यह दस्तावेजी रिपोर्ट फिरोजाबाद के चूड़ी उद्योग से जुड़े मजदूरों की वास्तविक सामाजिक-आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य जोखिम, आय संरचना, और सरकारी योजनाओं की ज़मीनी सच्चाई को आंकड़ों और ठोस उदाहरणों के साथ सामने रखने का प्रयास है।
फिरोजाबाद — जो लोककथा और ताने-बाने में ‘सुहाग नगरी’ के नाम से जानी जाती है — इस शहर की पहचान सदियों से कांच और चूड़ी बनाने की पारंपरिक कला से रही है। परंतु, जिस चमक-दमक को बाजारों में लाखों दुपट्टों और दुल्हनों की कलाई पर देखा जाता है, उसके पीछे काम करने वाले मजदूरों की ज़िन्दगी अक्सर धुँए, गर्मी, बीमारी और आर्थिक अस्थिरता से घिरी होती है। यह रिपोर्ट उसी परतदार सच को दस्तावेज़ करती है — जहाँ कला, स्वास्थ्य और नीति एक साथ टकराते हैं।
काम का स्वरूप और श्रम संरचना
फिरोजाबाद के काँच-चूड़ी उद्योग में कार्यरत इकाइयाँ अधिकतर असंगठित, घर-आधारित या छोटे-गैर-आधिकारिक कारखानों के रूप में कार्य करती हैं। काँच को पिघलाने, तार में खींचने, कटिंग, रंगाई और सजा-धजा—हर चरण में हाथ-घंटों का काम और पारंपरिक तरीकों का उपयोग देखा जाता है।
परिणामस्वरूप श्रम अक्सर परिवार-आधारित होता है: पुरुष भट्ठी या कच्चे निर्माण पर, महिलाएँ और बच्चे सजावट, रंगाई व पैकिंग में लगे रहते हैं। इस व्यवस्था की वजह से रोजगार अस्थायी, कम वेतनरत और सामाजिक सुरक्षा से वंचित रहता है।
स्वास्थ्य जोखिम — धुँआ, रसायन और तंत्रिकीय चोटें
काँच बनाने की प्रक्रिया में अत्यधिक गर्मी, गैस/कचरा निकास, रसायन और महीन काँच-पाउडर (silica) का संपर्क होता है। इन कारकों की वजह से श्वसन संबंधी समस्याएँ, अस्थमा, पुरानी ब्रोंकाइटिस और तंत्रिका-आधारित चोटें आम दिखाई देती हैं।
हालिया क्षेत्रीय सर्वे और रिपोर्टों में श्रमिकों में क्रोनिक ब्रोंकाइटिस की उच्च दरें दर्ज हुई हैं—जहाँ कई मजदूर नियमित रूप से सांस से जुड़ी तकलीफों से जूझ रहे हैं और इलाज के लिए अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा खर्च करते हैं।
उद्योग का आकार और संरचना: आंकड़ों की नज़र से
विभिन्न सरकारी व गैर-सरकारी आकलनों के अनुसार फिरोजाबाद जिले में लगभग 8–10 लाख लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से काँच व चूड़ी उद्योग पर निर्भर हैं। इनमें से 60% से अधिक श्रमिक घर-आधारित इकाइयों में काम करते हैं।
औद्योगिक इकाइयों की संख्या करीब 3,000–3,500 आँकी जाती है, जिनमें अधिकांश छोटी या पारिवारिक इकाइयाँ हैं।
नसीरपुर मोहल्ले की एक गली में 8×10 फुट के कमरे में तीन पीढ़ियाँ साथ काम करती हैं—दादा काँच को भट्ठी में तपाते हैं, पिता चूड़ी खींचते हैं और माँ-बेटी सजावट करती हैं। यह मॉडल “घरेलू उद्योग” कहलाता है, लेकिन इसमें न न्यूनतम मजदूरी की गारंटी है, न सुरक्षा मानक।
मजदूरी और आय: मेहनत बनाम आमदनी
चूड़ी उद्योग में मजदूरी पीस-रेट (काम के हिसाब से भुगतान) पर आधारित है। एक कुशल भट्ठी मजदूर ₹8,000–10,000 प्रतिमाह कमाता है, जबकि सजावट और पॉलिश का काम करने वाली महिला मजदूरों की आय ₹4,000–6,000 प्रतिमाह तक सीमित रहती है।
