उत्तर प्रदेश में गोवंश संरक्षण बीते कुछ वर्षों से राज्य की सबसे अधिक चर्चित नीतियों में शामिल है। सरकार ने निराश्रित और छुट्टा गोवंश को सड़कों और खेतों से हटाकर गौशालाओं में सुरक्षित रखने का दावा किया। इसके लिए बड़े पैमाने पर बजट स्वीकृत किया गया, नई गौशालाओं का निर्माण कराया गया और पहले से मौजूद संरचनाओं को विस्तार देने की योजनाएँ बनाई गईं। काग़ज़ों में यह व्यवस्था जितनी सशक्त दिखाई देती है, ज़मीनी हकीकत उससे काफी अलग नजर आती है।
वर्ष 2025 में उत्तर प्रदेश सरकार ने गोवंश संरक्षण के लिए हजारों करोड़ रुपये का प्रावधान किया। यह धनराशि गौशालाओं के निर्माण, संचालन, चारा, पानी, पशु चिकित्सा सेवाओं और कर्मचारियों के मानदेय पर खर्च होने का दावा किया गया। प्रशासनिक स्तर पर इसे गोसंरक्षण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया गया। लेकिन जब इन दावों को ग्रामीण इलाकों, कस्बों और सड़कों की वास्तविक स्थिति से जोड़ा जाता है तो तस्वीर असहज कर देने वाली सामने आती है।
राज्य की गौशालाओं में लाखों गोवंश संरक्षित बताए जाते हैं, लेकिन इसके समानांतर सड़कों, हाईवे और खेतों में घूमता गोवंश यह संकेत देता है कि व्यवस्था पूरी तरह कारगर नहीं है। कई जिलों में गौशालाओं की क्षमता सीमित है, जबकि गोवंश की संख्या उससे कहीं अधिक। परिणामस्वरूप एक ही परिसर में अत्यधिक गोवंश रखे जाते हैं, जिससे चारे, पानी और स्वच्छता की गंभीर समस्या उत्पन्न होती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कई गौशालाएँ केवल भवन तक सीमित दिखाई देती हैं। संचालन के नाम पर न तो पर्याप्त कर्मचारी हैं, न नियमित पशु चिकित्सा जांच और न ही मौसम से बचाव की समुचित व्यवस्था। ठंड, गर्मी और बरसात में गोवंश की दुर्दशा की खबरें समय-समय पर सामने आती रहती हैं। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या सरकारी खर्च वास्तव में गोवंश के कल्याण तक पहुँच पा रहा है।
सरकार की ओर से यह तर्क भी दिया जाता रहा है कि गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। गोबर से खाद, वर्मी कम्पोस्ट, जैविक उत्पाद और गोमूत्र आधारित वस्तुओं के निर्माण की योजनाएँ शुरू की गईं। कुछ स्थानों पर यह प्रयोग सफल भी हुआ, जहाँ स्थानीय लोगों को रोजगार मिला। लेकिन राज्य की अधिकांश गौशालाएँ आज भी पूरी तरह सरकारी अनुदान पर निर्भर हैं और उनकी आय नगण्य है।
गौशालाओं से होने वाली कुल आमदनी का कोई समेकित और पारदर्शी राज्य स्तरीय लेखा उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग गौशालाओं की आय सीमित है, जो उनके दैनिक खर्च का छोटा सा हिस्सा ही पूरा कर पाती है। इससे साफ है कि आत्मनिर्भरता का दावा अभी व्यवहारिक धरातल पर मजबूत नहीं हो सका है।
गौशाला व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी निगरानी और जवाबदेही की कमी है। कई जिलों में नियमित निरीक्षण नहीं होते, गोवंश की संख्या और स्थिति का सही रिकॉर्ड नहीं रखा जाता और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई नहीं होती। यही कारण है कि छुट्टा गोवंश की समस्या आज भी किसानों और आम नागरिकों के लिए गंभीर बनी हुई है।
सड़कों पर घूमता गोवंश केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक सुरक्षा संकट भी है। सड़क दुर्घटनाओं में जानें जा रही हैं, खेतों की फसलें नष्ट हो रही हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। यदि गौशालाएँ वास्तव में प्रभावी होतीं, तो यह स्थिति इतनी भयावह न होती।
स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश में गोवंश संरक्षण की नीति और उसके क्रियान्वयन के बीच गहरी खाई मौजूद है। बजट बड़ा है, घोषणाएँ व्यापक हैं, लेकिन जमीनी निगरानी कमजोर है। गौशालाओं को केवल आंकड़ों की सफलता नहीं, बल्कि वास्तविक समाधान के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या उत्तर प्रदेश में सभी गोवंश वास्तव में गौशालाओं में सुरक्षित हैं?
वास्तविक स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में गोवंश आज भी सड़कों और खेतों में घूमते देखे जाते हैं, जिससे व्यवस्था की सीमाएँ उजागर होती हैं।
सरकार गौशालाओं पर इतना खर्च क्यों कर रही है?
छुट्टा गोवंश से होने वाले सामाजिक, आर्थिक और सड़क सुरक्षा संबंधी नुकसान को रोकने के लिए सरकार गौशालाओं को समाधान मानती है।
क्या गौशालाएँ आत्मनिर्भर बन पाई हैं?
कुछ चुनिंदा स्थानों को छोड़ दें तो अधिकांश गौशालाएँ अब भी सरकारी अनुदान पर निर्भर हैं।










