गौशालाएँ मौजूद हैं, आंकड़े नहीं: प्रशासनिक व्यवस्था पर एक ज़मीनी दस्तावेज़

बांदा जिले की गौशाला में भूख और अव्यवस्था से जूझते गोवंश, प्रशासनिक लापरवाही का प्रतीकात्मक दृश्य

गौशालाएँ मौजूद हैं, आंकड़े नहीं—उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की गौशाला व्यवस्था पर आधारित एक ज़मीनी दस्तावेज़, जो गोवंश मृत्यु, प्रशासनिक लापरवाही और रिकॉर्ड-संस्कृति की गंभीर कमियों को उजागर करता है।

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✍️ संजय सिंह राणा की रिपोर्ट

उत्तर प्रदेश में गौवंश संरक्षण को लेकर पिछले कुछ वर्षों में नीतिगत घोषणाएँ, बजटीय प्रावधान और पंचायत-स्तरीय संरचनाएँ तेज़ी से बढ़ी हैं।
लगभग हर ज़िले में गौशालाओं का निर्माण हुआ है और सरकारी अभिलेखों में इसे पशु-कल्याण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। लेकिन इन दावों के समानांतर, ज़मीनी स्तर से समय-समय पर ऐसी घटनाएँ सामने आती रही हैं, जिन्होंने इस व्यवस्था की वास्तविक स्थिति और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।

बांदा जिला, जो बुंदेलखंड क्षेत्र का प्रतिनिधि जिला माना जाता है, इस विरोधाभास का एक स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है। यहाँ गौशालाएँ मौजूद हैं, बजट का उल्लेख है, और संचालन का ढांचा भी परिभाषित है—लेकिन इसके बावजूद गोवंश मृत्यु, अव्यवस्था, चारे की कमी और रिकॉर्ड के अभाव से जुड़ी घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं। यह स्थिति किसी एक गौशाला, एक पंचायत या एक अधिकारी तक सीमित नहीं दिखती, बल्कि एक व्यापक प्रशासनिक प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है।

इस रिपोर्ट का उद्देश्य केवल घटनाओं का विवरण देना नहीं है, बल्कि यह दर्ज करना है कि जब जिला-स्तर पर ही यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि कितनी गौशालाएँ सक्रिय हैं और उनमें कितने गोवंश संरक्षित हैं, तो संरक्षण की पूरी अवधारणा किस आधार पर संचालित हो रही है। बांदा की यह पड़ताल दरअसल पूरे राज्य की गौशाला-व्यवस्था में व्याप्त रिकॉर्ड-संस्कृति, निगरानी और जवाबदेही की कमजोरियों को समझने का एक प्रवेश-बिंदु है।

यह प्रस्तावना उसी व्यापक प्रश्न की भूमिका प्रस्तुत करती है, जिसे आगे के पृष्ठों में तथ्यों और व्याख्या के साथ विस्तार से रखा गया है।

पिछले कुछ वर्षों में बांदा की गौशालाओं से समय-समय पर वीडियो और रिपोर्टें वायरल हुई हैं जिनमें गाय-भैंस की मौत, चराई की कमी, चारा-पानी की दयनीय स्थिति और शवों के खुले में पड़े रहने जैसी चिंताजनक तस्वीरें सामने आई हैं। उदाहरण के तौर पर 2019 में एक घटना में 25 पशु मरने की खबर आई थी और 2022 में मणिपुर (मैदानिया/स्थानीय नाम से) गौशाला में आठ दिनों में 53 गोवंशों की मृत्यु की रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी — दोनों घटनाओं ने स्थानीय प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठाए।
एक-दो सालों में वायरल वीडियो/रिपोर्टों के मुताबिक नरैनी और अतर्रा इलाके सहित कई अस्थायी व स्थायी गौशालाओं में भूख, ठंड और अव्यवस्था से पशुओं की मौतें लगातार दर्ज हुई हैं। हालिया (2024–2025) स्थानीय रिपोर्टों में भी ऐसी चेतावनियाँ मिलती हैं।

जब ज़िला खुद नहीं जानता कि उसके पास कितनी गौशालाएँ हैं

यह तथ्य अपने आप में पर्याप्त है कि बांदा जैसे सीमावर्ती और संवेदनशील जिले में कोई भी जिला-स्तरीय अधिकारी यह तुरंत नहीं बता सकता कि इस समय कितनी गौशालाएँ सक्रिय हैं और उनमें कितने गोवंश रखे गए हैं। यह स्थिति किसी तकनीकी चूक या अस्थायी अव्यवस्था का संकेत नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक सोच और जवाबदेही ढांचे की गहरी विफलता को उजागर करती है।

