सहजता से अखिलेश का एहसान मानकर बृजभूषण ने ये कौन सी सियासी चाल चली है?

पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह की फाइल फोटो, जिसमें वे लोकसभा चुनाव, अखिलेश यादव और राम मंदिर उद्घाटन को लेकर दिए गए बयानों के बाद चर्चा में हैं


अब्दुल मोबीन सिद्दीकी की रिपोर्ट
IMG_COM_202603081950166970
previous arrow
next arrow

सहजता से अखिलेश का एहसान मानकर बृजभूषण ने ये कौन सी सियासी चाल चली है—यह सवाल तब और गहरा हो जाता है, जब पूर्व सांसद बृजभूषण शरण सिंह अपने ही राजनीतिक भविष्य, लोकसभा से बाहर किए जाने के आरोप, राम मंदिर उद्घाटन में न्योते की अनदेखी और विपक्षी नेताओं पर नरमी–सख्ती के संतुलन को एक ही सांस में सामने रखते हैं। एक पॉडकास्ट में दिए गए उनके बयान न केवल भारतीय राजनीति की अंतर्धाराओं को उजागर करते हैं, बल्कि यह भी संकेत देते हैं कि 2024 के बाद की राजनीति में व्यक्तिगत अपमान, कृतज्ञता और रणनीति किस तरह एक-दूसरे में घुल-मिल रही है।

लोकसभा से विदाई: हार नहीं, साज़िश?

कैसरगंज से पूर्व सांसद रहे 1 का दावा है कि उन्हें जनता ने नहीं, बल्कि “कुछ लोगों” ने योजनाबद्ध तरीके से लोकसभा से बाहर कराया। उनका कहना है कि उनका कार्यकाल अधूरा रहा और उन्हें अपमानित करके हटाया गया। यह आरोप केवल व्यक्तिगत पीड़ा नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर की राजनीति और टिकट वितरण की जटिलताओं की ओर भी इशारा करता है। बृजभूषण का यह कथन कि “अगर जिंदा रहा तो फिर लोकसभा जाऊंगा,” दरअसल एक राजनीतिक प्रतिज्ञा है—जो समर्थकों को संदेश देती है कि संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ।

इसे भी पढें  माफिया राज का खौफनाक अंत: प्रयागराज की वो रात जब लाइव कैमरों के सामने एक बाहुबली का अंत और कानून की निर्णायक आहट

बीजेपी के भीतर उम्मीद और शर्तें

बृजभूषण ने स्पष्ट किया कि उनकी प्राथमिकता बीजेपी से ही सांसद बनकर लोकसभा पहुंचने की है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर पार्टी उनके बेटे को टिकट देती है, तो वह भी चुनाव लड़ेंगे। यह कथन संगठनात्मक निष्ठा और पारिवारिक राजनीति—दोनों के संतुलन को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। यहाँ सवाल यह भी है कि पार्टी नेतृत्व उनकी दावेदारी को किस दृष्टि से देखेगा—अनुभव के रूप में या विवादों के बोझ के रूप में।

अखिलेश यादव पर नरमी: एहसान या संकेत?

सियासी गलियारों में सबसे अधिक चर्चा उस हिस्से की है, जहां बृजभूषण समाजवादी पार्टी प्रमुख 2 की तारीफ करते दिखाई देते हैं। उनका कहना है कि खराब दौर में अखिलेश ने उनके खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला और वह इस एहसान को कभी नहीं भूलेंगे। यह बयान महज शिष्टाचार नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे राजनीतिक संकेत के रूप में पढ़ा जा रहा है—क्या यह भविष्य की किसी सामरिक सहानुभूति का संकेत है या सिर्फ व्यक्तिगत कृतज्ञता?

