2025 में खड़े होकर 2026 की ओर, समय यहीं ठहरा है—दृष्टि आगे की है

2025 से 2026 की ओर बढ़ता समय, इतिहास की खुली किताब और भविष्य की राह को दर्शाती प्रतीकात्मक फीचर इमेज

✍️ मोहन द्विवेदी

आज से चार–पाँच दिनों के भीतर यह साल 2025 हमसे विदा ले लेगा—कुछ उपलब्धियों का ताज सिर पर सजाए, और कुछ नाकामयाबियों का भार नए साल 2026 के कंधों पर लादते हुए। सालों का जाना हमेशा किसी रेलगाड़ी के प्लेटफ़ॉर्म से छूटने जैसा होता है—पीछे छूटते चेहरों की धुंधली परछाइयाँ, हाथ हिलाती उम्मीदें, और उन खिड़कियों से झांकते प्रश्न जिनके उत्तर हमें अगले पड़ाव पर ढूँढने हैं। इस बार भी वही हुआ। जालिम ने बहुत हँसाने की कोशिश की—उत्सवों की रोशनी, विज्ञापनों की मुस्कान, सोशल मीडिया की चमक—पर कालचक्र ने बार-बार हमारे चेहरे से मुस्कान चुराई। कानों में संसद का शोर गूँजता रहा, और सड़कों पर खून से लथपथ घटनाओं की चीत्कार हमारे पास आकर बैठती रही। अंततः, नए साल के शोर में वह चला जाएगा—पीछे केवल जाने की एक थकी हुई संतुष्टि छोड़कर।

यह विदाई एक भावुक ठहराव मांगती है। क्योंकि साल केवल तारीख़ों का जोड़ नहीं होता—वह हमारे निर्णयों, हमारी चुप्पियों, हमारे प्रतिरोधों और हमारी उम्मीदों का समुच्चय होता है। 2025 ने हमें बहुत कुछ दिया—और बहुत कुछ छीना भी। इस लेख में उसी खुशी–ग़म के बीच राजनीति, संस्कृति और समाज के उतार–चढ़ाव का खाका खींचते हुए, 2026 की नई जिम्मेदारियों और उमंगों की भावुक चर्चा है—ताकि हम विदाई को केवल रस्म न बनाएं, बल्कि उसे आत्ममंथन का अवसर बनाएं।

राजनीति: शोर, चुप्पियाँ और लोकतंत्र का धैर्य

2025 की राजनीति को अगर एक शब्द में समेटना हो, तो वह होगा—शोर। भाषणों का शोर, आरोपों का शोर, बहसों का शोर। भारतीय संसद के भीतर आवाज़ें ऊँची रहीं; बाहर सड़कों पर सवाल। लोकतंत्र का स्वभाव बहस से ही निखरता है, पर जब बहस संवाद से कटकर शोर बन जाए, तब अर्थ धुंधला पड़ने लगता है। इस साल कई विधेयक, कई फैसले, कई घोषणाएँ आईं—कुछ ने राहत दी, कुछ ने आशंकाएँ बढ़ाईं। चुनावी मौसमों में वादों की बारिश हुई; कहीं पानी ज़मीन तक पहुँचा, कहीं वह केवल बादल बनकर रह गया।

राजनीति की सबसे बड़ी परीक्षा—विश्वास—2025 में बार-बार कसौटी पर चढ़ी। संस्थानों की स्वायत्तता पर चर्चाएँ तेज़ रहीं; पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रश्न उठे। विपक्ष की भूमिका, मीडिया की जिम्मेदारी, और नागरिक की चेतना—तीनों की धार एक साथ तेज़ होनी चाहिए थी। कुछ क्षणों में यह धार चमकी; कुछ में कुंद पड़ी। फिर भी, लोकतंत्र का धैर्य—यह वर्ष उसी धैर्य की कहानी भी है। असहमति के बीच भी व्यवस्था चलती रही; यह एक उपलब्धि है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

समाज: सड़कें, स्क्रीन और संवेदना का संघर्ष

2025 का समाज दो समानांतर पटरियों पर चलता दिखा—एक सड़क पर, दूसरा स्क्रीन पर। सड़क पर रोज़मर्रा की जद्दोजहद, रोज़ी–रोटी की चिंता, सुरक्षा और सम्मान की तलाश। स्क्रीन पर ट्रेंड्स, बहसें, आक्रोश, और क्षणिक सहानुभूति। कहीं–कहीं ये दोनों पटरियाँ मिलती हैं—जब किसी घटना का वीडियो हमारी संवेदना को झकझोर देता है—और फिर जल्दी ही अलग हो जाती हैं।

