शीतकालीन सत्र के बीच ब्राह्मण विधायकों का नया ‘जुटान’

उत्तर प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के बीच ब्राह्मण विधायकों की बड़ी बैठक ने सियासी हलचल तेज कर दी है। लखनऊ में हुए इस ‘जुटान’ में सत्ता और संगठन में उपेक्षा, जाति आधारित राजनीति और भविष्य की रणनीति पर खुली चर्चा हुई।

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✍️ कमलेश कुमार चौधरी की रिपोर्ट
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उत्तर प्रदेश विधानसभा का शीतकालीन सत्र भले ही सदन के भीतर विधायी बहसों और प्रश्नोत्तर की प्रक्रिया में व्यस्त हो, लेकिन असली राजनीतिक सरगर्मी इन दिनों सदन के बाहर अधिक महसूस की जा रही है। इसी पृष्ठभूमि में लखनऊ में हुई ब्राह्मण विधायकों की एक बड़ी और अनौपचारिक बैठक ने प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। राजनीतिक गलियारों में इसे ब्राह्मण विधायकों का नया “जुटान” कहा जा रहा है, जो आने वाले समय में सत्ता और संगठन—दोनों पर असर डाल सकता है।

लखनऊ में जुटे 45 से 50 विधायक, ‘सहभोज’ के नाम पर सियासी संदेश

शीतकालीन सत्र के तीसरे दिन मंगलवार शाम यह बैठक कुशीनगर से भाजपा विधायक पीएन पाठक (पंचानंद पाठक) के लखनऊ स्थित आवास पर आयोजित हुई। बैठक को औपचारिक रूप से ‘सहभोज’ का नाम दिया गया, लेकिन इसके मायने केवल सामाजिक मेलजोल तक सीमित नहीं रहे। पूर्वांचल और बुंदेलखंड से आए करीब 45 से 50 ब्राह्मण विधायकों की मौजूदगी ने इस आयोजन को राजनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण बना दिया।

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खास बात यह रही कि बैठक में केवल सत्तारूढ़ भाजपा के विधायक ही नहीं, बल्कि अन्य दलों से जुड़े ब्राह्मण प्रतिनिधि भी शामिल हुए। इस विविध उपस्थिति ने यह संकेत दिया कि मामला सिर्फ एक दल के भीतर की नाराजगी तक सीमित नहीं है, बल्कि ब्राह्मण समाज की व्यापक राजनीतिक भूमिका और भविष्य को लेकर सामूहिक मंथन का प्रयास है।

इन नेताओं की रही अहम भूमिका

सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक की रूपरेखा तैयार करने और संवाद को दिशा देने में मिर्जापुर से विधायक रत्नाकर मिश्रा और एमएलसी उमेश द्विवेदी की भूमिका अहम मानी जा रही है। इसके अलावा देवरिया से विधायक और मुख्यमंत्री
योगी आदित्यनाथ
के पूर्व मीडिया सलाहकार डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी की मौजूदगी ने बैठक को और भी वजनदार बना दिया।

बैठक में बांदा, बदलापुर, खलीलाबाद, नौतनवां, तरबगंज, मेहनौन सहित कई अहम विधानसभा क्षेत्रों के विधायक शामिल हुए। यह क्षेत्रीय विविधता इस बात का संकेत देती है कि असंतोष या असहजता किसी एक इलाके तक सीमित नहीं, बल्कि प्रदेशव्यापी अनुभूति बनती जा रही है।

जाति आधारित राजनीति में बदलता संतुलन

बैठक में सबसे अहम चर्चा ब्राह्मण समाज की मौजूदा राजनीतिक स्थिति को लेकर हुई। विधायकों का कहना था कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जाति आधारित संतुलन तेजी से बदला है। कई वर्गों ने संगठित होकर अपनी राजनीतिक ताकत मजबूत की है, जबकि ब्राह्मण समाज खुद को धीरे-धीरे हाशिये पर खिसकता हुआ महसूस कर रहा है।