इसे भी पढें  माउंटेन मैन दशरथ मांझी : हौसले, प्रेम और संघर्ष से जिन्होंने पहाड़ को भी झुका दिया

राम मंदिर उद्घाटन और स्वाभिमान का प्रश्न

अयोध्या में 3 के उद्घाटन को लेकर बृजभूषण का दर्द खुलकर सामने आया। उन्होंने कहा कि एक जनप्रतिनिधि और वरिष्ठ नेता होने के बावजूद उन्हें पहले न्योता नहीं दिया गया। दूसरी बार न्योता आया तो उन्होंने स्वयं मना कर दिया, क्योंकि वह अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं कर सकते। उनका तर्क है कि जिन लोगों का राम जन्मभूमि आंदोलन में कोई योगदान नहीं था, वे आमंत्रित हुए, जबकि असली कारसेवकों को नजरअंदाज किया गया। यह सवाल केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि आंदोलन की स्मृति और राजनीतिक श्रेय की लड़ाई से भी जुड़ा है।

राहुल गांधी पर टिप्पणी: निशाना नहीं, पीड़ा

कांग्रेस नेता 4 को लेकर बृजभूषण ने कहा कि वह उनके निशाने पर नहीं हैं। हालांकि, जब राहुल सेना और सनातन धर्म पर सवाल उठाते हैं, तो एक आम नागरिक के तौर पर उन्हें कष्ट होता है। यह बयान राजनीतिक असहमति को वैचारिक असुविधा के स्तर पर रखने की कोशिश है—जहां आलोचना है, लेकिन व्यक्तिगत आक्रामकता नहीं।

योगी–अमित शाह और सत्ता का संकेत

राष्ट्रकथा जैसे मंचों पर मुख्यमंत्री 5 और गृह मंत्री 6 को आमंत्रण दिए जाने पर बृजभूषण ने संतुलित टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि सीएम आएंगे या नहीं, यह उनका विषय है, लेकिन उनका मन कहता है कि योगी जी आ सकते हैं। यह कथन सत्ता के केंद्र और प्रदेश नेतृत्व के बीच संतुलन को दर्शाता है।

इसे भी पढें  आज़मगढ़ के बाबा गोपी दास मेमोरियल चिल्ड्रन पब्लिक स्कूल में मिशन शक्ति और यातायात जागरूकता कार्यक्रम का भव्य आयोजन

सियासी चाल या आत्मसम्मान की राजनीति?

इन तमाम बयानों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि बृजभूषण शरण सिंह अपनी छवि को नए सिरे से गढ़ने की कोशिश में हैं। एक ओर वह अपमान और साज़िश की बात करते हैं, दूसरी ओर कृतज्ञता और स्वाभिमान को राजनीतिक पूंजी में बदलते दिखते हैं। सवाल यह है कि क्या यह रणनीति उन्हें फिर से लोकसभा तक पहुंचाएगी, या यह केवल अपने समर्थकों को जोड़कर रखने की कवायद है?

❓ क्या बृजभूषण शरण सिंह फिर से लोकसभा चुनाव लड़ेंगे?
✔ उन्होंने कहा है कि अगर जिंदा रहे तो फिर से सांसद बनकर लोकसभा जरूर जाएंगे।
❓ अखिलेश यादव पर नरमी को कैसे देखा जाए?
✔ इसे व्यक्तिगत कृतज्ञता के साथ-साथ भविष्य की राजनीतिक शालीनता का संकेत माना जा रहा है।
❓ राम मंदिर उद्घाटन न्योते को लेकर विवाद क्यों?
✔ बृजभूषण का कहना है कि असली कारसेवकों को नजरअंदाज किया गया, जो स्वाभिमान का प्रश्न है।
पूर्व भाजपा सांसद बृज भूषण शरण सिंह गोंडा में चैरिटेबल ब्लड बैंक उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए
गोंडा में आयोजित कार्यक्रम में कांग्रेस, आरएसएस और पराली जलाने के मुद्दे पर अपनी बात रखते पूर्व भाजपा सांसद बृज भूषण शरण सिंह।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top