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इस साल हिंसा की घटनाओं ने हमें बार-बार भीतर तक हिलाया। यह केवल कानून–व्यवस्था का प्रश्न नहीं था; यह सामाजिक ताने–बाने का भी आईना था। असमानताएँ—आर्थिक, जातिगत, लैंगिक—अपनी जिद पर अड़ी रहीं। महिलाओं के खिलाफ़ अपराधों पर शोक और आक्रोश—दोनों हुए; पर स्थायी समाधान की गति अभी भी धीमी रही। युवाओं के सामने अवसरों का द्वंद्व—शिक्षा, रोजगार, मानसिक स्वास्थ्य—इन सब पर समाज को ठहरकर सोचना था।

2025 से 2026 की ओर बढ़ता समय, इतिहास की खुली किताब और भविष्य की राह को दर्शाती प्रतीकात्मक फीचर इमेज
2025 अभी समाप्त नहीं हुआ है—वह वर्तमान में खड़ा होकर 2026 के भविष्य की दिशा तय करता हुआ समय बन चुका है।

फिर भी, इसी समाज में रोशनी के छोटे–छोटे दीप भी जले। कहीं किसी शिक्षक ने सीमित संसाधनों में बच्चों के लिए सपने बोए; कहीं किसी नर्स ने थकान के बावजूद मुस्कान थामे रखी; कहीं किसी स्वयंसेवी समूह ने आपदा में हाथ बढ़ाया। यही छोटे दीप समाज को अँधेरे से बचाते हैं।

संस्कृति: उत्सवों की रोशनी और पहचान की बहस

2025 की संस्कृति रंगों से भरी रही—उत्सव, मेले, संगीत, सिनेमा, साहित्य। पर इन रंगों के बीच पहचान की बहस भी तेज़ हुई। परंपरा और आधुनिकता का संतुलन—यह सवाल हर कला–मंच पर मौजूद रहा। लोक–संस्कृतियों की पुनर्खोज हुई; डिजिटल मंचों ने नए कलाकारों को आवाज़ दी। भाषाएँ—खासकर हिंदी और क्षेत्रीय बोलियाँ—फिर से चर्चा में आईं; यह एक सुखद संकेत है।

सिनेमा और वेब–सीरीज़ ने समाज के कई अनकहे पहलुओं को छुआ—कभी साहस के साथ, कभी सतहीपन के साथ। साहित्य में आत्मकथ्य और प्रतिरोध की धार दिखी। मंचीय कलाओं ने दर्शक लौटाए; यह उम्मीद जगाने वाला है। संस्कृति केवल मनोरंजन नहीं—वह स्मृति भी है, चेतना भी। 2025 ने हमें याद दिलाया कि अपनी जड़ों से जुड़कर ही हम भविष्य की उड़ान भर सकते हैं।

अर्थ–जीवन, मेहनत, महँगाई और उम्मीद

आम आदमी के लिए 2025 मेहनत का साल रहा। महँगाई ने जेब पर दबाव बनाए रखा; रोजगार के अवसरों में असमानता दिखी। छोटे व्यापारियों और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों ने धैर्य के साथ संघर्ष किया। तकनीक ने नए दरवाज़े खोले—डिजिटल भुगतान, रिमोट वर्क—पर हर हाथ तक ये अवसर समान रूप से नहीं पहुँचे।

फिर भी, उद्यमिता की कहानियाँ उभरीं। स्टार्टअप्स से लेकर ग्रामीण नवाचार तक—कुछ प्रयोग सफल हुए, कुछ सीख बनकर रह गए। आर्थिक नीतियों पर बहस जारी रही; यह बहस ज़रूरी है। क्योंकि अर्थ–जीवन केवल आंकड़े नहीं—वह घरों की रसोई, बच्चों की फीस, और बुज़ुर्गों की दवाइयों से जुड़ा सवाल है।

