छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति केवल परंपराओं का संग्रह नहीं, बल्कि सामूहिक जीवन दर्शन की जीवंत अभिव्यक्ति है। इसी सांस्कृतिक परंपरा का एक सशक्त उदाहरण शनिवार को सीपत अंचल के ग्रामीण क्षेत्रों में देखने को मिला, जब छत्तीसगढ़ की समृद्ध विरासत का प्रतीक छेरछेरा लोकपर्व पूरे उल्लास, आस्था और सामूहिक सहभागिता के साथ मनाया गया। सुबह की पहली किरण के साथ ही गांवों में उत्सव का वातावरण बन गया और पूरा अंचल लोकधुनों, पारंपरिक नृत्य और सामाजिक सौहार्द के रंग में रंग उठा।
सुबह से ही गांवों में उत्सव का माहौल
शनिवार की सुबह सीपत अंचल के गांवों में सामान्य दिन जैसी नहीं थी। घर-घर से निकलते बच्चों की खिलखिलाहट, युवाओं की टोली और बुजुर्गों की आत्मीय मुस्कान ने यह संकेत दे दिया था कि आज का दिन विशेष है। जैसे-जैसे सूरज ऊपर चढ़ता गया, वैसे-वैसे गांवों की गलियों में लोकउत्सव का स्वर गूंजने लगा। ग्रामीण पारंपरिक वेशभूषा में सजे-धजे दिखाई दिए और हर घर से छेरछेरा पर्व के स्वागत की तैयारी झलकती रही।
डंडा नृत्य और वाद्ययंत्रों की थाप
छेरछेरा पर्व की पहचान माने जाने वाले डंडा नृत्य ने पूरे गांव को थिरकने पर मजबूर कर दिया। ढोल, मांदर और झांझ की ताल पर युवक-युवतियों की टोलियां नाचते-गाते घर-घर पहुंचीं। पारंपरिक गीतों की सामूहिक गूंज ने वातावरण को और भी जीवंत बना दिया। इन गीतों में न केवल उत्सव की खुशी झलकती है, बल्कि खेत-खलिहान, प्रकृति और सामूहिक श्रम का सम्मान भी सुनाई देता है।
बच्चों से बुजुर्गों तक दिखा उत्साह
छेरछेरा पर्व की सबसे सुंदर झलक यह रही कि इसमें हर वर्ग की भागीदारी दिखाई दी। छोटे बच्चे पारंपरिक गीत गुनगुनाते हुए टोली के साथ चले, युवाओं ने नृत्य और संगीत में ऊर्जा भरी, वहीं बुजुर्गों ने परंपराओं का मार्गदर्शन करते हुए आशीर्वाद दिया। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि छेरछेरा केवल पर्व नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाली सांस्कृतिक कड़ी है।
अन्नदान और सहयोग की परंपरा
छेरछेरा पर्व की आत्मा अन्नदान में निहित है। परंपरा के अनुसार ग्रामीणों ने घर-घर से अन्न, चावल और अन्य सामग्री दान में दी। यह दान किसी दबाव का परिणाम नहीं, बल्कि स्वेच्छा से किया गया सामाजिक कर्तव्य है। ग्रामीणों का मानना है कि नई फसल के स्वागत के साथ अन्न का साझा करना समृद्धि और संतुलन का प्रतीक है। यही भावना इस पर्व को सामाजिक समरसता का आधार बनाती है।
लोकगीतों में समाया सामाजिक संदेश
छेरछेरा के दौरान गाए जाने वाले लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं। इन गीतों में श्रम की गरिमा, प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और आपसी सहयोग का संदेश छिपा होता है। सीपत अंचल में गूंजे इन गीतों ने एक बार फिर यह याद दिलाया कि लोकसंस्कृति समाज को नैतिक दिशा देने की भी क्षमता रखती है।
नई फसल के स्वागत का पर्व
ग्रामीणों के अनुसार छेरछेरा पर्व नई फसल के स्वागत का उत्सव है। खेतों में लहलहाती फसल के बाद यह पर्व मेहनत के फल का सामूहिक उत्सव बन जाता है। यह पर्व ग्रामीण अर्थव्यवस्था और कृषि जीवन के गहरे संबंध को भी उजागर करता है, जहां उत्सव और श्रम एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
लोकसंस्कृति की जीवंत पहचान
सीपत अंचल में मनाया गया छेरछेरा पर्व इस बात का प्रमाण है कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति आज भी जीवंत है। आधुनिकता के इस दौर में भी ग्रामीण समाज अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ है और इन्हीं परंपराओं के माध्यम से सामाजिक एकता को मजबूत कर रहा है। पूरे दिन गांवों में पारंपरिक वेशभूषा, लोकगीतों की गूंज और उत्साहपूर्ण माहौल बना रहा।
सांस्कृतिक विरासत को सहेजने का माध्यम
छेरछेरा पर्व केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है। यह पर्व आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करता है। सीपत अंचल में दिखा उत्साह इस बात का संकेत है कि लोकपरंपराएं आज भी समाज की धड़कन बनी हुई हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
छेरछेरा पर्व क्या है?
छेरछेरा छत्तीसगढ़ का पारंपरिक लोकपर्व है, जो नई फसल के स्वागत, अन्नदान और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
छेरछेरा पर्व कब मनाया जाता है?
यह पर्व आमतौर पर फसल कटाई के बाद मनाया जाता है, जब गांवों में उत्सव और सामूहिक सहभागिता का वातावरण बनता है।
इस पर्व का मुख्य उद्देश्य क्या है?
छेरछेरा पर्व का उद्देश्य सामाजिक सहयोग, अन्न के साझा वितरण और सांस्कृतिक विरासत को सहेजना है।
सीपत अंचल में छेरछेरा का महत्व क्यों विशेष है?
सीपत अंचल में यह पर्व ग्रामीण जीवन, लोकनृत्य और सामूहिक सहभागिता के कारण विशेष पहचान रखता है।









