इरफान लारी की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश प्रशासन में समाधान दिवस को नागरिकों और शासन के बीच एक सीधा संवाद मंच माना जाता है। उद्देश्य स्पष्ट है—जनसमस्याओं को सुनना, मौके पर समाधान करना और जिन मामलों में तत्काल निस्तारण संभव न हो, उन्हें जिम्मेदार अधिकारियों के पास भेजकर समयबद्ध हल सुनिश्चित करना।
लेकिन सवाल यह है कि क्या समाधान दिवस वास्तव में समाधान दे पा रहा है, या वह केवल एक प्रशासनिक रस्म बनकर रह गया है? देवरिया जिले में बीते वर्षों के समाधान दिवसों के उपलब्ध सार्वजनिक आँकड़ों और मीडिया रिपोर्टों का विश्लेषण यही बताने की कोशिश करता है।
जनवरी 2026 : जब 103 शिकायतें आईं, लेकिन समाधान 22 का ही हो सका
जनवरी 2026 में जिले की कोतवाली स्तर पर आयोजित थाना-समाधान दिवस में कुल 103 फरियादी अपनी समस्याएँ लेकर पहुँचे। यह संख्या अपने-आप में बताती है कि लोगों की अपेक्षाएँ इस मंच से अब भी जुड़ी हुई हैं। हालाँकि, इन 103 शिकायतों में से सिर्फ 22 मामलों का निस्तारण मौके पर हो सका।
शेष 81 मामलों में या तो दस्तावेज़ों की कमी बताई गई, या मामला राजस्व, पुलिस, विकास अथवा किसी अन्य विभाग से जुड़ा होने के कारण संबंधित अधिकारियों को अग्रसारित कर दिया गया।
यहीं से समाधान दिवस की वास्तविक परीक्षा शुरू होती है—क्योंकि फाइल आगे बढ़ना और समाधान होना दो अलग-अलग प्रक्रियाएँ हैं।
भाटपाररानी तहसील : शिकायतें 78, मौके पर समाधान सिर्फ 3
उसी अवधि में भाटपाररानी तहसील में आयोजित संपूर्ण समाधान दिवस में 78 शिकायतें दर्ज की गईं। इनमें अधिकांश शिकायतें भूमि विवाद, पैमाइश, रास्तों के अतिक्रमण, और पुलिस से जुड़ी थीं। मौके पर केवल 3 मामलों का निस्तारण हो सका।
शेष 75 शिकायतें संबंधित विभागों—राजस्व, पुलिस, विकास और नगर निकाय—को भेज दी गईं। यह आँकड़ा साफ बताता है कि तहसील स्तर पर आने वाली अधिकांश समस्याएँ ऐसी होती हैं, जिनका समाधान एक बैठक में संभव नहीं होता।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या इन मामलों की निगरानी बाद में होती है?
26 जनवरी 2025 : अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन, फिर भी आधा अधूरा
26 जनवरी 2025 को जिले के कई थानों में एक साथ आयोजित थाना-समाधान दिवस अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन करता दिखा। इस दिन कुल 76 शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें से 35 मामलों का निस्तारण मौके पर कर दिया गया।
यह लगभग 46 प्रतिशत का त्वरित समाधान दर बनता है, जो अन्य आयोजनों की तुलना में बेहतर है। लेकिन फिर भी 41 मामले ऐसे रहे जिन्हें अधिकारियों के पास भेजा गया।
यह उदाहरण दर्शाता है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और विभागीय समन्वय बेहतर हो, तो समाधान दिवस का प्रभाव बढ़ सकता है—हालाँकि वह अभी भी पूर्ण नहीं है।
दिसंबर 2025 : 38 शिकायतें, समाधान सिर्फ 2
दिसंबर 2025 में एक तहसील में आयोजित समाधान दिवस में 38 शिकायतें दर्ज की गईं। इनमें से मात्र 2 मामलों का समाधान मौके पर हो सका। बाकी 36 शिकायतें वही पुराना रास्ता पकड़ लेती हैं—फाइल, आदेश, रिपोर्ट और फिर अगली तारीख।
यहाँ समाधान दिवस की सीमाएँ सबसे स्पष्ट दिखाई देती हैं।
समेकित तस्वीर : समाधान कम, स्थानांतरण अधिक
यदि उपलब्ध मीडिया-आधारित आयोजनों को समग्र रूप में देखें तो देवरिया जिले में प्रत्येक समाधान दिवस में दर्जनों से लेकर सैकड़ों तक शिकायतें आती हैं। मौके पर समाधान आम तौर पर 10 से 40 प्रतिशत के बीच ही सिमटा रहता है। 60 से 90 प्रतिशत शिकायतें आगे संबंधित अधिकारियों को भेज दी जाती हैं।
यह स्थानांतरण अपने-आप में गलत नहीं है, लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब भेजी गई शिकायतों का कोई सार्वजनिक फॉलो-अप रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं होता।
फाइलों में फँसी समस्याएँ: अदृश्य लेकिन वास्तविक
देवरिया जिले में—और वास्तव में पूरे प्रदेश में—समाधान दिवस से जुड़ी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि फाइल में गए मामलों का कोई समेकित, सार्वजनिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है।
मीडिया रिपोर्टें यह तो बताती हैं कि “संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिए गए”, लेकिन यह नहीं बतातीं कि उन निर्देशों पर कार्रवाई हुई या नहीं। कितनी शिकायतें वर्षों तक लंबित रहीं—यह प्रश्न अनुत्तरित ही रहता है।
समाधान दिवस—आशा का मंच, पर अधूरी जवाबदेही
देवरिया जिले के उपलब्ध आँकड़े यह संकेत देते हैं कि समाधान दिवस जनता की समस्याएँ सामने लाने का सशक्त मंच है, लेकिन समाधान देने की क्षमता सीमित और असमान है। सबसे बड़ी कमी है—पारदर्शी फॉलो-अप का अभाव।
जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि “जो मामले आगे भेजे गए, उनका क्या हुआ?” तब तक समाधान दिवस समाधान से अधिक एक प्रक्रिया ही बना रहेगा।
समाधान दिवस से जुड़े सवाल–जवाब
समाधान दिवस का उद्देश्य क्या है?
जनसमस्याओं को सुनना, मौके पर समाधान करना और शेष मामलों को समयबद्ध निस्तारण हेतु अग्रसारित करना।
देवरिया में समाधान दिवस की सबसे बड़ी कमी क्या है?
फाइलों में भेजी गई शिकायतों का कोई सार्वजनिक और पारदर्शी फॉलो-अप रिकॉर्ड उपलब्ध न होना।
क्या समाधान दिवस पूरी तरह असफल है?
नहीं, यह समस्याएँ सामने लाने का प्रभावी मंच है, लेकिन जवाबदेही और निगरानी के अभाव में इसका प्रभाव सीमित हो जाता है।