शिक्षा और युवा: प्रश्न, दबाव और दिशा

2025 में युवाओं ने सबसे अधिक प्रश्न पूछे—और यही उनकी ताक़त है। शिक्षा–प्रणाली में सुधार की मांग, पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता, परीक्षा–दबाव और मानसिक स्वास्थ्य—ये मुद्दे केंद्र में रहे। कुछ सकारात्मक पहलें हुईं; कुछ जगहों पर पुरानी जड़ता दिखी।

युवा आज केवल नौकरी नहीं चाहते—वे अर्थ चाहते हैं। वे काम में सम्मान, जीवन में संतुलन और समाज में न्याय चाहते हैं। यह आकांक्षा नई जिम्मेदारियाँ भी लाती है—युवाओं पर, संस्थानों पर, और हम सब पर। 2026 का स्वागत तभी सार्थक होगा, जब हम इस आकांक्षा को दिशा दे पाएँ।

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मीडिया और सार्वजनिक विमर्श: आईना या बाज़ार?

2025 में मीडिया पर सवाल तीखे रहे। खबर और शोर के बीच की रेखा कई बार धुंधली हुई। फिर भी, जमीनी रिपोर्टिंग, खोजी पत्रकारिता और संवेदनशील प्रस्तुति के उदाहरण भी सामने आए। सोशल मीडिया ने नागरिकों को मंच दिया; साथ ही अफ़वाहों का जोखिम भी बढ़ाया। सार्वजनिक विमर्श को जिम्मेदार बनाने की चुनौती हमारे सामने है—यह केवल पत्रकारों की नहीं, दर्शकों–पाठकों की भी जिम्मेदारी है।

प्रकृति और पर्यावरण: चेतावनी की घंटी

मौसम ने 2025 में चेताया। कहीं बाढ़, कहीं सूखा, कहीं असमय बारिश। पर्यावरण अब दूर का विषय नहीं—वह हमारे दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है। विकास और संरक्षण के संतुलन पर गंभीर निर्णय चाहिए। यह साल हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के साथ समझौता नहीं—सहअस्तित्व ही विकल्प है।

2026 की देहलीज़ पर: नई जिम्मेदारियाँ, नई उमंगें

अब जब 2025 विदा ले रहा है, तो सवाल यह नहीं कि उसने हमें क्या दिया—सवाल यह है कि हमने उससे क्या सीखा। 2026 हमारे सामने एक खाली पन्ना है, पर उस पर लिखने की स्याही हमारे अनुभवों से आएगी।

राजनीति में—संयम, संवाद और जवाबदेही की मांग और मज़बूत करनी होगी।
समाज में—संवेदना को स्क्रीन से सड़क तक ले जाना होगा।
संस्कृति में—जड़ों से जुड़कर नवाचार को गले लगाना होगा।
अर्थ–जीवन में—नीतियों को इंसान–केंद्रित बनाना होगा।
शिक्षा में—युवाओं के प्रश्नों को दिशा देनी होगी।
पर्यावरण में—आज का लाभ नहीं, कल की ज़िंदगी चुननी होगी।

उमंगें भी हैं—नई खोजों की, नए संबंधों की, नए विचारों की। पर उमंगें तब टिकती हैं, जब उनके साथ जिम्मेदारी हो। 2026 हमसे यही माँगेगा—कि हम उम्मीद को आदत बनाएँ, और संवेदना को अभ्यास।

2025 जा रहा है—कुछ हँसी, कुछ आँसू, बहुत से सवाल छोड़कर। वह हमें पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाया—शायद कोई साल कर भी नहीं सकता। पर उसने हमें आईना ज़रूर दिखाया। अब 2026 की देहलीज़ पर खड़े होकर हमें तय करना है कि हम उस आईने में देखी गई सच्चाइयों से भागेंगे—या उन्हें बदलने का साहस जुटाएँगे।

नया साल शोर लेकर आएगा—आतिशबाज़ी, घोषणाएँ, संकल्प। पर असली काम शोर के बाद शुरू होता है—जब हम चुपचाप, ईमानदारी से अपने हिस्से का दीप जलाते हैं। यही दीप 2026 को रोशन करेंगे।

अगर 2025 को समझना है, तो उसे किसी थके हुए यात्री की तरह विदा होता हुआ नहीं, बल्कि एक साक्षी की तरह देखना होगा—जो चुपचाप मंच छोड़ता नहीं, बल्कि इतिहास की कुर्सी पर बैठ जाता है।

2025 कहीं नैसर्गिक लोक नहीं सिधार जाएगा। वह किसी नदी में विलीन होकर अदृश्य नहीं होगा, न किसी पहाड़ की ओट में खो जाएगा।

वह समय की अलमारी में रखी एक जीवित फ़ाइल बन जाएगा जिसे 2026 बार-बार खोलेगा, और हर बार पढ़ते हुए पूछेगा— यहाँ हम क्या थे? और यहाँ हम क्या हो सकते थे?