रुकसाना (35 वर्ष) दिन में 7–8 घंटे चूड़ियों पर स्टोन चिपकाने का काम करती हैं। महीने के अंत में उनकी कुल कमाई लगभग ₹4,800 होती है, जिसमें से ₹1,500 दवाइयों पर खर्च हो जाते हैं।
आंकड़े जो डराते हैं
स्थानीय स्वास्थ्य सर्वे के अनुसार, हर 10 में से 6 मजदूर किसी न किसी श्वसन रोग से पीड़ित हैं। 40% से अधिक मजदूरों की उम्र 50 वर्ष से पहले ही कार्यक्षमता घट जाती है।
55 वर्षीय शकील अहमद, जिन्होंने 30 साल भट्ठी पर काम किया, आज बिना ऑक्सीजन सिलेंडर के सांस नहीं ले पाते। आयुष्मान कार्ड होने के बावजूद उन्हें निजी अस्पताल में इलाज कराना पड़ा, क्योंकि सरकारी अस्पताल में विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं था।
महिलाओं की स्थिति — दुपहिया जिम्मेदारियाँ और जोखिम
महिलाएँ इस उद्योग की रीढ़ हैं, लेकिन सबसे ज्यादा उपेक्षित भी। महिलाएँ अक्सर घरों में बैठकर चूड़ियाँ सजाने, रंगने और चमकाने का काम करती हैं। यह ‘वर्क-फ्रॉम-होम’ मॉडल उन्हें घर की ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए कम काम करने का विकल्प देता है, परंतु इसके साथ ही सुरक्षा, हवा-निगमन और कार्यस्थल से जुड़े अनुपयुक्त जोखिम बने रहते हैं।
एक हालिया अध्ययन में घरेलू-आधारित चूड़ी इकाइयों में कार्यरत महिलाओं ने केरोसीन/गैस सिलेंडर जैसी सलगन वस्तुओं के कारण असुरक्षित माहौल का जिक्र किया है; नतीजा — जलने, साँस की समस्या और मानसिक दबाव। इन दलों के पास पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा या बीमा कवरेज नहीं होता।
कुल श्रमिकों में लगभग 50–55% महिलाएँ हैं। इनमें से 80% घर-आधारित काम करती हैं। अधिकांश महिलाएँ किसी भी सरकारी श्रम रजिस्टर में दर्ज नहीं।
शबनम और उनकी दो बेटियाँ दिन भर चूड़ियों पर पॉलिश करती हैं। यह काम “घरेलू मदद” समझा जाता है, जबकि यह उत्पादन श्रृंखला का अहम हिस्सा है। न मातृत्व लाभ, न बीमा, न पेंशन—सब कुछ अनौपचारिक।
बाल श्रम और टूटा हुआ भविष्य
सरकारी कागज़ों में बाल श्रम प्रतिबंधित है, लेकिन जमीनी सच्चाई अलग है। सामाजिक संगठनों के अनुमान के अनुसार, 20–25% परिवारों में बच्चे किसी न किसी रूप में काम करते हैं। स्कूल छोड़ने की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक।
12 वर्षीय अरमान सुबह स्कूल जाता है और दोपहर बाद चूड़ियाँ पैक करता है। परिवार की आमदनी में उसके ₹1,500 प्रतिमाह “जरूरी योगदान” माने जाते हैं। यही मजबूरी आगे चलकर पीढ़ीगत गरीबी को जन्म देती है।
आय, अस्थिरता और बाज़ार दबाव
परंपरागत काँच की मांग में गिरावट, सस्ते प्लास्टिक और मेटल चूड़ी का प्रतिस्पर्धा, ईंधन- (विशेषकर प्राकृतिक गैस/लकड़ी) लागत में वृद्धि और अंतरराष्ट्रीय/राष्ट्रीय बाज़ार में बदलते फैशन ने फिरोजाबाद की अर्थव्यवस्था पर दबाव डाला है।
कई मालिक अपनी उत्पादन क्षमता घटा चुके हैं; छोटे कारीगर और मजदूरों की आमदनी घटने से परिवारों की आर्थिक सुरक्षा प्रभावित हुई है। इसके साथ ही मौसम-जनित चुनौतियाँ, जैसे चरम गर्मी (जो भट्ठियों के साथ और भी घातक होती है), काम करने की स्थिति को और कठिन बना देती हैं।
बाल श्रम और शिक्षा का चक्र
