धर्मेन्द्र कुमार के साथ
पूस की ठिठुराती रातें और सर्द हवा जब हड्डियों तक उतरने लगती हैं, तब प्रशासनिक व्यवस्था की परीक्षा सबसे कठिन होती है। दुर्भाग्यवश, करतल कस्बे में यह परीक्षा फिलहाल असफल होती दिखाई दे रही है। भीषण शीतलहर के बीच कस्बे के गरीब, मजदूर, बुजुर्ग और विधवाएं खुले आसमान के नीचे या कच्चे आश्रयों में रात काटने को मजबूर हैं। जिस समय शासन-प्रशासन और समाजसेवी संगठनों द्वारा राहत और संरक्षण की अपेक्षा की जाती है, उसी समय उनकी अनुपस्थिति सबसे अधिक खलती है।
कस्बे की लगभग दस हजार की आबादी के लिए केवल एक अलाव की व्यवस्था की गई है, जो स्थानीय लोगों की नजर में “ऊंट के मुंह में जीरा” से अधिक कुछ नहीं। सुबह और रात के समय तापमान जब तेजी से गिरता है, तब यह एकमात्र अलाव भी सैकड़ों जरूरतमंदों के लिए नाकाफी साबित होता है। परिणामस्वरूप लोग पन्नी, लकड़ी के टुकड़े, कूड़ा-कचरा और अन्य ज्वलनशील वस्तुएं जलाकर खुद को ठंड से बचाने का प्रयास करते नजर आ रहे हैं, जो न केवल असुरक्षित है बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है।
अलाव और कम्बल: कागज़ों में योजनाएँ, ज़मीन पर सन्नाटा
हर वर्ष सर्दियों के आगमन से पहले प्रशासन द्वारा अलाव, रैन बसेरे और कम्बल वितरण की योजनाओं की घोषणा की जाती है। समाजसेवी संस्थाएं भी फोटो-सेशन और प्रेस विज्ञप्तियों के माध्यम से सक्रियता का संदेश देती हैं। लेकिन इस वर्ष करतल में ये योजनाएं केवल कागज़ों और बयानों तक सिमट कर रह गई हैं। न तो कस्बे के प्रमुख चौराहों, बस स्टैंड, बाजार या झुग्गी बस्तियों में पर्याप्त अलाव लगाए गए और न ही किसी संगठित तरीके से कम्बल वितरण किया गया।
स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि पहले कम से कम ठंड के दिनों में पंचायत, नगर निकाय या स्वयंसेवी समूहों की ओर से कुछ न कुछ सहायता अवश्य मिल जाती थी। इस बार हालात यह हैं कि कई विधवाएं और अकेले रहने वाले वृद्ध रातभर ठंड से कांपते रहते हैं। उनके पास न तो पर्याप्त कपड़े हैं और न ही लकड़ी या ईंधन खरीदने की आर्थिक क्षमता।
गरीबों की चुप पीड़ा और बढ़ता आक्रोश
ठंड की मार झेल रहे गरीबों में अब केवल पीड़ा नहीं, बल्कि आक्रोश भी स्पष्ट रूप से झलकने लगा है। उनका सवाल सीधा है—जब हर वर्ष राहत योजनाओं के नाम पर बजट आवंटित होता है, तो वह सहायता जमीन पर क्यों नहीं दिखती? कस्बे के मजदूरों का कहना है कि दिनभर की मेहनत के बाद जो थोड़ी-बहुत कमाई होती है, वह भोजन में ही खर्च हो जाती है। ठंड से बचाव के साधन उनके लिए विलासिता बन चुके हैं।
महिलाएं विशेष रूप से चिंतित हैं। छोटे बच्चों और बुजुर्गों को ठंड से बचाना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। कई परिवार ऐसे हैं, जिनके पास एक ही पुराना कम्बल है, जिसे बारी-बारी से उपयोग करना पड़ता है। यह स्थिति न केवल सामाजिक असमानता को उजागर करती है, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता पर भी गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
राजनीतिक दावे और जमीनी हकीकत का अंतर
गरीबों के हित में बड़े-बड़े दावे करने वाले राजनेता भी इस समय मौन साधे हुए नजर आ रहे हैं। चुनावी मौसम में जो चेहरे हर गली-मोहल्ले में दिखाई देते हैं, वे इस भीषण ठंड में कहीं नजर नहीं आते। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते अलाव और कम्बल की समुचित व्यवस्था की जाती, तो इतनी परेशानी नहीं होती।
यह स्थिति केवल करतल तक सीमित नहीं, बल्कि ग्रामीण और कस्बाई भारत की एक व्यापक तस्वीर को सामने रखती है, जहां योजनाओं की घोषणा तो होती है, लेकिन क्रियान्वयन की इच्छाशक्ति कमजोर पड़ जाती है।
प्रशासनिक संवेदनशीलता की कसौटी
ठंड जैसी प्राकृतिक आपदा में प्रशासनिक संवेदनशीलता सबसे अहम होती है। अलाव, रैन बसेरे और कम्बल वितरण कोई असाधारण मांग नहीं, बल्कि बुनियादी मानवीय आवश्यकता है। यदि समय रहते इन पर ध्यान न दिया गया, तो ठंड से होने वाली बीमारियां और जनहानि की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
कस्बेवासियों की मांग है कि तत्काल प्रभाव से सार्वजनिक स्थलों पर अतिरिक्त अलाव लगाए जाएं, जरूरतमंदों की सूची बनाकर पारदर्शी तरीके से कम्बल वितरण किया जाए और स्वयंसेवी संगठनों को भी सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया जाए।
एक सवाल, जो अनुत्तरित है
सवाल यह नहीं है कि ठंड कब तक रहेगी, बल्कि यह है कि व्यवस्था कब तक इतनी ठंडी बनी रहेगी? जब तक इस सवाल का जवाब नहीं मिलेगा, तब तक कस्बे के गरीब यूं ही ठंड, उपेक्षा और निराशा के बीच संघर्ष करते रहेंगे।
❓ जनता के सवाल — प्रशासन से जवाब
क्या कस्बे में कम्बल वितरण की कोई योजना है?
फिलहाल जमीनी स्तर पर किसी संगठित कम्बल वितरण की योजना दिखाई नहीं दे रही है, हालांकि कागज़ों में योजनाओं का उल्लेख किया जाता रहा है।
केवल एक अलाव क्यों लगाया गया?
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रशासनिक लापरवाही और निगरानी की कमी के कारण आवश्यक संख्या में अलाव की व्यवस्था नहीं की गई।
ठंड से सबसे अधिक कौन प्रभावित है?
बुजुर्ग, विधवाएं, दिहाड़ी मजदूर और छोटे बच्चे इस भीषण ठंड से सबसे अधिक प्रभावित हैं।
समाधान क्या हो सकता है?
तत्काल अतिरिक्त अलाव, पारदर्शी कम्बल वितरण, रैन बसेरों की व्यवस्था और समाजसेवी संगठनों की सक्रिय भागीदारी से स्थिति में सुधार संभव है।










