करही की गौशाला से उठता सवाल : जब संरक्षण नीति लाशों में बदलने लगे

चित्रकूट के मऊ विकासखंड के करही गांव में गौशाला से बाहर नदी किनारे पड़े मृत गौवंश, गौ-संरक्षण नीति की जमीनी विफलता को उजागर करते हुए।


संजय सिंह राणा की रिपोर्ट
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चित्रकूट के मऊ विकासखंड की ग्राम पंचायत करही में नदी किनारे पड़ी गौवंशों की लाशें केवल एक स्थानीय घटना नहीं हैं। वे उस पूरे तंत्र की खामोश गवाही हैं, जिसमें ‘गौ-संरक्षण’ नीति काग़ज़ों पर सुरक्षित है, लेकिन ज़मीन पर उसका अस्तित्व दम तोड़ रहा है। यह संपादकीय उसी विरोधाभास को सामने लाने की कोशिश है—जहां योजनाएँ हैं, बजट हैं, दावे हैं, पर जीवित गौवंश नहीं बच पा रहे।

जब मृत्यु खबर बनती है, जीवन नहीं

अक्सर प्रशासनिक व्यवस्था तभी हरकत में आती है, जब मौतें गिनने लायक हो जाती हैं। करही में भी यही हुआ। गौशाला में भूख, प्यास और बीमारी से गौवंशों के मरने की शिकायतें पहले से थीं, लेकिन वे ‘रूटीन’ मानकर अनसुनी रहीं। मामला तब उभरा, जब नदी किनारे लाशें दिखीं—और तस्वीरों ने चुप्पी तोड़ी।

यह सवाल स्वाभाविक है: क्या किसी व्यवस्था का सक्रिय होना सिर्फ़ मृत्यु के सार्वजनिक हो जाने पर ही निर्भर है?

गौशाला: संरक्षण का केंद्र या उपेक्षा का ठिकाना?

ग्रामीणों के आरोप बताते हैं कि गौशाला में न तो पर्याप्त भूसा है, न संतुलित आहार, न स्वच्छ पानी। जीवित गौवंश प्लास्टिक और कचरा खाने को मजबूर हैं—जो सीधे तौर पर धीमी मौत का रास्ता है।

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यदि यह सच है, तो यह केवल लापरवाही नहीं, बल्कि संस्थागत विफलता है। क्योंकि गौशाला का उद्देश्य ही यही है कि निराश्रित पशु वहां सुरक्षित रहें—न कि वहां जाकर और असहाय हो जाएँ।

मृत्यु के बाद भी अमानवीयता

सबसे गंभीर आरोप यह है कि मौत के बाद शवों को नियमों के अनुसार दफनाने या निस्तारित करने के बजाय ट्रैक्टर से घसीटकर नदी किनारे फेंक दिया गया। यह आचरण न केवल पशु-क्रूरता कानूनों का उल्लंघन है, बल्कि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य के लिए भी खतरा है।

नदी किसी पंचायत की निजी संपत्ति नहीं होती। उसका प्रदूषित होना पूरे क्षेत्र को प्रभावित करता है—खेती, पानी, स्वास्थ्य सब कुछ।

नीतियाँ हैं, निगरानी नहीं

सरकारी दस्तावेज़ बताते हैं कि गौ-संरक्षण के लिए अनुदान, चारा व्यवस्था, पशु चिकित्सा सेवाएँ और निरीक्षण तंत्र मौजूद है। फिर सवाल उठता है—क्या निरीक्षण वास्तव में होते हैं या केवल रिपोर्टों में? क्या आवंटित संसाधन सही जगह पहुँचते हैं? और यदि नहीं, तो जिम्मेदारी किसकी है—पंचायत, विकासखंड, या जिला प्रशासन की?

