थार रेगिस्तान में जल संकट : चरवाहा समुदायों की बदलती ज़िंदगी और ओरान की जीवनरेखा

राजस्थान के थार रेगिस्तान में बकरियों और भेड़ों के झुंड के साथ खड़ा चरवाहा, सूखे और जल संकट के बीच पारंपरिक पशुपालन का दृश्य।
हिमांशु मोदी की रिपोर्ट
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थार रेगिस्तान में जल संकट अब केवल मौसम की कहानी नहीं रह गया है, बल्कि यह पश्चिमी राजस्थान के चरवाहा समुदायों के अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। थार रेगिस्तान में जल संकट ने रायका, कालबेलिया और बंजारा जैसी घुमंतू पशुपालक जनजातियों की सदियों पुरानी जीवनशैली को झकझोर दिया है। जहां कभी मानसून के भरोसे चरागाह हरे-भरे हो जाया करते थे, वहीं अब रेत के टीलों पर फैली सूखी खामोशी भविष्य को लेकर गहरे सवाल खड़े कर रही है।

रेतीले टीलों पर टिके जीवन की कहानी

राजस्थान के बालोतरा क्षेत्र में ढलती शाम के साथ जब सूरज की रोशनी फीकी पड़ने लगती है, तब 56 वर्षीय गोमा राम अपने ऊंटों को चरते हुए निहारते हैं। जानवर धीमी चाल से चलते हैं और पास ही स्थित उथले टंका के आसपास बची-खुची घास चरते हैं। गोमा राम कहते हैं कि पहले पानी की तलाश में मीलों चलना पड़ता था, लेकिन अब कम से कम पास में पानी का इंतज़ाम हो गया है। यह राहत छोटी है, मगर रेगिस्तान में यही जीवन और मृत्यु का अंतर तय करती है।

मानसून का टूटा हुआ चक्र

कई पीढ़ियों तक थार के चरवाहों का जीवन मानसून की लय पर चलता रहा। जून के अंत में बारिश शुरू होते ही घास के मैदान हरे हो जाते थे और पशुपालक अपने ऊंटों, भेड़ों और बकरियों के साथ नए चरागाहों की ओर निकल पड़ते थे। लेकिन अब बारिश का समय अनिश्चित हो गया है। कभी देर से वर्षा होती है, तो कभी महीनों तक बादल दिखाई नहीं देते। लंबे और भीषण होते जा रहे गर्मी के मौसम ने इस प्राकृतिक क्रम को लगभग तोड़ दिया है।

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तापमान और वर्षा के बदलते आंकड़े

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग यानी भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, पिछले तीन दशकों में पश्चिमी राजस्थान का औसत तापमान लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है, जबकि वर्षा में करीब 17 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। बाड़मेर, जैसलमेर और नागौर जैसे जिलों में कई वर्षों तक औसतन केवल 220 से 250 मिलीमीटर बारिश ही हो पाती है, जबकि अच्छी खरीफ फसल के लिए 450 से 700 मिलीमीटर बारिश जरूरी मानी जाती है।

हालांकि वर्ष 2024 में कुछ क्षेत्रों में औसत से अधिक बारिश दर्ज की गई, लेकिन यह वर्षा असमान और तीव्र रही। कभी अचानक तेज़ बारिश और फिर लंबे सूखे अंतराल ने यह स्पष्ट कर दिया कि थार क्षेत्र में मौसम अब पहले जैसा नहीं रहा।

सूखते जल स्रोत और सिमटते चरागाह

बालोतरा के पास असादा गांव के रहने वाले 56 वर्षीय हदमाना राम रायका बताते हैं कि पहले हर कुछ किलोमीटर पर जोहड़ या टंका मिल जाया करता था। अब दूर-दूर तक केवल रेत दिखाई देती है। कम वर्षा के कारण पारंपरिक जल प्रणालियों को पुनर्जीवित करना कठिन होता जा रहा है और चरागाह लगातार सिकुड़ रहे हैं। यही वजह है कि चरवाहों को अपने जीवन और आजीविका पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

