रेत खनन पर सवाल, प्रशासन पर दबाव—छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में इन दिनों यही पंक्ति सबसे अधिक चर्चा में है। पचपेड़ी तहसील की तहसीलदार नीलम पिस्दा को लेकर अवैध रेत खनन के आरोप, सोशल मीडिया पर चल रही खबरें, कथित यूट्यूबर पत्रकारों की सक्रियता और प्रशासन की जांच—इन सबके बीच यह सवाल खड़ा हो गया है कि वास्तव में जमीन पर क्या हो रहा है और आरोपों की दिशा किस ओर इशारा कर रही है।
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सामने आया यह प्रकरण केवल रेत खनन से जुड़ा विवाद भर नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक कार्यशैली, मीडिया की भूमिका और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बनते दबाव की जटिल तस्वीर भी पेश करता है। पचपेड़ी तहसील में तैनात तहसीलदार नीलम पिस्दा के खिलाफ कुछ लोगों द्वारा यह दावा किया जा रहा है कि शिवनाथ नदी क्षेत्र में अवैध रेत खनन उनके संरक्षण में संचालित हो रहा है। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर इन दावों की पुष्टि नहीं हुई है।
शिकायतें, कॉल और सोशल मीडिया का दबाव
तहसीलदार नीलम पिस्दा के अनुसार, बीते कुछ समय से स्वयं को पत्रकार बताने वाले कुछ लोग लगातार फोन कॉल के जरिए अवैध रेत खनन की सूचनाएं दे रहे थे। इन सूचनाओं को नजरअंदाज करने के बजाय प्रशासन ने हर बार गंभीरता दिखाई और संबंधित स्थानों पर राजस्व एवं प्रशासनिक टीमों को जांच के लिए भेजा गया। जांच के दौरान किसी भी स्थल पर अवैध खनन की गतिविधि नहीं पाई गई, इसके बावजूद आरोपों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा।
जांच की प्रक्रिया और प्रशासनिक पक्ष
प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, रेत खनन से जुड़े मामलों में किसी भी सूचना पर त्वरित कार्रवाई की जाती है। तहसीलदार ने स्पष्ट किया कि जब-जब शिकायत आई, तत्काल मौके पर टीम भेजी गई। नापजोख, स्थल निरीक्षण और स्थानीय जानकारी के आधार पर जांच पूरी की गई, लेकिन कहीं भी अवैध रेत खनन के प्रमाण नहीं मिले। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो और पोस्ट सामने आए, जिनमें सीधे तौर पर प्रशासनिक संरक्षण के आरोप लगाए गए।
कथित यूट्यूबर पत्रकारों की भूमिका
पूरे मामले में दो नाम विशेष रूप से सामने आए हैं—रूपचंद राय और मिथलेश साहू। तहसीलदार का कहना है कि ये दोनों स्वयं को पत्रकार बताते हुए बार-बार शिकायतें करते रहे। उनकी सूचनाओं पर कई बार जांच कराई गई, लेकिन आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी। इसके बाद भी डिजिटल माध्यमों पर ऐसी सामग्री प्रसारित की गई, जिससे यह आभास होता है कि प्रशासन पर दबाव बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
अन्य रिपोर्टें और स्थानीय चर्चाएं
कुछ स्थानीय मीडिया रिपोर्टों और चर्चाओं में यह भी कहा गया है कि क्षेत्र में अवैध रेत खनन की गतिविधियां किसी अन्य प्रभावशाली स्थानीय संरक्षण में होती रही हैं। इसके बावजूद निशाना सीधे तहसीलदार को बनाया जाना कई सवाल खड़े करता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि सख्त कार्यशैली और नियमों के पालन के कारण कुछ स्वार्थी तत्व असहज हैं और इसी वजह से माहौल तैयार किया जा रहा है।
प्रशासन की स्पष्ट चेतावनी
तहसीलदार नीलम पिस्दा ने यह स्पष्ट किया है कि प्रशासन अवैध रेत खनन को लेकर किसी भी प्रकार की ढिलाई नहीं बरतेगा। यदि भविष्य में कहीं भी नियमों के विरुद्ध खनन पाया जाता है, तो दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी अवैध गतिविधि को संरक्षण देने का प्रश्न ही नहीं उठता।
कानूनी विकल्प और अगला कदम
मामले में लगातार बढ़ रहे दबाव और आरोपों को देखते हुए तहसीलदार ने संकेत दिए हैं कि उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाने और प्रशासनिक कार्य में बाधा उत्पन्न करने वालों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई पर विचार किया जा रहा है। प्रशासनिक जानकारों के अनुसार, यदि आरोप निराधार सिद्ध होते हैं तो कानून के तहत आवश्यक कदम उठाए जा सकते हैं।
उच्च अधिकारियों की निगरानी में प्रकरण
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि यह पूरा मामला उच्च अधिकारियों की निगरानी में है। तथ्यों की निष्पक्ष जांच की जा रही है ताकि न तो किसी दोषी को बचाया जाए और न ही किसी निर्दोष अधिकारी की छवि को नुकसान पहुंचे। यह प्रकरण प्रशासन और मीडिया—दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय बनता जा रहा है।
एक सवाल जो अभी बाकी है
बिलासपुर का यह विवाद कई परतों में बंटा हुआ है—आरोप, जांच, दबाव और जवाब। फिलहाल जांच में अवैध खनन की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सवाल अब भी कायम है कि यह पूरा शोर किस दिशा में जा रहा है और इसके पीछे की वास्तविक मंशा क्या है।
सवाल-जवाब (FAQ)
यह विवाद किससे जुड़ा है?
यह विवाद बिलासपुर जिले में कथित अवैध रेत खनन और तहसीलदार पर लगाए गए आरोपों से जुड़ा है।
प्रशासन की जांच में क्या सामने आया?
अब तक की जांच में किसी भी स्थल पर अवैध रेत खनन की पुष्टि नहीं हुई है।
आगे क्या कार्रवाई संभव है?
यदि अवैध खनन या झूठे आरोपों की पुष्टि होती है, तो संबंधित पक्षों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।










