इरफान अली लारी की रिपोर्ट
बिहार बॉर्डर से सटे उत्तर प्रदेश के सीमांत इलाके आज भी उस स्वास्थ्य व्यवस्था के भरोसे जी रहे हैं, जो कागज़ों में मौजूद है लेकिन ज़मीन पर अधूरी और असहाय दिखाई देती है।
भाटपार रानी इसका सबसे जीवंत उदाहरण है, जहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र धीरे-धीरे इलाज का केंद्र न रहकर
एक स्थायी रेफरल स्टेशन में तब्दील हो चुका है।
यह समस्या केवल किसी एक कस्बे या एक स्वास्थ्य केंद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि देवरिया जिले से लेकर बिहार सीमा से लगे अधिकांश इलाकों की साझा पीड़ा बन चुकी है। यह रिपोर्ट उन्हीं सीमांत क्षेत्रों की स्वास्थ्य हकीकत को दस्तावेज़ी रूप में सामने रखने का प्रयास है।
कागज़ों में सुविधा, ज़मीनी हकीकत में संकट
भाटपार रानी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रतिदिन औसतन 150 से 160 मरीज पहुँचते हैं। कागज़ों में यहाँ दो चिकित्सक, एक फार्मासिस्ट, टीवी सेंटर और इमरजेंसी व्यवस्था दर्ज है। लेकिन जब मरीज को एक्स-रे, पैथोलॉजी जांच या किसी गंभीर बीमारी की पुष्टि की ज़रूरत होती है, तो व्यवस्था अचानक ठहर जाती है।
महीनों से बंद पड़ा डिजिटल एक्स-रे इस केंद्र की सबसे बड़ी विफलता बन चुका है। परिणामस्वरूप, हड्डी टूटने, छाती में गंभीर चोट या अंदरूनी रक्तस्राव की आशंका वाले मरीजों को बिना प्राथमिक जांच के ही जिला अस्पताल या मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया जाता है।
रेफरल संस्कृति बनता जा रहा इलाज
स्थानीय मरीजों का कहना है कि पीएचसी अब इलाज की जगह केवल एक औपचारिक पड़ाव बन गया है। यहाँ डॉक्टर मरीज देखते हैं, पर्ची लिखते हैं और गंभीर लगते ही रेफर कर देते हैं। इलाज की यह शैली न केवल मरीजों की तकलीफ़ बढ़ाती है, बल्कि उनके आर्थिक बोझ को भी कई गुना कर देती है।
ग्रामीण परिवारों के लिए प्राइवेट जांच केंद्रों पर जाना,
फिर वहाँ से जिला अस्पताल पहुँचना, और अंततः मेडिकल कॉलेज में भर्ती होना—यह पूरा चक्र अक्सर कर्ज़ और मानसिक तनाव में बदल जाता है।
हादसों में सबसे ज़्यादा उजागर होती खामियाँ
सीमांत इलाकों में सड़क दुर्घटनाएँ और खेत-खलिहानों में होने वाले हादसे आम हैं। लेकिन भाटपार रानी जैसे केंद्रों पर न तो हड्डी रोग विशेषज्ञ हैं, न ही सर्जन। इमरजेंसी के नाम पर केवल प्राथमिक उपचार देकर मरीज को तुरंत रेफर कर दिया जाता है।
कई मामलों में यह देरी जानलेवा साबित होती है। यह सवाल लगातार उठता है कि बिना विशेषज्ञ और जांच सुविधाओं के इमरजेंसी व्यवस्था आखिर कितनी प्रभावी हो सकती है?
अन्य सीमांत इलाकों से तुलना
यदि देवरिया जिले के अन्य सीमावर्ती क्षेत्रों की बात करें, तो तस्वीर लगभग समान दिखाई देती है। कहीं मशीनें हैं लेकिन स्टाफ नहीं, कहीं भवन नए हैं लेकिन उपकरण खराब पड़े हैं, तो कहीं डॉक्टरों की भारी कमी है।
इसके उलट, जिला मुख्यालयों पर स्थित अस्पतालों में विशेषज्ञ, जांच सुविधाएँ और संसाधन अपेक्षाकृत बेहतर हैं। लेकिन दूरी और परिवहन की समस्या के कारण
सीमांत गाँवों के मरीजों के लिए वहाँ तक पहुँचना आसान नहीं।
जनसंख्या दबाव और सीमा की चुनौती
बिहार सीमा से सटे होने के कारण भाटपार रानी जैसे केंद्रों पर आसपास के इलाकों से भी मरीज पहुँचते हैं।इससे मरीजों की संख्या बढ़ती है, लेकिन संसाधन उसी अनुपात में नहीं बढ़ते। डॉक्टरों पर काम का दबाव बढ़ता है, हर मरीज को पर्याप्त समय नहीं मिल पाता, और रेफरल की संख्या लगातार बढ़ती जाती है।
नीतियाँ, घोषणाएँ और ज़मीनी सच्चाई
सरकारी घोषणाओं में सस्ती और सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं की बात होती है, लेकिन सीमांत इलाकों की वास्तविकता इन दावों से मेल नहीं खाती। यदि डिजिटल एक्स-रे जैसी बुनियादी सुविधा महीनों तक बंद रह सकती है, तो निगरानी और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह रिपोर्ट केवल शिकायत नहीं, बल्कि एक चेतावनी भी है कि यदि समय रहते सीमांत इलाकों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो स्वास्थ्य असमानता और गहरी होती चली जाएगी।
इलाज नहीं, इंतज़ार की कहानी
भाटपार रानी और ऐसे तमाम सीमांत क्षेत्रों की कहानी यही कहती है कि स्वास्थ्य व्यवस्था केवल इमारत से नहीं चलती। उसके लिए निरंतर निगरानी, संसाधन और प्रशासनिक इच्छाशक्ति ज़रूरी है।
जब तक यह समझ विकसित नहीं होगी, तब तक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र इलाज नहीं बल्कि इंतज़ार और रेफरल का प्रतीक बने रहेंगे।
पाठकों के सवाल (FAQ)
भाटपार रानी पीएचसी में सबसे बड़ी समस्या क्या है?
सबसे बड़ी समस्या जांच सुविधाओं की कमी है, विशेष रूप से डिजिटल एक्स-रे का लंबे समय से बंद रहना।
मरीजों को बार-बार रेफर क्यों किया जाता है?
विशेषज्ञ डॉक्टरों, सर्जन और आधुनिक जांच उपकरणों की अनुपलब्धता के कारण।
क्या यह समस्या सिर्फ भाटपार रानी तक सीमित है?
नहीं, देवरिया जिले के अधिकांश सीमांत इलाकों में यही स्थिति देखने को मिलती है।

इसका सबसे ज़्यादा असर किन पर पड़ता है?
गरीब और ग्रामीण परिवारों पर, जिन्हें इलाज के लिए लंबी दूरी और ज़्यादा खर्च उठाना पड़ता है।
ख़बरें तब बोलती हैं, जब लेखक ख़ुद को पीछे हटा ले
और सच को सामने आने दे।— समाचार दर्पण









