अरावली का क्षरण: तीन दशक की अदालती लड़ाई, 10 हज़ार खदानें और टूटता पर्यावरणीय संतुलन

अरावली पर्वतमाला में खनन गतिविधियों के कारण पहाड़ों का क्षरण और पर्यावरणीय संतुलन का टूटना

हिमांशु मोदी की रिपोर्ट
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भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में शामिल अरावली आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। यह संघर्ष केवल पत्थरों या खनिज संसाधनों तक सीमित नहीं है, बल्कि जल, जंगल, जमीन, जैव विविधता और आने वाली पीढ़ियों के जीवन अधिकार से जुड़ा हुआ है। बीते लगभग तीन दशकों से अरावली के संरक्षण को लेकर अदालतों, पर्यावरणविदों, नागरिक संगठनों और स्थानीय समुदायों की आवाज़ उठती रही है, लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि खनन बदस्तूर जारी है और पहाड़ हर दिन छिलते जा रहे हैं।

अरावली पर्वतमाला गुजरात से लेकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार इसकी आयु लगभग 150 से 200 करोड़ वर्ष मानी जाती है। यह पर्वतमाला उत्तर भारत के लिए एक प्राकृतिक ढाल के रूप में कार्य करती है, जो मरुस्थलीकरण को रोकने, भूजल रिचार्ज, तापमान संतुलन और जैव विविधता के संरक्षण में अहम भूमिका निभाती है। राजस्थान जैसे शुष्क और अर्ध-शुष्क राज्य के लिए अरावली जीवनरेखा के समान है, जहां सीमित वर्षा के कारण जल संरक्षण की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकारी और स्वतंत्र आकलनों के अनुसार अरावली क्षेत्र लगभग 50 हज़ार वर्ग किलोमीटर में फैला है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा राजस्थान में स्थित है। इस पूरे क्षेत्र में लगभग 10 हज़ार खदानों के सक्रिय या अर्ध-सक्रिय होने की बात सामने आती है। इन खदानों के कारण पहाड़ों को प्रतिदिन छलनी किया जा रहा है। कहीं वैध पट्टों की आड़ में तो कहीं खुलेआम अवैध खनन के ज़रिये पत्थर, ग्रेनाइट, संगमरमर और अन्य खनिज निकाले जा रहे हैं।

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स्थिति यह है कि कई इलाकों में पहाड़ियों की ऊंचाई सैकड़ों मीटर तक घट चुकी है। पहाड़ों के भीतर विस्फोट कर बनाए गए गहरे गड्ढे न केवल भू-दृश्य को विकृत कर रहे हैं, बल्कि जलस्रोतों को भी प्रदूषित कर रहे हैं। बरसात में इनमें पानी भर जाता है, लेकिन यह पानी भूजल को रिचार्ज करने के बजाय प्रदूषण का स्रोत बनता जा रहा है।

अरावली संरक्षण की लड़ाई में न्यायपालिका की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। 1990 के दशक से ही खनन को लेकर उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में लगातार याचिकाएं दायर होती रही हैं। अदालतों ने 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले अरावली क्षेत्र में खनन पर रोक लगाने सहित कई सख्त आदेश दिए, लेकिन व्यवहार में इन आदेशों का पालन आंशिक ही रहा। कई मामलों में पुराने पट्टों, विकास परियोजनाओं और पर्यावरणीय स्वीकृतियों की आड़ में खनन जारी रहा।

पर्यावरण विशेषज्ञों का आरोप है कि अदालत के आदेशों की व्याख्या इस तरह की गई, जिससे खनन हितों को रास्ता मिलता रहे। कानूनी प्रक्रिया लंबी होती चली गई और इस दौरान अरावली का क्षरण रुकने के बजाय तेज़ होता गया। अदालतों में मामले लंबित रहे और जमीन पर पहाड़ लगातार कटते रहे।

राज्य सरकारों की नीतियां भी इस संकट को गहराने का कारण बनी हैं। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात—चारों राज्यों में अरावली फैली है, लेकिन संरक्षण को लेकर कोई समन्वित नीति अब तक प्रभावी रूप से लागू नहीं हो सकी। राजस्थान में खनन से होने वाला राजस्व और इससे जुड़े रोज़गार को प्राथमिकता दी जाती रही, जबकि पर्यावरणीय क्षति को लंबे समय तक नज़रअंदाज़ किया गया।

