✍️ हिमांशु मोदी की रिपोर्ट
भरतपुर। राजस्थान की चिकित्सा व्यवस्था के लिए यह खुलासा केवल एक प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, बल्कि आम जनता के जीवन और भरोसे से जुड़ा एक गंभीर संकट बनकर सामने आया है। विदेश से एमबीबीएस की डिग्री लेकर भारत में अनिवार्य Foreign Medical Graduate Examination (FMGE) में असफल होने के बावजूद फर्जी प्रमाणपत्रों के सहारे सरकारी अस्पतालों तक पहुँच बनाने वाले डॉक्टरों के खिलाफ Special Operation Group (SOG) ने अब तक की सबसे व्यापक जांच शुरू कर दी है।
सूत्रों के अनुसार, इस समय राजस्थान में 8 हजार से अधिक डॉक्टर एसओजी की निगरानी में हैं। ये वे चिकित्सक हैं जिनकी डिग्री, रजिस्ट्रेशन, इंटर्नशिप और मेडिकल काउंसिल से मिली अनुमति की प्रक्रिया संदेह के घेरे में है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस पूरे फर्जीवाड़े में केवल निजी स्तर पर ही नहीं, बल्कि अनुमति देने वाली संस्थाओं के भीतर बैठे कुछ जिम्मेदार अफसरों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है।
4 दिसंबर 2025 की गिरफ्तारी ने खोला पूरा जाल
इस मामले की परतें 4 दिसंबर 2025 को तब खुलनी शुरू हुईं, जब एसओजी ने तीन डॉक्टरों—डॉ. पियूष कुमार त्रिवेदी, डॉ. देवेंद्र गुर्जर और डॉ. शुभम गुर्जर—को गिरफ्तार किया। तीनों ने विदेश से मेडिकल की पढ़ाई तो की थी, लेकिन भारत में चिकित्सक के रूप में प्रैक्टिस के लिए जरूरी एफएमजीई परीक्षा वे पास नहीं कर पाए थे।
जांच में सामने आया कि परीक्षा में असफल होने के बाद इन डॉक्टरों ने 16-16 लाख रुपये की मोटी रकम देकर फर्जी एफएमजीई प्रमाणपत्र हासिल किए। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर उन्होंने न केवल रजिस्ट्रेशन कराया, बल्कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इंटर्नशिप की अनुमति भी प्राप्त कर ली।
सरकारी मेडिकल कॉलेज भी सवालों के घेरे में
जांच के अनुसार, डॉ. पियूष त्रिवेदी ने करौली के राजकीय मेडिकल कॉलेज में, डॉ. शुभम गुर्जर ने अलवर स्थित राजीव गांधी हॉस्पिटल में और डॉ. देवेंद्र गुर्जर ने दौसा के राजकीय मेडिकल कॉलेज में अपनी इंटर्नशिप पूरी की। यह तथ्य अपने आप में कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है—क्या इंटर्नशिप से पहले दस्तावेजों का समुचित सत्यापन हुआ था? और यदि हुआ था, तो फर्जी प्रमाणपत्र कैसे मान्य हो गए?
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी मेडिकल कॉलेजों में इंटर्नशिप केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं होती, बल्कि यह वह चरण है जहाँ एक डॉक्टर को सीधे मरीजों से जुड़कर काम करना होता है। ऐसे में अयोग्य या अप्रमाणित डॉक्टरों का इस सिस्टम में प्रवेश मरीजों की सुरक्षा के लिए घातक साबित हो सकता है।
राजस्थान मेडिकल काउंसिल की भूमिका पर सवाल
इस पूरे मामले में Rajasthan Medical Council की भूमिका भी जांच के दायरे में आ गई है। जिन डॉक्टरों को रजिस्ट्रेशन और प्रैक्टिस की अनुमति दी गई, उनके दस्तावेजों की वैधता पर अब गंभीर संदेह जताया जा रहा है। एसओजी सूत्रों के मुताबिक, काउंसिल के कुछ अफसरों ने या तो लापरवाही बरती या फिर जानबूझकर आंखें मूंद लीं।
यह सवाल अब केवल फर्जी डॉक्टरों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उस पूरी प्रणाली पर खड़ा हो गया है जो ऐसे मामलों को रोकने के लिए बनाई गई थी। यदि नियामक संस्थाएं ही अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहती हैं, तो आम नागरिक किस पर भरोसा करे?
नेशनल मेडिकल काउंसिल की अनुमति कैसे मिली?
फर्जी एफएमजीई सर्टिफिकेट के आधार पर इन डॉक्टरों को National Medical Commission से इंटर्नशिप की अनुमति भी मिल गई। यह तथ्य जांच एजेंसियों के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है। अब सवाल यह है कि क्या फर्जीवाड़ा केवल राज्य स्तर तक सीमित था, या इसके तार राष्ट्रीय स्तर तक जुड़े हुए हैं?
एसओजी ने संकेत दिए हैं कि आने वाले दिनों में इस मामले में कई और गिरफ्तारियां हो सकती हैं। जांच का दायरा लगातार बढ़ाया जा रहा है और अब उन सभी डॉक्टरों का रिकॉर्ड खंगाला जा रहा है जिन्होंने विदेश से मेडिकल की पढ़ाई की है।
मरीजों की जान से खिलवाड़
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल कानूनी या प्रशासनिक नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक संकट भी है। एक फर्जी डॉक्टर द्वारा की गई एक भी गलत चिकित्सा किसी की जान ले सकती है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अब तक इन डॉक्टरों ने कितने मरीजों का इलाज किया और उसका परिणाम क्या रहा।
राजस्थान जैसे बड़े राज्य में यदि हजारों डॉक्टरों की योग्यता पर सवाल खड़े हो जाएं, तो यह पूरी स्वास्थ्य प्रणाली के लिए चेतावनी है। एसओजी की यह जांच भविष्य में चिकित्सा क्षेत्र में पारदर्शिता और सख्ती की दिशा तय कर सकती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
FMGE परीक्षा क्या है और क्यों जरूरी है?
FMGE एक अनिवार्य परीक्षा है, जिसे विदेश से मेडिकल की पढ़ाई कर भारत लौटने वाले छात्रों को पास करना होता है। इसके बिना भारत में डॉक्टर के रूप में प्रैक्टिस की अनुमति नहीं मिलती।
इस मामले में कितने डॉक्टर जांच के दायरे में हैं?
एसओजी के अनुसार फिलहाल राजस्थान में 8 हजार से ज्यादा डॉक्टरों के रिकॉर्ड की जांच की जा रही है।
क्या आम मरीज यह पहचान सकता है कि डॉक्टर फर्जी है या नहीं?
आमतौर पर यह मुश्किल होता है, लेकिन मरीज मेडिकल काउंसिल के ऑनलाइन रजिस्टर में डॉक्टर का रजिस्ट्रेशन नंबर जांच सकते हैं।
आगे क्या कार्रवाई हो सकती है?
जांच के आधार पर रजिस्ट्रेशन रद्द होने, गिरफ्तारियों और संबंधित अधिकारियों पर भी कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।