पंचायत से प्रशासन तक जवाबदेही की कड़ी

ग्राम पंचायत करही की भूमिका इस मामले में केंद्रीय है। गौशाला का संचालन, रख-रखाव और पारदर्शिता पंचायत की जिम्मेदारी है। लेकिन पंचायत अकेली इकाई नहीं। विकासखंड स्तर पर निगरानी और जिला स्तर पर जवाबदेही सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है।

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जब किसी गौशाला में लगातार मौतें हों, तो यह असाधारण स्थिति है—जिस पर त्वरित जांच अनिवार्य होनी चाहिए।

ग्रामीणों का आक्रोश: देर से सुनी गई आवाज़

ग्रामीणों का कहना है कि शिकायतें पहले भी की गईं, लेकिन उन पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया। अब जब मामला सार्वजनिक हुआ, तो उम्मीद जगी है कि शायद इस बार कार्रवाई होगी।

पंचायत व्यवस्था: सबसे निचले पायदान पर सबसे बड़ी जिम्मेदारी

ग्राम पंचायत लोकतंत्र की पहली सीढ़ी है। गौशाला का संचालन पंचायत के अधीन है—लेकिन पंचायत अकेली नहीं। विकासखंड, पशुपालन विभाग और जिला प्रशासन—सभी की भूमिका इसमें जुड़ी हुई है।

जब यह पूरी श्रृंखला निष्क्रिय हो जाती है, तब करही जैसी घटनाएँ जन्म लेती हैं। यहाँ सवाल किसी एक की लापरवाही का नहीं, बल्कि सामूहिक विफलता का है।

यह केवल करही का मामला नहीं

करही की घटना अलग-थलग नहीं है। प्रदेश और देश के कई हिस्सों से समय-समय पर गौशालाओं की बदहाली की खबरें आती रही हैं—कहीं चारे की कमी, कहीं पानी का संकट, कहीं बीमारी, कहीं भ्रष्टाचार।

इसलिए यह प्रश्न व्यापक है: क्या हमने गौ-संरक्षण को नीति तो बना लिया, लेकिन प्रणाली नहीं?

आगे क्या?—सिर्फ़ कार्रवाई नहीं, सुधार

इस प्रकरण में केवल दोषियों पर कार्रवाई कर देना पर्याप्त नहीं होगा। ज़रूरत है—स्वतंत्र और पारदर्शी जांच की, गौशाला प्रबंधन में तात्कालिक सुधार की, नियमित सामाजिक निगरानी की और सबसे महत्वपूर्ण, जवाबदेही तय करने की—ताकि भविष्य में कोई करही दोहराया न जाए।

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लाशों से उठता प्रश्न

नदी किनारे पड़ी गौवंशों की लाशें हमसे कुछ पूछती हैं। वे आरोप नहीं लगातीं, वे भाषण नहीं देतीं—लेकिन उनकी चुप्पी बहुत कुछ कहती है।

अब यह हम पर निर्भर है—प्रशासन, समाज और नीति-निर्माताओं पर—कि हम इस चुप्पी को अस्थायी खबर बनाकर भूल जाते हैं, या इसे स्थायी सुधार की शुरुआत बनाते हैं।

यह करही नहीं, एक पैटर्न है

करही कोई अपवाद नहीं है। देश और प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से समय-समय पर ऐसी खबरें आती रही हैं। इसका अर्थ यह है कि समस्या स्थानीय नहीं, संरचनात्मक है। हमने गौ-संरक्षण को धार्मिक भाव में बाँधा, राजनीतिक भाषणों में सजाया—लेकिन प्रशासनिक अनुशासन में नहीं ढाला। यही सबसे बड़ी विफलता है।

पाठकों के सवाल (FAQ)

क्या करही गौशाला में पहले भी मौतों की शिकायतें थीं?

ग्रामीणों के अनुसार, भूख, बीमारी और अव्यवस्था की शिकायतें पहले भी की गई थीं, लेकिन उन पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई।

मृत गौवंशों के निस्तारण के लिए क्या नियम हैं?

नियमों के अनुसार शवों का सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण अनिवार्य है। नदी किनारे फेंकना कानूनन अपराध है।

इस मामले में जिम्मेदारी किसकी बनती है?

ग्राम पंचायत, विकासखंड प्रशासन, पशुपालन विभाग और जिला प्रशासन—सभी की सामूहिक जवाबदेही बनती है।

चित्रकूट के करही गांव में गौशाला से मृत गौवंशों को नदी किनारे फेंका गया, भूख-प्यास और लापरवाही से हुई मौतें
चित्रकूट जनपद के मऊ विकासखंड स्थित ग्राम पंचायत करही में नदी किनारे पड़े मृत गौवंश—गौशाला में भूसा, पानी और देखरेख की कमी से उजागर होती प्रशासनिक लापरवाही।

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