मान्यवरों,
जी हाँ, मैं भैंस हूँ। कोई प्रतीक नहीं, कोई मूर्ति नहीं—बस साँस लेती हुई एक सजीव सत्ता। आपने गाय को माता का दर्जा दिया, मुझे उससे कोई द्वेष नहीं, कोई शिकायत नहीं। आस्था अगर किसी समाज को करुणा सिखाती है, तो उसका सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन मेरा प्रश्न आस्था से नहीं, अनदेखेपन से है।
देश के कुल दुग्ध उत्पादन का लगभग 55 प्रतिशत देने वाली मैं, सिर्फ “एक जानवर” क्यों रह गई? मेरे हिस्से में पूजा नहीं आई, पर सेवा पूरी आई। मेरे हिस्से में जयकार नहीं आई, पर ज़िम्मेदारी पूरी आई।
मैं बोलती नहीं, इसलिए शायद सुनाई नहीं देती। मैं हर सुबह अँधेरे में उठती हूँ। मेरे थनों से टपकता दूध किसी बच्चे की पढ़ाई बनता है, किसी बीमार की दवा, किसी माँ की रसोई।
मैं न सड़क पर बैठती हूँ, न कैमरों के सामने आती हूँ। मेरे नाम पर न कोई आंदोलन होता है, न कोई भावनात्मक बहस। मैं शोर नहीं करती—और शायद यही मेरी सबसे बड़ी भूल है।
यह आस्था का नहीं, संतुलन का प्रश्न है। यदि गाय में दैवीय गुण देखे गए, तो इतिहास और पुराण यह भी कहते हैं कि देवों की सवारी भैंसा रहा है। और यह भैंसा किसी कल्पना से नहीं, भैंस के गर्भ से ही जन्मा।
तो फिर यह कैसा चयन है? किसे पवित्र मानना है और किसे उपयोगी समझकर छोड़ देना है? क्या दैवीयता सिर्फ सफ़ेद रंग में बसती है? क्या सेवा का रंग काला होने से उसका मूल्य घट जाता है?
विज्ञान की कसौटी पर भी मैं कम नहीं। भावनाओं से हटकर, जब विज्ञान मेरी ओर देखता है, तो उसे स्पष्ट सच दिखाई देता है—मेरा दूध अधिक वसायुक्त है, इसलिए पोषण में समृद्ध है। मेरे दूध से बने उत्पाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। मेरी रोग-प्रतिरोधक क्षमता अधिक है—मैं कम साधनों में भी टिकती हूँ।
जलवायु परिवर्तन के दौर में मेरी सहनशीलता एक बड़ी ताक़त है। फिर भी, नीतियों की भाषा में मेरा नाम अक्सर फुटनोट में सिमट जाता है।
शहरों की बहसों में मेरा ज़िक्र नहीं होता, लेकिन गाँव की ज़िंदगी मेरे बिना चल नहीं पाती। छोटे किसान, भूमिहीन मजदूर, दलित-पिछड़े समुदाय—मेरे सहारे अपने बच्चों का भविष्य गढ़ते हैं।
जब तक मैं दूध देती हूँ, मैं “संपत्ति” हूँ। जैसे ही बूढ़ी होती हूँ, मैं “समस्या” बन जाती हूँ। क्या जीवन का मूल्य सिर्फ उसकी उपयोगिता से तय होगा?
संरक्षण का दोहरा मापदंड साफ़ दिखाई देता है—गाय के लिए गौशालाएँ, अनुदान, कानून और सामाजिक संरक्षण। और मेरे लिए? बीमारी में उपेक्षा, वृद्धावस्था में त्याग और अंततः एक अनचाहा अंत।
क्या करुणा भी वर्गों में बँटी होती है?
भैंस शालाएँ कोई भावनात्मक माँग नहीं, बल्कि एक आवश्यक सामाजिक सुधार हैं। यदि गाय के लिए आश्रय है, तो मेरे लिए क्यों नहीं? यदि संरक्षण आस्था का विषय है, तो संवेदना मानवता का विषय क्यों नहीं?
भैंस शालाएँ केवल पशु संरक्षण नहीं होंगी—वे ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण सुरक्षा और नैतिक संतुलन का प्रतीक होंगी।
नीति-निर्माताओं से मेरा एक सीधा सवाल है—क्या राष्ट्र निर्माण सिर्फ प्रतीकों से होगा, या उन मौन जीवों से भी जो बिना सवाल किए राष्ट्र को पालते हैं?
मैं मंदिर में नहीं हूँ, लेकिन खेतों में हूँ। मैं मंत्रों में नहीं, लेकिन हर थाली में हूँ।
अंत में, एक विनम्र लेकिन दृढ़ आग्रह—मुझे देवी मत बनाइए, मुझे पोस्टर मत बनाइए। बस मुझे देखिए। मेरे जीवन को आस्था बनाम उपयोगिता की बहस में मत फँसाइए।
क्योंकि अगर गाय माँ है, तो मैं भी किसी घर की रोज़ चलने वाली ज़िंदगी हूँ। और ज़िंदगी पूजा नहीं माँगती—सम्मान माँगती है।
आपकी ही चुपचाप सेवा में लगी,
एक भैंस
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या भैंस वास्तव में भारत के दुग्ध उत्पादन का 55 प्रतिशत योगदान देती है?
हाँ। सरकारी व दुग्ध विकास से जुड़े आँकड़ों के अनुसार भारत के कुल दुग्ध उत्पादन में भैंस का योगदान लगभग 50–55 प्रतिशत तक है, विशेषकर ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में।
जब भैंस का योगदान अधिक है, तो उसके संरक्षण पर उतना ध्यान क्यों नहीं?
भैंस को धार्मिक प्रतीक के बजाय केवल उपयोगी पशु के रूप में देखा गया, जिसके कारण नीतिगत और सामाजिक संरक्षण में असमानता बनी रही।
क्या भैंस का दूध पोषण की दृष्टि से गाय के दूध से कमतर है?
नहीं। भैंस के दूध में वसा और ऊर्जा अधिक होती है, जिससे यह पोषण की दृष्टि से समृद्ध और कई उत्पादों के लिए अधिक उपयोगी माना जाता है।
भैंस शालाओं की माँग क्यों ज़रूरी मानी जा रही है?
भैंस शालाएँ बूढ़ी, बीमार और अनुपयोगी समझी गई भैंसों को गरिमापूर्ण जीवन देने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पोषण सुरक्षा को भी मजबूत करेंगी।
क्या यह लेख आस्था के विरोध में है?
नहीं। यह लेख आस्था का सम्मान करते हुए नीति और संवेदना में संतुलन की माँग करता है, ताकि किसी भी उपयोगी जीवन को अनदेखा न किया जाए।