गौशाला जैसी व्यवस्था, जो सीधे सरकारी नीति, बजट, पंचायत तंत्र और सामाजिक संवेदनशीलता से जुड़ी है, उसके बारे में जिला प्रशासन के पास रीयल-टाइम जानकारी का अभाव होना यह दर्शाता है कि यह तंत्र योजना के स्तर पर मौजूद है, संचालन के स्तर पर नहीं। जब जिला मुख्यालय पर बैठे अधिकारी यह नहीं जानते कि जिले में कितनी इकाइयाँ कार्यरत हैं, तो यह स्वाभाविक है कि वे यह भी नहीं जान पाएँगे कि कहाँ चारा कम है, कहाँ पशु बीमार हैं, और कहाँ मौतें हुई हैं।

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यह स्थिति इसलिए और गंभीर हो जाती है क्योंकि गौशालाएँ कोई स्वैच्छिक या निजी पहल नहीं हैं। ये सरकारी धन से चल रही संरचनाएँ हैं, जिन पर प्रति गोवंश प्रतिदिन खर्च का दावा किया जाता है। ऐसे में यदि प्रशासन यह तक नहीं बता सकता कि कितने गोवंश उस खर्च के दायरे में आते हैं, तो यह सवाल केवल अव्यवस्था का नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन के लेखे-जोखे और निगरानी का बन जाता है।

इस अज्ञान की सबसे खतरनाक परिणति यह है कि मौतें आंकड़ों में नहीं बदल पातीं। जब मूल संख्या ही स्पष्ट नहीं होगी, तो यह तय करना असंभव हो जाता है कि कितने गोवंश मरे, कितने बीमार पड़े और कितने स्वस्थ रहे। परिणामस्वरूप हर मृत्यु एक अलग घटना बन जाती है—कभी ठंड से, कभी बीमारी से—लेकिन कभी प्रशासनिक विफलता के रूप में दर्ज नहीं होती।

यह भी उल्लेखनीय है कि जिला प्रशासन के पास आज डिजिटल युग में भी ऐसा कोई सार्वजनिक प्लेटफ़ॉर्म नहीं है, जहाँ एक नागरिक या पत्रकार यह देख सके कि— कौन-सी गौशाला सक्रिय है? उसमें कितने गोवंश हैं? और उसका संचालन किस पंचायत के अधीन है?

जब जानकारी इस स्तर पर बिखरी और अपारदर्शी हो, तो जवाबदेही स्वाभाविक रूप से गायब हो जाती है। यही कारण है कि गौशालाओं से जुड़ी हर बड़ी घटना के बाद कुछ दिनों तक हलचल होती है, जांच के आदेश दिए जाते हैं, और फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है—क्योंकि उसे थामने के लिए कोई ठोस आधारभूत रिकॉर्ड मौजूद ही नहीं होता।

इस स्थिति को यदि सख़्त शब्दों में कहा जाए, तो बांदा जिले में गौशालाओं का संचालन प्रबंधन से अधिक भरोसे पर और आंकड़ों से अधिक दावों पर टिका हुआ है। और जब कोई प्रशासन अपने ही दायरे की बुनियादी जानकारी नहीं रखता, तो वह न तो संरक्षण कर सकता है, न निगरानी—और न ही जवाबदेही स्वीकार कर सकता है।

यही वह बिंदु है जहाँ गौशालाएँ केवल पशुओं का नहीं, बल्कि प्रशासनिक असफलता का भी आश्रय स्थल बन जाती हैं।

उल्लेखनीय है कि पंचायती राज व्यवस्था और पशुपालन विभागीय नियमों के अनुसार प्रत्येक गौशाला में गोवंश संख्या, मृत्यु, उपचार और चारा वितरण से संबंधित रजिस्टर का संधारण अनिवार्य है।

व्यवहार में ये रजिस्टर ग्राम पंचायत, विकासखंड और विभागीय कार्यालयों में अलग-अलग रूप में मौजूद तो हैं, लेकिन उनका जिला-स्तर पर कोई समेकन या सार्वजनिक प्रस्तुति नहीं की जाती।

परिणामस्वरूप किसी भी समय यह प्रमाणित करना संभव नहीं हो पाता कि किस अवधि में कितने गोवंश संरक्षित थे और उसी अवधि में कितनी मृत्यु दर्ज हुई।

