
गोरखपुर। गोरखपुर महोत्सव के अंतर्गत आयोजित सात दिवसीय पुस्तक मेले का शनिवार को अत्यंत गरिमामय और सांस्कृतिक वैभव से परिपूर्ण समापन हुआ। यह आयोजन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि हिंदी भाषा, भारतीय साहित्य और सांस्कृतिक चेतना के सामूहिक उत्सव का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आया। पुस्तक प्रेमियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, लेखकों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि वैश्विक पटल पर हिंदी का बढ़ता गौरव किसी एक मंच तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के व्यापक वर्गों की साझा आकांक्षा है।
भाषा और मीडिया पर वैचारिक संवाद
समापन समारोह से पूर्व आयोजित वैचारिक संवाद में वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रेस क्लब अध्यक्ष रितेश मिश्रा ने ‘भाषा और मीडिया जगत’ विषय पर अपने विचार रखते हुए हिंदी की अंतर्निहित शक्ति और व्यापक स्वीकार्यता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि एक जीवंत संस्कृति है, जो समय और परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की क्षमता रखती है। उनके अनुसार हिंदी की सबसे बड़ी ताकत इसका लचीलापन और समावेशी चरित्र है, जिसने इसे वैश्विक मंचों पर सम्मानजनक स्थान दिलाया है।
उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आधुनिक मीडिया के चुनौतीपूर्ण दौर में, जब भाषाई सरलीकरण और तात्कालिकता का दबाव बढ़ा है, तब भी हिंदी अपनी सहजता और भावप्रवणता के कारण पाठकों और दर्शकों से गहरा संवाद स्थापित कर रही है। यह स्थिति वैश्विक पटल पर हिंदी का बढ़ता गौरव को ठोस आधार प्रदान करती है, जहां भाषा न केवल सूचना देती है, बल्कि संवेदना और विचार का विस्तार भी करती है।
संचालन की प्रभावशाली भूमिका
कार्यक्रम का सफल और सुस्पष्ट संचालन विकास चंद्र राय द्वारा किया गया। उनकी प्रभावशाली आवाज़, विषय की गहरी समझ और श्रोताओं से संवाद स्थापित करने की क्षमता ने पूरे वैचारिक सत्र को जीवंत बनाए रखा। संचालन की यह दक्षता कार्यक्रम की गंभीरता और गरिमा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण साबित हुई, जिससे श्रोता पूरे समय भावनात्मक और बौद्धिक रूप से जुड़े रहे।
बेसिक शिक्षा परिवार का सामूहिक योगदान
समारोह के अंतिम चरण में पुरस्कार वितरण और समापन संवाद का आयोजन किया गया। इस अवसर पर जिला समन्वयक विवेक जायसवाल ने बेसिक शिक्षा परिवार की ओर से आयोजन को सफल बनाने वाले समस्त शिक्षक साथियों और कार्मिकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक मेला केवल पुस्तकों का संग्रह नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक साहित्यिक चेतना का पुनर्जागरण है।
विवेक जायसवाल ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि इस आयोजन की सफलता उन सभी सहयोगियों की निष्ठा और समर्पण का परिणाम है, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर एक संगठित टीम के रूप में कार्य किया। उनके अनुसार जब समर्पण और सामूहिकता का संगम होता है, तब परिणाम केवल सफल नहीं, बल्कि प्रेरणादायक भी होते हैं—और यही वैश्विक पटल पर हिंदी का बढ़ता गौरव का व्यावहारिक उदाहरण है।
सम्मान समारोह: कर्मठता को सलाम
महोत्सव के विशेष आकर्षण के रूप में उन कर्मठ सहयोगियों को सम्मानित किया गया, जिन्होंने अपनी अथक मेहनत और प्रतिबद्धता से आयोजन को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। जिला समन्वयक विवेक जायसवाल और अमरेंद्र मणि त्रिपाठी ने सभी सहयोगियों को लेखनी, डायरी और स्मृति चिन्ह प्रदान कर उनके योगदान को सार्वजनिक रूप से सराहा।
सम्मानित होने वालों में धीर-गंभीर संतोष राव, ऊर्जावान रिवेश प्रताप सिंह, कर्तव्यनिष्ठ सत्य प्रकाश मिश्रा और तकनीकी दक्षता से सुसज्जित ‘निपुण टीम’ के संदीप, सत्यम, यश और किरण शामिल रहे। इसके अतिरिक्त विभाग के समर्पित सहयोगी अकरम परवेज, वित्तीय प्रबंधन में सजग नवनीत प्रजापति, कुशल वक्ता प्रमोद सिंह, भाषाई कौशल के धनी ज्योतिर्विद प्रभात त्रिपाठी और प्रभावी एंकरिंग के लिए प्रवीण मिश्रा को विशेष रूप से सराहा गया।
विशेष सहयोगियों की सराहना
कार्यक्रम के सफल संचालन और समग्र व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अन्य सहयोगियों—आशुतोष कुमार सिंह, दिनेश उपाध्याय, आलेख शरन, रेखा सिंह, संगीता भास्कर, संजीत कुमार सिंह, वन्दना मल्ल और प्रदीप कुमार—के योगदान की भी मुक्तकंठ से प्रशंसा की गई। इन सभी के प्रयासों ने यह सिद्ध किया कि बड़े आयोजन केवल मंच पर दिखने वालों से नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे कार्यरत समर्पित टीम से सफल होते हैं।
डिजिटल युग में भी किताबों की चमक
पुस्तक मेले के अंतिम दिन उमड़ी भारी भीड़ ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि डिजिटल युग के बावजूद साहित्य और मुद्रित पुस्तकों के प्रति समाज का आकर्षण कम नहीं हुआ है। बच्चों से लेकर वरिष्ठ नागरिकों तक की सहभागिता ने यह साबित किया कि किताबें आज भी विचारों का सबसे सशक्त माध्यम हैं और हिंदी भाषा इस माध्यम के केंद्र में मजबूती से खड़ी है।
यह समापन समारोह केवल एक आयोजन का अंत नहीं, बल्कि एक संदेश था—कि वैश्विक पटल पर हिंदी का बढ़ता गौरव पुस्तकों, संवाद और सांस्कृतिक सहभागिता के माध्यम से निरंतर आगे बढ़ रहा है। आभार प्रदर्शन के साथ ही गोरखपुर महोत्सव के इस साहित्यिक पड़ाव का आधिकारिक समापन हुआ, लेकिन इसके विचार और प्रेरणा लंबे समय तक समाज में गूंजते रहेंगे।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
गोरखपुर पुस्तक मेले का मुख्य उद्देश्य क्या था?
इस पुस्तक मेले का मुख्य उद्देश्य हिंदी भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक चेतना को प्रोत्साहित करना तथा पाठकों को पुस्तकों से जोड़ना था।
इस आयोजन में हिंदी के किस पहलू पर विशेष चर्चा हुई?
आधुनिक मीडिया के दौर में हिंदी की भूमिका, उसकी समावेशी प्रकृति और वैश्विक स्वीकार्यता पर विशेष चर्चा की गई।
क्या डिजिटल युग में भी पुस्तक मेलों की प्रासंगिकता बनी हुई है?
जी हां, इस मेले में उमड़ी भीड़ ने स्पष्ट किया कि डिजिटल युग में भी पुस्तक मेलों और मुद्रित पुस्तकों की प्रासंगिकता बनी हुई है।