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पारंपरिक जल प्रणालियों की वापसी

बाड़मेर जिले के बायतु ब्लॉक में हालात से निपटने के लिए समुदाय ने पुराने तरीकों की ओर लौटना शुरू किया है। स्वयं सहायता समूहों, विशेषकर महिलाओं के नेतृत्व में, टंका और जोहड़ जैसी पारंपरिक जल संरचनाओं की मरम्मत की जा रही है। पिछले दो वर्षों में यहां 250 से अधिक टंका और जोहड़ फिर से उपयोग में लाए गए हैं। जब कुएं सूख जाते हैं, तब यही संरचनाएं पशुओं के लिए पानी का एकमात्र सहारा बनती हैं।

स्थानीय महिला समूह की अगुवाई करने वाली तारा देवी बताती हैं कि गांव के पास चार कुंडों की मरम्मत से जानवरों को अब दूर नहीं जाना पड़ता। इससे न केवल समय बचा है, बल्कि महिलाओं पर पड़ने वाला श्रम भी कम हुआ है।

ओरान: रेगिस्तान की अनदेखी जीवनरेखा

थार में पशुपालन के लिए पानी के साथ-साथ चरागाह भी उतने ही आवश्यक हैं। जब खेत सूख जाते हैं, तब चरवाहे ओरान नामक पवित्र वन क्षेत्रों की ओर रुख करते हैं। राजस्थान में लगभग 25 हजार ओरान वन हैं, जो करीब छह लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैले हुए हैं। ये सामुदायिक वन न केवल चारे का स्रोत हैं, बल्कि पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में भी अहम भूमिका निभाते हैं।

तापरा गांव के रायका समुदाय से देवराम कहते हैं कि सूखे के समय ओरान ही उनके पशुओं को जीवन देता है। जैसलमेर के पोकरण क्षेत्र के सूत्रराम बताते हैं कि ओरान केवल जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति और अस्तित्व का आधार हैं।

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वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पर्यावरणीय महत्व

पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार, ओरान पारिस्थितिक आश्रय स्थलों की तरह काम करते हैं। राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय के पर्यावरण वैज्ञानिक लक्ष्मीकांत शर्मा का कहना है कि जब आसपास का भूभाग पूरी तरह सूख जाता है, तब ओरान ही वह स्थान होते हैं जहां जानवरों को छाया, चारा और नमी मिलती है। पेड़ जमीन में नमी बनाए रखते हैं और सूखे के दौरान भी घास को जीवित रहने में मदद करते हैं।

भविष्य की राह: अनुकूलन या पलायन

चरवाहा समुदायों का मानना है कि उनका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वे पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक सहयोग को कितनी मजबूती से जोड़ पाते हैं। यदि टंका, जोहड़ और ओरान जैसी प्रणालियों को संरक्षित किया गया, तो थार में जीवन संभव है। लेकिन यदि ये जीवनरेखाएं खत्म हुईं, तो पलायन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

थार रेगिस्तान में जल संकट क्यों बढ़ रहा है?

तापमान में वृद्धि, अनियमित मानसून और पारंपरिक जल स्रोतों के नष्ट होने से जल संकट बढ़ रहा है।

टंका और जोहड़ क्या हैं?

ये वर्षा जल संचयन की पारंपरिक भूमिगत संरचनाएं हैं, जो सूखे के समय जीवनरेखा बनती हैं।

ओरान वनों का क्या महत्व है?

ओरान पशुओं के लिए चारा, छाया और पर्यावरणीय संतुलन प्रदान करते हैं।

क्या पारंपरिक प्रणालियों से समाधान संभव है?

हां, यदि इन्हें सामुदायिक भागीदारी और सरकारी सहयोग से पुनर्जीवित किया जाए।



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