छीन लिया। इन रूढ़ियों के चलते पुरुष को महिलाओं की अपेक्षा एक भावविहीन मनुष्य के रूप में परिभाषित किया गया। परिणामस्वरूप पुरुष वर्ग को पीड़ा, पराजय और परेशानी जैसी भावनाओं को छिपाने के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से बाध्य किया गया।

शायद ही यह समझने की कोशिश की गई कि इन सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं के बीच पुरुष कई बार जीने के बजाय आत्महत्या का रास्ता चुन लेता है। वस्तुतः पुरुष वर्ग ‘पुरुषत्व’ यानी मर्दानगी की घातक जकड़न में कैद है। सांस्कृतिक रूढ़ियों के कारण पुरुषों की भावनात्मक ज़रूरतों की इस हद तक अनदेखी होती है कि वे तनाव, हताशा और निराशा सहन नहीं कर पाते और आत्महत्या जैसा कठोर निर्णय ले लेते हैं।

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विभिन्न शोध और आँकड़े इस सच्चाई की पुष्टि करते हैं।

वैश्विक आँकड़ों के अनुसार पुरुषों में आत्महत्या का अनुपात महिलाओं की तुलना में अधिक है। भारत की ही बात करें तो साल 2021 में 3,14,000 पुरुषों और 74,800 महिलाओं ने आत्महत्या की।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में महिलाओं की आत्महत्या दर 16.4 प्रति 100,000 और पुरुषों की 25.8 प्रति 100,000 है।

समाजशास्त्री रॉब व्हिटली अपनी पुस्तक ‘Men’s Issues and Men’s Health: An Introductory Primer’ में लिखते हैं— यदि पुरुष, पुरुषत्व की घातक जकड़न से मुक्त नहीं होंगे, तो उनके लिए मानसिक सेहत एक बड़ी चुनौती बन जाएगी।

अब पुरुषों की भावनात्मक ज़रूरतों को समझने के प्रयास भी शुरू हो चुके हैं। कहा जा सकता है कि मर्द के दर्द को अब समझा जाने लगा है। ऑस्ट्रेलिया में ‘Men’s Table’ नामक एक मुहिम इसी दिशा में काम कर रही है, जहाँ पुरुषों को अपनी भावनाएँ साझा करने का अवसर मिलता है।

पुरुष के आँसुओं को मर्दानगी का ताना देकर रोकना और उसकी भावनात्मक अभिव्यक्ति का अधिकार छीन लेना मानवता नहीं है। क्यों? क्योंकि मर्द को भी दर्द होता है।

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