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प्रशासनिक स्तर पर निगरानी की कमजोरी भी एक बड़ा कारण है। कई इलाकों में रात के अंधेरे में अवैध खनन होता है। विस्फोटकों से पहाड़ उड़ाए जाते हैं और सुबह तक सबूत मिटा दिए जाते हैं। शिकायतों पर कार्रवाई अक्सर कागज़ी औपचारिकता बनकर रह जाती है, जिससे खनन माफिया के हौसले बुलंद रहते हैं।

स्थानीय समुदाय इस पूरे विवाद के केंद्र में हैं। एक ओर खनन उनके लिए रोज़गार का साधन है, दूसरी ओर इसके दुष्परिणाम भी वही सबसे पहले झेल रहे हैं। जलस्रोत सूख रहे हैं, खेती प्रभावित हो रही है और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ रही हैं। कई गांवों में पीने के पानी के लिए लोगों को मीलों दूर जाना पड़ता है।

नागरिक संगठनों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने समय-समय पर अरावली संरक्षण को लेकर जनआंदोलन खड़े किए। जनहित याचिकाएं, रिपोर्टें और जागरूकता अभियानों के ज़रिये इस मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया गया। बढ़ते जल संकट और प्रदूषण के बीच अरावली को अब ‘ग्रीन लंग’ के रूप में देखा जाने लगा है, लेकिन यह चेतना अभी तक ठोस नीतिगत दबाव में नहीं बदल सकी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली को बचाने के लिए केवल खनन पर रोक पर्याप्त नहीं होगी। इसके लिए राज्यों के बीच समन्वित नीति, सख्त निगरानी तंत्र, तकनीक आधारित नियंत्रण, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैकल्पिक आजीविका मॉडल विकसित करने की आवश्यकता है। जब तक संरक्षण को विकास का अभिन्न हिस्सा नहीं बनाया जाएगा, तब तक अरावली का क्षरण रुकना मुश्किल है।

तीन दशकों की अदालती लड़ाई और अनगिनत चेतावनियों के बावजूद अगर अरावली हर दिन कमजोर होती जा रही है, तो यह केवल एक पर्वतमाला की हार नहीं है, बल्कि हमारे विकास मॉडल, नीति निर्धारण और प्रशासनिक इच्छाशक्ति पर भी एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। अरावली आज सवाल कर रही है—क्या विकास की कीमत पर्यावरण के विनाश से ही चुकाई जाएगी, या समय रहते संतुलन की राह चुनी जाएगी?

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अरावली संरक्षण से जुड़े अहम सवाल

अरावली पर्वतमाला को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?

अरावली पर्वतमाला उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ मानी जाती है। यह मरुस्थलीकरण को रोकने, भूजल स्तर बनाए रखने, तापमान संतुलन और जैव विविधता के संरक्षण में निर्णायक भूमिका निभाती है।

अरावली में खनन पर रोक के बावजूद गतिविधियां क्यों जारी हैं?

अदालतों के आदेशों के बावजूद पुराने पट्टों, नीतिगत छूट, प्रशासनिक ढील और अवैध खनन नेटवर्क के कारण अरावली क्षेत्र में खनन पूरी तरह बंद नहीं हो सका है।

अरावली के क्षरण का आम लोगों पर क्या असर पड़ रहा है?

अरावली के कमजोर होने से जल संकट बढ़ रहा है, खेती प्रभावित हो रही है, तापमान बढ़ रहा है और धूल भरी आंधियों की घटनाएं बढ़ी हैं, जिसका सीधा असर आम जनजीवन पर पड़ता है।

क्या खनन पूरी तरह बंद करना ही समाधान है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि बिना वैकल्पिक आजीविका के केवल खनन बंद करना व्यावहारिक नहीं है। इसके साथ वनीकरण, जल संरक्षण, इको-टूरिज्म और स्थानीय रोजगार मॉडल विकसित करना ज़रूरी है।

अरावली संरक्षण के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी, राज्यों के बीच समन्वित नीति का अभाव और पर्यावरणीय मुद्दों को विकास के समान स्तर पर न रखना है।

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