बीता हुआ साल : हमने क्या पाया, क्या खोया — और क्या खोते-खोते अपनी पाने की ऊर्जा भी गंवा दी

नए साल की सुबह खाली सड़क, बीते जश्न के अवशेष और 31 दिसंबर से 1 जनवरी पलटता कैलेंडर, आत्ममंथन में खड़ा एक व्यक्ति

नया साल : एक तारीख नहीं, एक ठहराव

यह पाठ किसी उत्सव का पोस्टर नहीं है। यह एक खुली खिड़की है—जहाँ से पाठक अपने ही भीतर झाँक सके।

नया साल अच्छा मनाया नहीं जाता, नया साल जिया जाता है—यह वाक्य किसी नारे की तरह नहीं, बल्कि एक धीमी स्वीकृति की तरह सामने आता है। जैसे कोई थका हुआ व्यक्ति भीड़ से निकलकर अपने कमरे में बैठ जाए और पहली बार यह स्वीकार करे कि उसे जश्न नहीं, समझ चाहिए। नया साल अगर सिर्फ़ कैलेंडर बदलने की घटना बन जाए, तो वह समय का नहीं, हमारी आदतों का उत्सव बनकर रह जाता है। और आदतें—बिना सवाल किए—हमेशा हमें वहीं लौटा देती हैं जहाँ से हम भागना चाहते थे।

हर साल की तरह इस बार भी घड़ियाँ बारह बजने का इंतज़ार करती हैं। मोबाइल स्क्रीन उलटी गिनती दिखाती हैं। शहरों में रोशनी बढ़ जाती है, लेकिन भीतर कहीं एक अजीब-सी धुंध भी घिर आती है। यह धुंध उन सवालों की होती है, जिन्हें हम पूरे साल टालते रहे—और जिन्हें नए साल की रात शोर में डुबो देना सबसे आसान लगता है। आज नया साल एक जगह-आधारित अनुभव बन चुका है। होटल, रिसॉर्ट, क्लब—जैसे खुशी का कोई स्थायी पता हो। वहाँ जाना केवल आनंद के लिए नहीं, बल्कि यह साबित करने के लिए भी होता है कि हम “कहाँ” थे। अनुभव से ज़्यादा फ़्रेम महत्त्वपूर्ण हो जाता है। भीतर की ख़ामोशी से ज़्यादा बाहर की तस्वीर।

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तेज़ संगीत वहाँ सिर्फ़ मनोरंजन नहीं करता; वह सोचने की संभावना को दबा देता है। उसकी धड़कन इतनी तेज़ होती है कि भीतर उठने वाले छोटे-छोटे सवाल अपनी आवाज़ खो देते हैं। शांति असहज लगने लगती है—क्योंकि शांति में अपने आप से सामना होता है। इसलिए शोर ज़रूरी है। नशा ज़रूरी है। भीड़ ज़रूरी है। ताकि हम अकेले न पड़ जाएँ—अपने ही भीतर।

लेकिन यही जश्न धीरे-धीरे असुरक्षा का वातावरण भी रचता है। विवेक सबसे पहले कमजोर होता है। जोखिम सामान्य लगने लगते हैं। तेज़ गाड़ी, असावधानी, धक्का-मुक्की—सब रोमांच बन जाते हैं। बारह बजते हैं, बधाइयाँ दी जाती हैं, और हम मान लेते हैं कि कुछ बदल गया है। जबकि सच यह है कि समय नहीं बदलता—हम बदलते हैं, या बदलने का भ्रम पालते हैं।

यह लेख किसी को जश्न से रोकने का उपदेश नहीं है। यह एक ठहराव है—जहाँ हम अपने ही कदमों की आवाज़ सुन सकें। पिछले साल ने हमें बहुत कुछ सिखाया, लेकिन हमने सब कुछ सीखा हो—यह दावा शायद ईमानदार नहीं होगा। नशा केवल शराब का नहीं होता; नशा उस विचार का भी होता है कि “आज सब माफ़ है।” इसी नशे में दुर्घटनाएँ बढ़ती हैं, झगड़े बढ़ते हैं, और संवेदनाएँ घटती हैं। भीड़ एक और खतरा बन जाती है—जहाँ सुरक्षा, ख़ासकर महिलाओं और कमजोर वर्गों की, एक असुविधाजनक प्रश्न में बदल दी जाती है।

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इस सबके पीछे एक गहरा मनोविज्ञान है—नवीनता का भ्रम। हमें बताया जाता है कि जैसे ही तारीख बदलेगी, जीवन भी बदल जाएगा। इसलिए हम अपनी वास्तविक समस्याओं से मुठभेड़ करने के बजाय उन्हें एक रात के जश्न से ढक देना बेहतर समझते हैं। चमक, गर्मी और शोर मिलकर एक कृत्रिम खुशी रचते हैं, जो अगली सुबह फीकी पड़ जाती है।

और उस सुबह के बारे में कम ही बात होती है।

सड़क दुर्घटनाएँ, हिंसा, आर्थिक नुकसान—ये नए साल की रात के स्थायी साथी बन चुके हैं। कानून और नैतिकता जैसे कुछ घंटों के लिए छुट्टी पर चले जाते हैं। मानो कैलेंडर बदलते ही जिम्मेदारी भी बदल जाए। यहीं सवाल उठता है—क्या खुशी का अनुभव शोर और जोखिम के बिना असंभव हो गया है? अगर हाँ, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामूहिक मानसिक संकट का संकेत है।

इस जश्न का एक और चेहरा है, जो अक्सर रोशनी से बाहर रहता है। यह उत्सव जितना भव्य दिखता है, उतना ही चयनित भी है। जिनके पास पैसे और पहुँच है, जश्न उनके लिए है; बाकी लोग या तो दर्शक हैं या सेवा-प्रदाता। होटल का स्टाफ, ड्राइवर, वेटर, सफाईकर्मी—सब जश्न के केंद्र में होते हुए भी जश्न से बाहर रहते हैं। वे दूसरों की खुशी को संभव बनाते हैं, लेकिन अपनी खुशी को स्थगित रखते हैं। यह केवल सामाजिक विडंबना नहीं, नैतिक प्रश्न भी है। जिस उत्सव की बुनियाद असमान श्रम पर टिकी हो, वह भीतर से खोखला ही होगा।

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सोशल मीडिया ने इस पूरी प्रक्रिया को और आक्रामक बना दिया है। अब जश्न जीने से पहले दिखाना ज़रूरी है। हर खुशी को तुरंत प्रमाणित करना पड़ता है। बिना कैमरे के बिताया गया सुख अधूरा लगता है। इस प्रदर्शन-प्रधान संस्कृति में अकेलापन और तीखा हो जाता है। जो लोग इस चमक तक नहीं पहुँच पाते, उनके लिए नया साल उत्सव नहीं, अभाव की याद बन जाता है। शायद इसी कारण नए साल के आसपास अवसाद और आत्महत्या की घटनाएँ बढ़ती हैं—क्योंकि तुलना का बोझ असहनीय हो जाता है।

आलोचना उत्सव-विरोध नहीं है। सवाल यह है—उत्सव किसका, किसके लिए और किस कीमत पर? अगर नया साल हमें और अधिक असंवेदनशील, असमान और असावधान बना रहा है, तो उस पर प्रश्न उठाना ज़रूरी है। शायद हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर खुशी शोर से नहीं आती, और हर नया आरंभ गिलास उठाने से नहीं होता।

क्योंकि ऐसा लेखन, ऐसा जीवन, ऐसा समाज, ऊपर बैठकर नहीं बनता—वह साथ चलकर ही संभव होता है।

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