उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से जुड़ा यह मामला केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस सामाजिक बीमारी का भयावह उदाहरण है, जिसे हम दहेज कहते हैं। शादी के महज चार महीने के भीतर एक शिक्षित, समझदार और नवविवाहिता बेटी को इस दुनिया से विदा कर दिया गया। आरोप है कि दहेज के लालच में ससुराल पक्ष ने पहले शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न किया और फिर सुनियोजित साजिश के तहत उसकी हत्या कर दी।
पीड़ित परिवार का परिचय
पीड़ित पिता कमलेश कुमार चौधरी पेशे से पत्रकार हैं और ग्राम पंचायत नीवा, तहसील सरोजिनी नगर, थाना बन्थरा, जिला लखनऊ के मूल निवासी हैं। उन्होंने अपनी इकलौती पुत्री शिल्पी चौधरी का विवाह जनपद जालौन के ग्राम चांदनी, पोस्ट वसोप, थाना कोंच निवासी सागर चौधरी (पुत्र श्याम किशोर) के साथ हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार 26 मार्च 2025 को संपन्न कराया था।
शादी में खर्च और दहेज की पूरी कहानी
कमलेश कुमार चौधरी ने बेटी की शादी में अपनी सामर्थ्य से बढ़कर खर्च किया। रिश्ता तय होने से लेकर गोदभराई, तिलक, टेंट, कैटरिंग, रिश्तेदारों की आवभगत और दान-दछिना तक सभी व्यवस्थाएं लड़की पक्ष द्वारा लखनऊ में की गईं। इन सभी आयोजनों में लगभग ढाई लाख रुपये खर्च हुए। इसके बावजूद ससुराल पक्ष का लालच खत्म नहीं हुआ।
शादी से ठीक 26 दिन पहले लड़का पक्ष की ओर से एक लाख बीस हजार रुपये की अतिरिक्त मांग रखी गई। दबाव इतना अधिक था कि तत्काल भुगतान करने को कहा गया। मजबूर होकर पिता ने 1 मार्च 2025 को बन्थरा स्थित स्टेट बैंक शाखा से आरटीजीएस के माध्यम से यह रकम सागर चौधरी के खाते में भेज दी।
शादी, विदाई और अहमदाबाद ले जाने की साजिश
26 मार्च 2025 को बारात जालौन से लखनऊ पहुंची और 27 मार्च को शिल्पी की विदाई सम्मानपूर्वक कर दी गई। लेकिन यह सम्मान महज एक दिखावा था। 10 अप्रैल 2025 को ससुराल पक्ष ने बहला-फुसलाकर रोज़गार के बहाने शिल्पी को अहमदाबाद ले जाया।
अहमदाबाद में रहने के दौरान शिल्पी ने अपनी मां जानकी को फोन पर बताया कि सास शिवकुमारी, जेठ आनंद और पति सागर उसे लगातार प्रताड़ित कर रहे हैं। मां ने बेटी को यह सोचकर समझाया कि नया माहौल है, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। शिल्पी पढ़ी-लिखी और समझदार थी, इसलिए वह चुप रही।
बीमारी, इलाज में लापरवाही और मायके वापसी
कुछ समय बाद शिल्पी की तबीयत गंभीर रूप से बिगड़ने लगी, लेकिन ससुराल पक्ष ने उसका समुचित इलाज नहीं कराया। 20 अगस्त 2025 को पति सागर चौधरी उसे मायके लखनऊ छोड़कर चला गया। डॉक्टरों की जांच में पता चला कि शिल्पी को लीवर में गंभीर संक्रमण था।
रक्षाबंधन पर उसने अपने इकलौते भाई को राखी बांधी। इसी बीच ससुराल पक्ष ने जबरन उसे वापस बुलाया। मां ने हालात देखकर टालने की कोशिश की, लेकिन दबाव बढ़ता गया। 2 सितंबर 2025 को मां जानकी ने 5,000 रुपये और अपने निजी गहने देकर बेटी को विदा किया।
हत्या का आरोप और अहमदाबाद की घटना
आरोप है कि अहमदाबाद पहुंचते ही सास, जेठ और पति ने साजिश के तहत शिल्पी से मायके से मिले गहने भी छीन लिए। विरोध करने पर उसके खाने में ज़हर मिलाया गया। जब वह तड़पने लगी, तो गला दबाकर उसकी हत्या कर दी गई और बाद में फांसी का रूप देने की कोशिश की गई।
घटना अहमदाबाद के थाना इसनपुर क्षेत्र स्थित सताधार सोसायटी में हुई। आरोप यह भी है कि शिल्पी के मोबाइल फोन में मौजूद साक्ष्यों से छेड़छाड़ की गई।
पुलिस जांच और उठते गंभीर सवाल
परिवार का आरोप है कि एफआईआर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और डिजिटल साक्ष्यों में कई विरोधाभास हैं। जांच की प्रक्रिया पर पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। इतना ही नहीं, आरोपियों को जमानत मिल जाना भी पीड़ित परिवार के लिए बड़ा आघात है।
यह मामला क्या दर्शाता है?
यह मामला केवल एक हत्या नहीं, बल्कि दहेज, घरेलू हिंसा और जांच प्रणाली की कमजोरियों पर बड़ा प्रश्नचिह्न है। यह समाज और प्रशासन—दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय है।
महत्वपूर्ण सवाल-जवाब
शिल्पी चौधरी की मौत कहां हुई?
आरोप के अनुसार शिल्पी की मौत अहमदाबाद के इसनपुर थाना क्षेत्र स्थित सताधार सोसायटी में हुई।
परिवार ने किस पर हत्या का आरोप लगाया है?
मृतका के पति सागर चौधरी, सास शिवकुमारी और जेठ आनंद पर हत्या का आरोप लगाया गया है।
पुलिस जांच को लेकर क्या सवाल उठ रहे हैं?
एफआईआर, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और डिजिटल साक्ष्यों में कथित विरोधाभास और लापरवाही के आरोप लगाए गए हैं।
यह मामला समाज को क्या संदेश देता है?
यह मामला दिखाता है कि दहेज जैसी कुप्रथा आज भी कितनी जानलेवा है और सख्त सामाजिक व कानूनी हस्तक्षेप की आवश्यकता है।