कई परिवार इस उद्योग में पीढ़ियों से जुड़े हैं; गरीबी और अस्थिर आय के कारण बच्चों को स्कूल के बजाय काम पर लगाना एक सामान्य ‘रणनीति’ बन गई है।
भरी गर्मी में भट्ठी के खतरनाक हिस्से में बच्चों को नहीं लगाया जाता जितना कि सजावट/पैकिंग के काम में—परंतु संरचना के कारण बच्चे शिक्षा से दूर रह जाते हैं और कौशल-उन्नयन की राह बंद रहती है।
अंतरराष्ट्रीय व स्थानीय अध्ययनों ने यह दिखाया है कि जब परिवार की आय अस्थिर हो, तो बाल श्रम का दबाव स्वतः बढ़ जाता है—और इससे दीर्घकालिक विकास प्रभावित होता है।
सरकारी पहलें — उपलब्धता, प्रभाव और दूरी
सरकार और विभिन्न विभागों ने समय-समय पर कई योजनाएँ, प्रशिक्षण और पोषण पैकेज घोषित किए हैं — पर लागू होने और जमीन पर पहुँचने में बाधाएँ दिखती हैं।
उत्तर प्रदेश की ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ (ODOP) योजना के अंतर्गत फिरोजाबाद के काँच–चूड़ी उत्पादकों के लिए स्वरोजगार इकाइयों और सब्सिडी का लक्ष्य रखा गया था। तथापि, इन योजनाओं का लाभ छोटे कारीगरों तक समान रूप से नहीं पहुँच पाया है—अनुमोदन, बैंकिंग प्रक्रिया और साक्ष्य-संबंधी दिक्कतें बाधा बनी रहीं।
आयुष्मान भारत योजना सैद्धांतिक रूप से उपलब्ध है लेकिन निजी अस्पतालों में कार्ड स्वीकार न होना और व्यावसायिक रोगों के लिए सीमित पैकेज इसकी बड़ी कमजोरी है।
PM Vishwakarma योजना जैसी पहलों के बारे में जागरूकता की भारी कमी और पंजीकरण प्रक्रिया की जटिलता सामने आई है।
योजनाओं और हकीकत के बीच की दूरी
अगर योजनाएँ पूरी तरह लागू होतीं तो मजदूरों को सुरक्षित भट्ठियाँ, महिलाओं को पहचान और सामाजिक सुरक्षा तथा बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के ठोस प्रोत्साहन मिल सकते थे। फिलहाल योजनाएँ कागज़ों में अधिक, गलियों में कम दिखती हैं।
समाधान की दिशा: आंकड़ों से निकलता रास्ता
घर-आधारित इकाइयों का सरल पंजीकरण, मोबाइल हेल्थ यूनिट, महिलाओं के लिए न्यूनतम पारिश्रमिक मानक, बाल श्रम मुक्त परिवारों को आय-सहायता और ई-कॉमर्स से जुड़ाव जैसे उपाय असरकारक हो सकते हैं।
इसके अलावा काँच उद्योग से जुड़े तकनीकी समर्थन के लिए Center for Development of Glass Industry (CDGI) जैसे संस्थान मौजूद हैं, जिनका उद्देश्य तकनीकी सलाह, प्रशिक्षण और आधुनिकता लाने में मदद करना है।
मजदूरों की आवाज़ — कुछ जीवंत तस्वीरें
“हम हर साल गर्मी के मौसम में ज्यादा बीमार पड़ते हैं; दवाइयाँ महंगी हैं और काम कम।” — एक भट्ठी मजदूर का यह कथन स्वास्थ्य और आय दोनों पर दबाव को उजागर करता है।
“मेरी बेटी को स्कूल भेजना चाहता हूँ, पर ट्यूशन और किताबों के लिए पैसे नहीं हैं।” — यह कथन दिखाता है कि योजनाएँ होते हुए भी ज़मीनी सच्चाई कितनी कठोर है।
रंग में छुपा कड़वा सच
फिरोजाबाद का काँच-चूड़ी उद्योग आत्मा से समृद्ध है — पर उसकी मजबूरी और मजदूरों का संघर्ष अस्वीकार्य है। यदि कला को बचाना है तो उसे बनाने वाले लोगों की भलाई और स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। तभी फिरोजाबाद की चूड़ियाँ केवल कलाई तक सीमित न रहकर शिल्प, गरिमामयी रोज़गार और सुरक्षित जीवन का प्रतीक बन सकेंगी।










