भारत में कथावाचक परंपरा : श्रद्धा, सत्ता और बाज़ार के बीच खड़ा प्रश्न

भारत में कथावाचक परंपरा, धार्मिक कथा वाचन, अंधभक्ति, दक्षिणा और दान के रूप में धन व आभूषण, श्रद्धा और व्यवसाय का टकराव दर्शाती प्रतीकात्मक छवि

अनिल अनूप
IMG-20260116-WA0015
previous arrow
next arrow

कथा से मंच तक : परंपरा की यात्रा

भारत में कथा-वाचन कोई नई परंपरा नहीं है। रामकथा और कृष्णकथा ने सदियों तक समाज को नैतिक दिशा दी, लोकभाषा में धर्म को समझाया और आम जन के जीवन में आस्था का संबल बनाया। कथा का उद्देश्य कभी प्रदर्शन नहीं था, बल्कि संवाद था—मनुष्य और मूल्य के बीच संवाद। कथा साधन थी, गंतव्य नहीं।

जब कथावाचक गुरु, महापंडित और अंतर्यामी बन जाए

समय के साथ कथा-वाचन की प्रकृति बदली है। आज कथावाचक केवल व्याख्याकार नहीं रह गए—वे गुरु, महापंडित और सर्वज्ञ की तरह पूजे जाने लगे हैं। इस मान्यता के साथ श्रद्धा ने धीरे-धीरे विवेक का स्थान लेना शुरू किया।

इसे भी पढें  बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले :भारत में इस पर बहस क्यों असहज कर दी गई है?

अंधभक्ति के इस वातावरण में प्रश्न पूछना अपराध जैसा मान लिया गया, और यहीं से संतुलन बिगड़ने लगा।

श्रद्धा का मूल्य : दक्षिणा, संपत्ति और संतान तक

आज कथा के मंच पर केवल भाव नहीं बहते। लाखों की फीस के रूप में दक्षिणा, दान में जेवर-ज़ेवरात, संपत्ति और यहाँ तक कि बेटा-बेटी तक को “समर्पित” करने के उदाहरण सामने आते हैं।

श्रद्धालु इसे भक्ति मानते हैं, लेकिन प्रश्न यह है— क्या भक्ति का अर्थ विवेक का त्याग है?

सनातन गुरु परंपरा बनाम धार्मिक बाज़ार

सनातन धर्म में गुरु का स्थान हमेशा ऊँचा रहा है, लेकिन उस परंपरा में एक स्पष्ट रेखा भी थी— ज्ञान का आदान-प्रदान त्याग से जुड़ा था, व्यवसाय से नहीं।

जब कथा की फीस तय होने लगे, जब आशीर्वाद मूल्य पर मिलने लगे, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यह परंपरा का विस्तार है या उसकी विकृति।

इसे भी पढें  एकाकीपन के आकाश तले प्रेम का भ्रम : सब्र से यह लेख आपने पढ़ लिया तो आपकी भी जिंदगी गुलज़ार हो सकती है…

अंतिम प्रश्न : धर्म निर्भरता सिखाता है या आत्मबोध?

यह लेख किसी कथावाचक पर आरोप नहीं लगाता। यह केवल इतना पूछता है— क्या धर्म का उद्देश्य मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाना था या किसी मंच पर निर्भर करना?

क्या श्रद्धा का अर्थ समर्पण है या समझ?

इस प्रश्न का उत्तर शायद एक लेख नहीं देगा।

लेकिन यदि पाठक यहाँ रुककर सोचे— तो यही इस लेख की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न: क्या कथावाचक परंपरा सनातन धर्म का अभिन्न हिस्सा है?

उत्तर: कथावाचक परंपरा सनातन धर्म में ज्ञान और मूल्यों के प्रसार का माध्यम रही है, लेकिन इसका उद्देश्य श्रद्धा के साथ विवेक और आत्मबोध को जाग्रत करना था, न कि अंधसमर्पण या व्यावसायिक निर्भरता पैदा करना।

प्रश्न: क्या कथा-वाचन का व्यावसायिक स्वरूप धार्मिक विकृति माना जा सकता है?

उत्तर: जब कथा-वाचन संवाद से हटकर प्रदर्शन और मूल्य-निर्धारण में बदलने लगे, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि यह परंपरा का स्वाभाविक विकास है या धार्मिक विकृति। इसका उत्तर समाज और पाठक के विवेक पर निर्भर करता है।

इसे भी पढें  बांदा की पन्जाब आर्मरी— सनसनीखेज डकैती के मास्टरमाइंड सुक्का पाचा को 8 साल बाद जमानत, जेल से बाहर आते ही चटपट शादी!

यह भी पढ़ें :

धर्म, आस्था और आधुनिक समाज पर हमारी अन्य रिपोर्ट

उन्नाव जिला अस्पताल के ट्रायज एरिया में चाकू से घायल युवक, परिजन और मौजूद लोग
उन्नाव जिला अस्पताल के ट्रायज एरिया में इलाज के दौरान चाकू से घायल युवक, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। । खबर पढने के लिए फोटो को क्लिक करें ☝☝☝

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top