
मिट्टी के मसीहा — हमारे बाग़ों का रखवाला और समाज का भूला हुआ श्रमिक
मिट्टी के मसीहा — हमारे बाग़ों का रखवाला और समाज का भूला हुआ श्रमिक
हम जिन पार्कों में टहलते हैं, जिन लॉन पर बच्चे खेलते हैं, जिन गुलाबों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर सजती हैं—उन सबकी जड़ में एक माली खड़ा है। लेकिन विडंबना देखिए—जिसने हरियाली को पहचान दी, उसकी अपनी पहचान अक्सर अनाम रह जाती है। यह आलेख उसी अनदेखे श्रमिक की कहानी है—जो मिट्टी में अपना पसीना मिलाकर समाज के लिए सौंदर्य रचता है, और बदले में चुप्पी पाता है।
मिट्टी के मसीहा और मिट्टी से रिश्ता : पेशा नहीं, जीवन की साधना
माली का काम केवल “बाग़ की देखरेख” नहीं है। यह एक निरंतर साधना है—जहाँ मिट्टी, मौसम और मनुष्य के बीच संवाद होता है। एक अनुभवी माली जानता है कि कौन-सा पौधा कब पानी माँगता है, किसे धूप चाहिए और किसे छाँव। वह पत्तियों के रंग से बीमारी पहचान लेता है, और मिट्टी की नमी से मौसम का अनुमान। यह ज्ञान किसी डिग्री से नहीं, पीढ़ियों के अनुभव से आता है। लेकिन समाज की दृष्टि में यह सब “कौशल” नहीं, सिर्फ़ “काम” है।
निजी जीवन : हरियाली के बीच तंगहाली
जिस माली की बदौलत शहर हरा दिखता है, उसकी अपनी ज़िंदगी अक्सर सूखी रहती है। अधिकांश माली झुग्गी बस्तियों, किराये के कमरों या बाग़ के पीछे बने छोटे क्वार्टरों में रहते हैं। पानी, बिजली और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाएँ भी कई बार संघर्ष से मिलती हैं। उनकी आय सीमित है—इतनी कि रोज़मर्रा चल जाए, पर बीमारी, दुर्घटना या बच्चों की उच्च शिक्षा का सपना अधूरा रह जाए।
सामाजिक हैसियत : मौजूद, पर अदृश्य
भारतीय समाज में श्रम की जरूरत तो सबको है, पर श्रमिक को सम्मान कम मिलता है। माली हर सुबह ‘साहब’ के बाग़ में आता है, पर समारोह में वही साहब उससे आँख नहीं मिलाता। वह हरियाली को सजाता है, लेकिन समाज के मंच से उसे कभी सजाया नहीं जाता। उसका नाम कोई नहीं पूछता— वह बस “माली” है।
संस्कृति में माली : प्रतीक और विडंबना
भारतीय साहित्य और लोक-संस्कृति में माली सृजन, धैर्य और करुणा का प्रतीक रहा है। लेकिन वास्तविक माली—न तो कविता में जीता है, न परदे पर। उसकी छवि प्रतीकों में सुरक्षित है, पर वास्तविकता में वह असुरक्षित है।
असंगठित श्रमिक : अधिकारों से दूरी
माली असंगठित श्रमिक वर्ग का हिस्सा है—जहाँ न स्थायी नौकरी है, न सामाजिक सुरक्षा। बीमार पड़े तो मज़दूरी कट जाती है। बुज़ुर्ग हो जाए, तो कोई पेंशन नहीं। सरकारी योजनाएँ काग़ज़ों में हैं, लेकिन माली तक पहुँचते-पहुँचते रास्ता खो देती हैं।
पर्यावरण के सच्चे प्रहरी : मिट्टी के मसीहा
आज जब जलवायु संकट पर सेमिनार होते हैं, तब असली काम माली कर रहा होता है। वह पेड़ लगाता है, पानी बचाता है, मिट्टी को जीवित रखता है।
अगर शहर आज भी सांस ले पा रहे हैं, तो उसके पीछे माली की मेहनत है— लेकिन पर्यावरण नीति में उसका नाम नहीं। वह “ग्रीन वर्कर” नहीं, बस “गार्डन स्टाफ” कहलाता है। बीज को कोई और पालकर पेड़ बनने लायक बनाता है और “ट्री मैन” बड़े बड़े लोग बन जाते।
मनोवैज्ञानिक सच : श्रम में शांति
इतनी कठिनाइयों के बावजूद, माली के भीतर एक विचित्र शांति होती है। पौधों के साथ उसका रिश्ता उसे धैर्य सिखाता है। “पेड़ हमारे बच्चे जैसे हैं”—यह उसका जीवन-दर्शन है।
बदलाव की ज़रूरत : नीति और सोच दोनों में
यदि समाज सचमुच न्यायपूर्ण होना चाहता है, तो माली को केवल काम देने वाला नहीं, अधिकार देने वाला भी बनना होगा।
माली को कुशल कारीगर का दर्जा, सम्मानजनक वेतन, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और सामाजिक पहचान—ये दया नहीं, उसके हक़ हैं।
मिट्टी में छिपा स्वाभिमान
माली मिट्टी में झुकता है, पर आत्मसम्मान में नहीं। अगली बार जब आप किसी पार्क में टहलें, किसी फूल की खुशबू लें—तो याद रखिए, उस खुशबू में किसी माली का पसीना भी है।