दरअसल, साल मरते नहीं हैं। वे केवल वर्तमान से इतिहास में स्थानांतरित होते हैं।

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2025 भी वही करेगा। वह 31 दिसंबर की आधी रात को घड़ी की सुइयों के साथ नहीं रुकेगा— बल्कि 1 जनवरी 2026 की पहली साँस में इतिहास के 2026वें पन्ने पर “इतिहास” कहलाते हुए ऐतिहासिक बन जाएगा।

यह वही साल होगा, जिसे आने वाले समय में किसी शोधपत्र में उद्धृत किया जाएगा, किसी संपादकीय में याद किया जाएगा और किसी युवा के सवाल में उदाहरण की तरह रखा जाएगा—

“उस दौर में लोग जानते तो थे, पर क्या उन्होंने किया भी था?”

2025 की सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि यह सच और स्वीकार के बीच झूलता रहा। सच सामने था— संविधान की किताब में भी, सड़कों की धूल में भी और श्मशानों-कब्रिस्तानों की ख़ामोशी में भी।

लेकिन स्वीकार— वह अधूरा रहा, टालता रहा और कई बार सुविधाजनक चुप्पी में बदल गया।

यही कारण है कि 2025 इतिहास में एक आरामदेह वर्ष नहीं कहलाएगा। वह एक असहज वर्ष होगा— जो सवाल करता है और जवाब मांगता है।

आने वाले वर्षों में जब 2026, 2027 या 2030 के लोग पीछे मुड़कर देखेंगे, तो 2025 को उत्सवों के कैलेंडर से नहीं, बल्कि निर्णयों की कसौटी से आँकेंगे।

वे कहेंगे— यही वह साल था जब लोकतंत्र बोल तो रहा था, पर सुना नहीं जा रहा था। यही वह साल था जब संस्कृति मंच पर थी, पर संवेदना बैकस्टेज में खड़ी थी। यही वह साल था जब समाज ऑनलाइन बहुत जागरूक था, पर ऑफ़लाइन बहुत थका हुआ।

और शायद इसी कारण 2025 का महत्व समय के साथ और बढ़ेगा। क्योंकि इतिहास हमेशा उन्हीं वर्षों को याद रखता है जो आरामदेह नहीं होते— जो चेतावनी देते हैं, जो रुककर सोचने को मजबूर करते हैं।

2026 के कंधों पर 2025 ने सिर्फ़ नाकामयाबियों का बोझ नहीं रखा है— उसने चेतना की ज़िम्मेदारी भी सौंपी है। यह बोझ नहीं, यह विरासत है।

अब 2026 के सामने विकल्प है— या तो वह 2025 को एक “गुज़रा हुआ साल” समझकर आगे बढ़ जाए, या फिर उसे एक संकेत, एक सबक और एक आधार की तरह पढ़े।

क्योंकि अगर 2026 ने 2025 को सही तरह से नहीं पढ़ा, तो इतिहास दोहराएगा नहीं— इतिहास सज़ा देगा।

इसलिए यह विदाई तालियों की नहीं, समझदारी की माँग करती है।

2025 हमसे यह कहकर जा रहा है—
“मैं गया नहीं हूँ, मैं दर्ज हो गया हूँ। अब तुम तय करो कि मेरे बाद लिखे जाने वाले पन्ने मुझे शर्मिंदा करेंगे या सही साबित?”

📌 पाठकों के सवाल

यह लेख 2025 को इतिहास क्यों मानता है?

क्योंकि यह साल केवल बीत नहीं रहा, बल्कि भविष्य के निर्णयों का आधार बन रहा है।

2026 के लिए इस लेख का मुख्य संदेश क्या है?

उम्मीद को आदत और संवेदना को अभ्यास बनाने की ज़िम्मेदारी।

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