घरेलू राजनीति, नैतिक चुप्पी और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पर सवाल
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदुओं पर हो रही हिंसा कोई नई घटना नहीं है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब यह हिंसा नामों, आंकड़ों और शवों के साथ सामने आ रही है—और इसके बावजूद भारत के सार्वजनिक विमर्श में इसे एक असुविधाजनक विषय की तरह टाल दिया जा रहा है। दीपू चंद्र दास की हत्या ने इस पीड़ा को एक चेहरा दिया है, लेकिन यह चेहरा अकेला नहीं है। मौजूदा कार्यकाल में बांग्लादेश में 2900 से अधिक घटनाओं की बात कही जा रही है—हत्याएं, मंदिरों पर हमले, जमीन हड़पना, डराकर पलायन को मजबूर करना। इसके बावजूद भारत में जिस व्यापक और गंभीर बहस की अपेक्षा थी, वह या तो आधी-अधूरी है या जानबूझकर दिशाहीन।
सवाल बांग्लादेश से पहले भारत का है
इस मुद्दे पर पहला और सबसे ईमानदार सवाल भारत से ही बनता है—क्या पड़ोसी देश में धार्मिक आधार पर हो रहे उत्पीड़न पर बात करना अब राजनीतिक जोखिम बन गया है? जब भारत 1971 में मानवीय आधार पर हस्तक्षेप कर बांग्लादेश को स्वतंत्र कराने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है, जब दशकों तक लाखों तिब्बतियों को शरण दे सकता है, जब रोहिंग्या संकट जैसे जटिल मुद्दों को भी मानवीय दृष्टि से देखने का दावा कर सकता है—तो फिर बांग्लादेश में निशाना बनाए जा रहे हिंदुओं के प्रश्न पर संकोच क्यों?
यह संकोच कूटनीतिक कम और घरेलू राजनीतिक अधिक प्रतीत होता है। यही वह बिंदु है जहाँ विदेश नीति और आंतरिक राजनीति एक-दूसरे में उलझ जाती हैं और नैतिक स्पष्टता धुंधली पड़ने लगती है।
चयनात्मक संवेदनशीलता की राजनीति
भारत में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर बहस करना आवश्यक माना जाता है—और यह सही भी है। लेकिन जैसे ही बात सीमा पार हिंदुओं की आती है, विमर्श का स्वर बदल जाता है। तुरंत यह कहा जाने लगता है कि यह दूसरे देश का आंतरिक मामला है, इससे कूटनीतिक संबंध बिगड़ेंगे, या इससे ध्रुवीकरण होगा। सवाल यह है कि यही तर्क तब क्यों नहीं दिए जाते, जब भारत अन्य देशों में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर टिप्पणी करता है?
क्या मानवाधिकार केवल तभी सार्वभौमिक होते हैं, जब वे घरेलू राजनीति के अनुकूल हों? या फिर यह सार्वभौमिकता भी चयनात्मक हो चुकी है?
चुप्पी भी एक पक्ष होती है
घरेलू बहस में अक्सर यह मान लिया जाता है कि चुप रहना तटस्थ रहना है। लेकिन इतिहास बार-बार बताता है कि चुप्पी तटस्थ नहीं होती—वह अक्सर शक्तिशाली के पक्ष में खड़ी होती है। जब भारत में मीडिया, बुद्धिजीवी वर्ग और राजनीतिक दल इस मुद्दे पर खुलकर बोलने से बचते हैं, तो बांग्लादेश के भीतर बैठे उत्पीड़क तत्वों को यह संदेश जाता है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव की संभावना कम है।
यह चुप्पी केवल नैतिक विफलता नहीं, बल्कि रणनीतिक भूल भी है।
“आंतरिक मामला” कहकर भागने की सुविधा
यह तर्क कि किसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए, सुनने में सैद्धांतिक लगता है। लेकिन जब किसी देश में एक समुदाय को बार-बार निशाना बनाया जाए, तब यह आंतरिक मामला नहीं रहता। वह क्षेत्रीय अस्थिरता का कारण बन जाता है। भारत को यह बात भली-भांति समझनी चाहिए, क्योंकि हर बार जब पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों पर संकट आया है, उसका असर अंततः भारत की सीमाओं पर ही पड़ा है—चाहे वह शरणार्थियों का दबाव हो, सामाजिक तनाव हो या सुरक्षा संबंधी चुनौती।
घरेलू बहस से डर क्यों?
सच यह है कि भारत में इस मुद्दे पर खुलकर बहस इसलिए नहीं होती, क्योंकि यह बहस कई असहज सवाल खड़े कर देती है। क्या भारत की विदेश नीति में नैतिकता की कोई जगह है? क्या मानवाधिकार केवल भाषणों तक सीमित हैं? क्या पड़ोसी देशों में हिंदुओं की सुरक्षा की बात करना स्वतः ही सांप्रदायिक हो जाता है?
इन सवालों से बचना आसान है, लेकिन इनके बिना लोकतांत्रिक विमर्श अधूरा है।
यह लेख क्या नहीं कहता
यह लेख युद्ध की मांग नहीं करता, सैन्य हस्तक्षेप की वकालत नहीं करता और नफरत या उग्र राष्ट्रवाद को बढ़ावा नहीं देता। यह केवल यह आग्रह करता है कि घरेलू स्तर पर ईमानदार बहस से भागना किसी समस्या का समाधान नहीं है।
अंत में—भारत के लिए असली कसौटी
भारत स्वयं को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है। लोकतंत्र की पहचान केवल चुनाव नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और नैतिक स्पष्टता भी होती है। बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचारों पर भारत में खुली, तर्कपूर्ण और निर्भीक बहस किसी देश के खिलाफ नहीं, बल्कि मानवता के पक्ष में होगी।
सवाल अब यह नहीं है कि भारत क्या करेगा। सवाल यह है कि क्या भारत इस मुद्दे पर खुलकर बात करने का साहस भी दिखा पाएगा? क्योंकि कई बार चुप्पी से बड़ा अपराध कुछ नहीं कहना होता है।
