चित्रकूट जनपद के सरधुवा गांव में 25 दिसंबर को आयोजित प्रभु यीशु मसीह के जन्मदिन और बच्चों के मुंडन कार्यक्रम को धर्म परिवर्तन का आरोप लगाकर बाधित किए जाने की घटना ने एक बार फिर धार्मिक सहिष्णुता, प्रशासनिक संवाद और सामाजिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
श्रद्धा का आयोजन, विवाद की शुरुआत
सरधुवा गांव में अनुसूचित जाति समुदाय के लोगों द्वारा प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी 25 दिसंबर को प्रभु यीशु मसीह का जन्मदिन श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा था। इसी अवसर पर गांव के कुछ बच्चों का पारंपरिक मुंडन संस्कार भी आयोजित किया गया था। ग्रामीणों का कहना है कि यह आयोजन न तो धर्म परिवर्तन से जुड़ा था और न ही किसी प्रकार का प्रलोभन या दबाव इसमें शामिल था। यह महज आस्था और परंपरा से जुड़ा एक सामाजिक आयोजन था।
बजरंग दल का हस्तक्षेप और आरोप
कार्यक्रम के दौरान बजरंग दल के कुछ कार्यकर्ता मौके पर पहुंचे और बिना किसी ठोस प्रमाण के आयोजन को धर्म परिवर्तन से जोड़ते हुए विरोध शुरू कर दिया। शोर-शराबा और हंगामे के चलते कार्यक्रम बाधित हुआ, जिससे ग्रामीणों में भय और असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई। आरोप यह भी है कि बिना संवाद स्थापित किए सीधे पुलिस को सूचना देकर स्थिति को और अधिक तनावपूर्ण बना दिया गया।
पुलिस प्रशासन की भूमिका
सूचना मिलते ही महिला थाना सहित कई थानों की पुलिस मौके पर पहुंची और पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली। कार्यक्रम संयोजकों और ग्रामीणों ने स्पष्ट किया कि आयोजन पूरी तरह धार्मिक श्रद्धा और सामाजिक परंपरा से जुड़ा है। किसी प्रकार का धर्मांतरण नहीं किया जा रहा था। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करते हुए शांति व्यवस्था बनाए रखी और बच्चों के मुंडन कार्यक्रम को पूरा कराने के निर्देश दिए।
धर्मनिरपेक्षता और आस्था का प्रश्न
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म, आस्था और विश्वास के अनुसार पूजा और श्रद्धा व्यक्त करने की स्वतंत्रता देता है। कोई बाबा साहब भीमराव आंबेडकर को मानता है, कोई देवी-देवताओं की आराधना करता है, तो कोई प्रभु यीशु मसीह में आस्था रखता है। इस विविधता में ही भारत की आत्मा बसती है। ऐसे में बिना प्रमाण किसी आयोजन को संदेह की दृष्टि से देखना सामाजिक सौहार्द के लिए घातक है।
शालीन आलोचना : संदेह की राजनीति
यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि बिना किसी ठोस साक्ष्य के श्रद्धा आधारित आयोजनों को धर्म परिवर्तन का रंग दे दिया जाता है। ऐसी प्रवृत्तियां न केवल समाज में अविश्वास पैदा करती हैं, बल्कि संविधान प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता को भी चुनौती देती हैं। यदि किसी को संदेह है, तो उसका समाधान संवाद, जांच और प्रशासनिक प्रक्रिया से होना चाहिए, न कि हंगामे और दबाव से।
संजय सिंह राणा की पहल
घटना की सूचना मिलते ही ‘जीत आपकी चलो गांव की ओर जागरूकता अभियान’ के संस्थापक अध्यक्ष संजय सिंह राणा मौके पर पहुंचे और श्रद्धालुओं से संवाद किया। ग्रामीणों ने बताया कि प्रभु यीशु मसीह की शरण में उन्हें मानसिक और सामाजिक संबल मिला है, इसलिए वे हर वर्ष उनका जन्मदिन श्रद्धापूर्वक मनाते हैं। इसमें किसी प्रकार का धर्म परिवर्तन नहीं है।
थाना प्रभारी का पक्ष
थाना प्रभारी राम सिंह ने स्पष्ट किया कि किसी भी व्यक्ति को किसी भी धर्म या महापुरुष के प्रति आस्था रखने का अधिकार है। पुलिस का उद्देश्य केवल शांति व्यवस्था बनाए रखना है। उन्होंने यह भी कहा कि भविष्य में इस प्रकार के आयोजनों की पूर्व सूचना प्रशासन को दी जानी चाहिए, ताकि किसी प्रकार का भ्रम या व्यवधान न उत्पन्न हो।
समाज के लिए संदेश
सरधुवा की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम श्रद्धा और आस्था को संदेह के चश्मे से देखने लगे हैं। समाज की मजबूती सहिष्णुता, संवाद और संवैधानिक मूल्यों में निहित है, न कि आरोप-प्रत्यारोप में।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या सरधुवा गांव में धर्म परिवर्तन हो रहा था?
नहीं, ग्रामीणों और पुलिस के अनुसार यह केवल प्रभु यीशु मसीह का जन्मदिन और बच्चों का मुंडन कार्यक्रम था।
पुलिस ने क्या कार्रवाई की?
पुलिस ने शांति व्यवस्था बनाए रखी और किसी के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया।
बजरंग दल के आरोपों का आधार क्या था?
आरोप बिना किसी पुख्ता सबूत के लगाए गए, जिसकी पुष्टि पुलिस जांच में भी नहीं हुई।

भविष्य में ऐसे आयोजनों के लिए क्या आवश्यक है?
स्थानीय प्रशासन और पुलिस को पूर्व सूचना देना आवश्यक बताया गया है।
इस घटना से क्या सीख मिलती है?
संवाद और सहिष्णुता ही सामाजिक सौहार्द का आधार है, संदेह नहीं।