विधायकों का आरोप था कि संगठन और सरकार—दोनों स्तरों पर उनकी बातों को गंभीरता से नहीं सुना जा रहा। नीतिगत फैसलों, संगठनात्मक नियुक्तियों और सत्ता के प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व में ब्राह्मण समाज की भूमिका पहले जैसी प्रभावी नहीं रही। यही भावना इस ‘जुटान’ की मूल वजह मानी जा रही है।

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ठाकुर विधायकों की बैठक के बाद बढ़ी हलचल

गौरतलब है कि इससे पहले मानसून सत्र के दौरान ठाकुर समाज से जुड़े विधायकों ने भी इसी तरह की बैठक की थी। उस घटनाक्रम के बाद यह माना गया कि सत्ता के भीतर विभिन्न सामाजिक समूह अपने-अपने प्रभाव और हिस्सेदारी को लेकर ज्यादा मुखर हो रहे हैं। अब ब्राह्मण विधायकों की यह बैठक उसी राजनीतिक क्रम का अगला अध्याय मानी जा रही है।

हाल ही में भाजपा नेता
सुनील भराला
द्वारा प्रदेश अध्यक्ष पद के लिए नामांकन की कोशिश और फिर उसका रुक जाना भी इसी असंतोष से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान में जातीय संतुलन एक अहम कारक बनकर उभर रहा है।

इटावा कथावाचक कांड और सोशल मीडिया की नाराजगी

इटावा कथावाचक कांड के बाद ब्राह्मण समाज में असंतोष और गहराता दिखा। इस प्रकरण को लेकर सोशल मीडिया पर सरकार और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई ब्राह्मण संगठनों और प्रभावशाली आवाज़ों ने यह सवाल उठाया कि क्या शासन-प्रशासन उनके मुद्दों को समान संवेदनशीलता से देख रहा है।

सोशल मीडिया पर चल रही यह बहस अब ज़मीनी राजनीति में भी अपना असर दिखाने लगी है। लखनऊ की यह बैठक उसी डिजिटल असंतोष का राजनीतिक अनुवाद कही जा सकती है।

क्या संकेत देता है यह ‘जुटान’?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बैठक फिलहाल किसी खुले विद्रोह का संकेत नहीं देती, लेकिन यह एक स्पष्ट चेतावनी जरूर है। विधानसभा में इस वक्त कुल 52 ब्राह्मण विधायक हैं, जिनमें से 46 भाजपा से जुड़े हैं। यदि यह वर्ग संगठित रूप से अपनी उपेक्षा की भावना को आगे बढ़ाता है, तो इसका असर संगठनात्मक फैसलों और आगामी चुनावी रणनीतियों पर पड़ सकता है।

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सत्ता की राजनीति में ऐसे अनौपचारिक ‘सहभोज’ कई बार बड़े राजनीतिक संदेश दे जाते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार और संगठन इस संकेत को कितनी गंभीरता से लेते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ब्राह्मण विधायकों की यह बैठक क्यों चर्चा में है?

क्योंकि इसमें बड़ी संख्या में विभिन्न दलों से जुड़े ब्राह्मण विधायक शामिल हुए और सत्ता व संगठन में उपेक्षा जैसे संवेदनशील मुद्दों पर खुली चर्चा हुई।

क्या यह बैठक भाजपा के लिए चिंता का विषय है?

राजनीतिक रूप से इसे एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है, क्योंकि भाजपा के भीतर बड़ी संख्या में ब्राह्मण विधायक मौजूद हैं।

‘सहभोज’ शब्द का क्या अर्थ है?

औपचारिक रूप से यह सामाजिक मिलन है, लेकिन राजनीति में इसे सामूहिक संवाद और रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जाता है।

क्या अन्य जातीय समूह भी इसी तरह सक्रिय हैं?

हाँ, इससे पहले ठाकुर समाज के विधायकों की बैठक हो चुकी है, जिससे यह प्रवृत्ति स्पष्ट होती है।

इसका असर भविष्य की राजनीति पर कैसे पड़ेगा?

यदि असंतोष बढ़ा तो संगठनात्मक बदलाव, टिकट वितरण और राजनीतिक संतुलन पर इसका असर दिख सकता है।

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