यूपी कोऑपरेटिव बैंक घोटाला एक बार फिर प्रदेश की सहकारी बैंकिंग व्यवस्था की जड़ों तक पहुंचे संकट की कहानी कहता है। गोंडा शाखा में 2021 में सामने आए 21.47 करोड़ रुपये के घोटाले में अब विभागीय कार्रवाई तेज हो गई है। स्पेशल ऑडिट रिपोर्ट के आधार पर बैंक प्रबंधन ने चार अधिकारियों को निलंबित किया है, जबकि 205 खाताधारकों की गहन जांच जारी है। यह मामला केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि वर्षों से सक्रिय एक संगठित सिंडिकेट की परतें खोलता है।
गोंडा। यूपी कोऑपरेटिव बैंक घोटाला मामले में बुधवार को बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई सामने आई। बैंक के महाप्रबंधक कपिल पाठक ने गोंडा शाखा के पूर्व शाखा प्रबंधक पवन कुमार पाल, अजय कुमार, सुशील कुमार गौतम तथा तत्कालीन सहायक कैशियर पवन कुमार को निलंबित कर दिया। विभागीय स्तर पर जांच तेज कर दी गई है और घोटाले की जद में आए 205 खाताधारकों के खातों की सूक्ष्म पड़ताल की जा रही है।
प्रबंधन सूत्रों के अनुसार, यह घोटाला उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव बैंक की शाखा-स्तरीय कार्यप्रणाली में लंबे समय से मौजूद कमजोर कड़ियों का परिणाम है। स्पेशल ऑडिट के बाद दर्ज एफआईआर ने यह स्पष्ट कर दिया कि कैसे नियमों, प्रक्रियाओं और आंतरिक नियंत्रणों को दरकिनार कर वर्षों तक एक ही पैटर्न पर खेल चलता रहा।
घोटाला नहीं, संगठित सिंडिकेट
जांच एजेंसियों का मानना है कि बैंक में उजागर हुआ मामला किसी एक-दो कर्मचारियों की चूक नहीं, बल्कि एक संगठित सिंडिकेट का नतीजा है। ऋण वितरण को कमाई का जरिया बनाया गया और नियमों का पालन केवल फाइलों तक सीमित रहा। दिसंबर 2021 से ही गोंडा शाखा में यह खेल तेज हुआ, जहां पात्रता जांच, आय प्रमाणपत्र, जमानत और फील्ड वेरिफिकेशन जैसे अनिवार्य कदमों को या तो औपचारिक बना दिया गया या पूरी तरह नजरअंदाज किया गया।
फर्जी दस्तावेज, कागजी फाइलें
ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि अधिकांश ऋण फर्जी दस्तावेजों के आधार पर स्वीकृत किए गए। कई मामलों में फाइलें सिर्फ कागजों पर तैयार थीं—न तो वास्तविक आय का सत्यापन हुआ और न ही जमानत की प्रामाणिकता परखी गई। हैरानी की बात यह रही कि जिन खातों में रकम ट्रांसफर की गई, उनका किसी वास्तविक कारोबार या आय से मेल नहीं बैठता था।
205 खाताधारकों की जांच क्यों अहम
घोटाले की परतें खोलने के लिए बैंक ने 205 खाताधारकों को जांच के दायरे में लिया है। इनमें से कई खाते ऐसे पाए गए जिनमें अचानक बड़ी रकम आई और फिर तेजी से निकासी कर ली गई। जांच इस बात पर केंद्रित है कि क्या ये खाते वास्तविक लाभार्थियों के थे या बेनी खातों के जरिए धन की निकासी की गई।
आंतरिक नियंत्रण कैसे फेल हुआ
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आंतरिक ऑडिट, शाखा निरीक्षण और उच्चाधिकारियों की निगरानी के बावजूद यह घोटाला वर्षों तक कैसे चलता रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि सेग्रीगेशन ऑफ ड्यूटी का पालन न होना, एक ही व्यक्ति के पास कई अहम जिम्मेदारियां होना और डिजिटल ट्रेल की नियमित समीक्षा न होना इसकी प्रमुख वजहें रहीं।
स्पेशल ऑडिट और एफआईआर
स्पेशल ऑडिट रिपोर्ट सामने आने के बाद ही एफआईआर दर्ज की गई। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि ऋण स्वीकृति से लेकर भुगतान और वसूली तक हर चरण में नियमों की अनदेखी हुई। इसी आधार पर बैंक प्रबंधन ने सख्त कदम उठाते हुए निलंबन की कार्रवाई की और विभागीय जांच का दायरा बढ़ाया।
जवाबदेही तय होगी?
निलंबन एक प्रारंभिक कदम है, लेकिन असली कसौटी यह होगी कि क्या जवाबदेही तय हो पाएगी। क्या केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी या नीति-निर्माण और निगरानी में चूक करने वालों तक जांच पहुंचेगी—यह सवाल अब भी कायम है।
सहकारी बैंकिंग पर भरोसे की परीक्षा
यह मामला सहकारी बैंकिंग व्यवस्था पर जनता के भरोसे की परीक्षा है। ग्रामीण और छोटे कारोबारियों के लिए सहकारी बैंक जीवनरेखा माने जाते हैं। ऐसे में यूपी कोऑपरेटिव बैंक घोटाला जैसे प्रकरण न केवल वित्तीय नुकसान पहुंचाते हैं, बल्कि व्यवस्था की साख पर भी गहरा आघात करते हैं।
आगे की राह
विशेषज्ञों की राय है कि भविष्य में ऐसे घोटालों से बचने के लिए डिजिटल वेरिफिकेशन, रियल-टाइम मॉनिटरिंग, स्वतंत्र ऑडिट और सख्त दंडात्मक प्रावधानों को लागू करना होगा। साथ ही, शाखा-स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना सुधार अधूरा रहेगा।
सवाल–जवाब (FAQ)
यूपी कोऑपरेटिव बैंक घोटाला क्या है?
गोंडा शाखा में 2021 के दौरान सामने आया 21.47 करोड़ रुपये का ऋण-आधारित घोटाला, जिसमें फर्जी दस्तावेजों पर ऋण स्वीकृत किए गए।
अब तक क्या कार्रवाई हुई है?
चार अधिकारियों को निलंबित किया गया है, विभागीय जांच चल रही है और 205 खाताधारकों के खातों की जांच की जा रही है।
घोटाले की मुख्य वजह क्या रही?
आंतरिक नियंत्रणों की विफलता, फील्ड वेरिफिकेशन की अनदेखी और संगठित सिंडिकेट की सक्रियता।
आगे क्या कदम जरूरी हैं?
डिजिटल निगरानी, स्वतंत्र ऑडिट, जवाबदेही तय करना और सख्त दंडात्मक कार्रवाई।










