पिछला वर्ष यह बताकर गया कि आधुनिक दुनिया तकनीकी रूप से जितनी उन्नत हुई है, मानसिक और नैतिक रूप से उतनी ही उलझी भी है। संवाद की जगह हथियारों ने ले ली है और कूटनीति के स्थान पर शक्ति-प्रदर्शन ने। छह से अधिक मोर्चों पर सक्रिय युद्ध और कई अन्य संभावित संघर्ष-क्षेत्र इस बात के संकेत रहे कि वैश्विक व्यवस्था किसी संतुलन में नहीं, बल्कि निरंतर तनाव की अवस्था में जी रही है।
रूस–यूक्रेन युद्ध 2025 में भी थम नहीं सका। यह केवल दो देशों के बीच का सैन्य टकराव नहीं रहा, बल्कि यूरोप की राजनीति, ऊर्जा आपूर्ति, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था तक को प्रभावित करने वाला संघर्ष बन गया। प्रतिबंधों, हथियारों की आपूर्ति और सैन्य गठबंधनों ने इस युद्ध को और जटिल बना दिया। इसके समानांतर पश्चिम एशिया में ईरान और इज़रायल के बीच तनाव हर समय विस्फोट की कगार पर खड़ा रहा। ऐसा लगा मानो पूरा क्षेत्र एक चिंगारी की प्रतीक्षा कर रहा हो।
पूर्वी एशिया में भी हालात शांत नहीं रहे। चीन का जापान और ताइवान के साथ बढ़ता तनाव केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा। समुद्री सीमाओं पर युद्धपोतों की तैनाती, सैन्य अभ्यास और हवाई गश्त इस बात का संकेत देती रहीं कि शक्ति-संतुलन की यह लड़ाई लंबी चलने वाली है। हर देश अपनी सुरक्षा के नाम पर हथियारों का जखीरा बढ़ाता रहा, मानो भविष्य संवाद से नहीं, टकराव से तय होना हो।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भले ही आठ युद्धों को शांत कराने का दावा करते रहे हों, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे भिन्न रही। अमेरिकी सैन्य ताकत दुनिया के कई हिस्सों में सक्रिय दिखी। वेनेजुएला की घेराबंदी इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण बनी, जहाँ लड़ाकू विमान, युद्धपोत, पनडुब्बियाँ और कमांडो तैनाती ने यह संदेश दिया कि वैश्विक राजनीति में दबाव और नियंत्रण आज भी प्रभावी औज़ार हैं।
गाज़ा का तनाव और आतंकी संगठनों की मौजूदगी ने पूरे क्षेत्र को लगातार अस्थिर बनाए रखा। आम नागरिक, बच्चे और महिलाएँ इस संघर्ष की सबसे बड़ी कीमत चुकाते रहे। सीरिया में भी हमलों का सिलसिला जारी रहा। इसी बीच रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की ओर से नाटो और यूरोप के खिलाफ बार-बार दी गई परमाणु युद्ध की धमकियाँ दुनिया के लिए डरावनी चेतावनी बनी रहीं। जवाब में नाटो और यूरोपीय देश भी लंबी लड़ाई की तैयारी में जुटे दिखे।
इन तमाम वैश्विक उथल-पुथलों के बीच भारत भी 2025 में आतंकवाद के गंभीर हमलों से अछूता नहीं रहा। मई में पाकिस्तान के खिलाफ लगभग 90 घंटे चला सीमित लेकिन तीव्र युद्ध देश के लिए निर्णायक क्षण था। इससे पहले कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया। पर्यटक स्थल पर धर्म पूछकर की गई हत्या ने न केवल 26 मासूम जानें लीं, बल्कि मानवता को भी कठघरे में खड़ा कर दिया।
इस हमले के जवाब में भारतीय सेना ने कठोर और सुनियोजित कार्रवाई की। पाकिस्तान में सक्रिय आतंकी ढाँचों को निशाना बनाया गया, सौ से अधिक आतंकियों को मार गिराया गया और उनके मुख्यालय मलबे में बदल दिए गए। कुछ प्रमुख एयरबेसों को भी नुकसान पहुँचा, जिनकी मरम्मत आज भी जारी है। यह कार्रवाई बदले से अधिक एक स्पष्ट संदेश थी—कि भारत अपनी संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।
दूसरा बड़ा झटका 10 नवंबर को दिल्ली के लालकिले के पास हुए आत्मघाती हमले के रूप में लगा। इस हमले में 15 निर्दोष लोग मारे गए और लगभग 30 घायल हुए। इस घटना ने इसलिए भी देश को चौंकाया, क्योंकि इसके पीछे जिस आतंकी गिरोह का खुलासा हुआ, उसमें उच्च शिक्षित डॉक्टर शामिल थे। यह सवाल और गहरा हो गया कि शिक्षा और पेशेवर पहचान के बावजूद कोई व्यक्ति कट्टरपंथ और हिंसा की राह कैसे चुनता है।
हालाँकि 2025 केवल अंधकार और पीड़ा का वर्ष नहीं रहा। इसी साल भारत ने कुछ ऐसे क्षण भी जिए, जिन्होंने देश को गर्व और आत्मविश्वास से भर दिया। वायुसेना अधिकारी शुभांशु शुक्ला का अंतरिक्ष स्टेशन तक पहुँचना और 18 दिनों तक वहाँ रहकर वैज्ञानिक प्रयोग करना भारत के अंतरिक्ष इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय बन गया। अंतरिक्ष स्टेशन के भीतर तिरंगे की उपस्थिति भारत की वैश्विक वैज्ञानिक क्षमता का प्रतीक बनी।
खेल जगत में भी भारत के लिए 2025 ऐतिहासिक रहा। महिला क्रिकेट टीम का पहली बार विश्व चैंपियन बनना वर्षों की मेहनत और संघर्ष का प्रतिफल था। दृष्टिबाधित महिलाओं की क्रिकेट टीम का विश्व विजेता बनना मानवीय जिजीविषा की प्रेरक कहानी बना। पुरुष क्रिकेट टीम ने आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी जीतकर और एशिया कप नौवीं बार अपने नाम कर देश को गर्व से भर दिया।
शतरंज में भारत ने खुद को विश्व शक्ति के रूप में स्थापित किया। 19 वर्षीय दिव्या देशमुख और पुरुष वर्ग में डी. गुकेश की उपलब्धियाँ इस बात का संकेत हैं कि भारत की युवा प्रतिभा अब वैश्विक मंच पर नेतृत्व कर रही है। मुक्केबाजी, खो-खो और कबड्डी जैसे खेलों में भी भारत ने विश्व स्तर पर परचम लहराया।
आर्थिक मोर्चे पर भी सकारात्मक संकेत मिले। देश में स्टार्टअप्स की संख्या दो लाख से अधिक हो गई और केवल 2025 में लगभग 45 हजार नए स्टार्टअप सामने आए। पेटेंट के लिए बढ़ते आवेदन इस बात का प्रमाण हैं कि भारत अब केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि नवाचार और ज्ञान का सृजनकर्ता भी बन रहा है।
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में अत्यधिक गरीबी में उल्लेखनीय कमी आई है और करोड़ों लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठे हैं। वैश्विक व्यापारिक दबावों और ऊँचे टैरिफ के बावजूद देश की आर्थिक विकास दर मजबूत बनी रही। यह भारत की आर्थिक सहनशीलता और आंतरिक क्षमता का प्रमाण है।
इस तरह 2025 विरोधाभासों का वर्ष रहा—जहाँ युद्ध और आतंक की छाया थी, वहीं उपलब्धियों और उम्मीदों की रोशनी भी। नववर्ष 2026 इन्हीं दोनों ध्रुवों के बीच खड़ा है। यह हमें चेतावनी भी देता है और आश्वासन भी। सवाल यह नहीं है कि दुनिया कितनी अशांत है, बल्कि यह है कि हम इस अशांति के बीच किस दिशा में कदम बढ़ाते हैं। यदि विवेक, संवाद और मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दी गई, तो शायद आने वाले वर्ष केवल युद्धों की गिनती नहीं, बल्कि शांति की संभावनाएँ भी लिखेंगे।