यही कारण है कि गौशालाओं से जुड़ी गंभीर घटनाएँ प्रशासनिक रिकॉर्ड का हिस्सा बनने के बजाय केवल समाचारों और वीडियो फुटेज तक सीमित रह जाती हैं।

रिकॉर्ड मौजूद हैं, लेकिन एक जगह नहीं

बांदा जिले में गौशालाओं से जुड़े रिकॉर्ड पूरी तरह अनुपस्थित नहीं हैं, लेकिन वे— ग्राम पंचायत स्तर, विकासखंड कार्यालय, पशुपालन विभाग, जिला पंचायत—इन सब जगहों पर बिखरे हुए हैं।

बांदा जिले की गौशालाएँ : मृत्यु, अवस्थान और अव्यवस्था का ग्रामीण भूगोल

बांदा जिले में गौशालाओं की स्थिति को समझने के लिए अलग-अलग घटनाओं को अलग-अलग देखने के बजाय, उन्हें एक ग्रामीण भूगोल और प्रशासनिक संरचना के भीतर रखकर देखना आवश्यक है। वर्ष 2024–25 के दौरान जिले की जिन गौशालाओं से गोवंश मृत्यु की खबरें सामने आईं, वे किसी एक स्थान या एक पंचायत तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि जिले के विभिन्न ग्रामीण क्षेत्रों से क्रमशः सामने आती रहीं। इन घटनाओं का साझा सूत्र अस्थायी संरचना, अपर्याप्त देखरेख और रिकॉर्ड की अनुपस्थिति रहा।

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नरैनी क्षेत्र : बार-बार सामने आती मौतें

नरैनी तहसील क्षेत्र, वर्ष 2024–25 के दौरान गोवंश मृत्यु की खबरों में सबसे अधिक बार सामने आया। इस क्षेत्र की कई ग्राम पंचायतों में अस्थायी गौशालाएँ संचालित हैं, जिनमें गोवंश को खुले या अर्ध-खुले शेडों में रखा गया। ठंड के महीनों में जब तापमान में गिरावट आई, तब इन गौशालाओं में चारा, पानी और ठंड से बचाव की व्यवस्था अपर्याप्त पाई गई।

स्थानीय समाचार पत्रों और ग्रामीण स्तर पर सामने आए वीडियो फुटेज के अनुसार, नरैनी क्षेत्र की गौशालाओं में एक से अधिक अवसरों पर गोवंशों की मौत की सूचना सामने आई। हालांकि इन घटनाओं में प्रशासनिक टीमों के मौके पर पहुँचने और जांच के दावे किए गए, लेकिन कितने गोवंश मरे, किस तिथि को मरे और किन कारणों से मरे—इसका कोई समेकित सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया गया। इस कारण नरैनी क्षेत्र में हुई मौतें आंकड़ों में नहीं, बल्कि घटनाओं के रूप में दर्ज रह गईं।

अतर्रा विकासखंड : खर्च मौजूद, परिणाम गायब

अतर्रा विकासखंड की गौशालाएँ प्रशासनिक दस्तावेज़ों में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में दर्ज की जाती हैं। यहाँ कुछ गौशालाओं में स्थायी ढांचे भी मौजूद हैं और सरकारी मानदेय के भुगतान का रिकॉर्ड भी सामने आया है। इसके बावजूद, इसी क्षेत्र से एक ही गौशाला में अल्प अवधि में कई गोवंशों की मृत्यु की खबरें प्रकाशित हुईं।

इन घटनाओं में प्रमुख रूप से यह तथ्य सामने आया कि सरकारी खर्च का दावा और जमीनी व्यवस्था के बीच सीधा संबंध दिखाई नहीं देता। भुगतान रिकॉर्ड होने के बावजूद गोवंश कमजोर अवस्था में पाए गए, और बीमार पशुओं को समय पर पशु-चिकित्सकीय उपचार नहीं मिल सका। अतर्रा क्षेत्र की घटनाएँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि केवल बजट या भुगतान से गौवंश संरक्षण सुनिश्चित नहीं होता, जब तक देखरेख की निगरानी प्रभावी न हो।

बबेरू तहसील : मौन में दर्ज संकट

बबेरू तहसील क्षेत्र से गोवंश मृत्यु की कोई बड़ी, सामूहिक घटना आधिकारिक रूप से सामने नहीं आई, लेकिन इस क्षेत्र की अस्थायी गौशालाओं की स्थिति को लेकर लगातार असंतोषजनक सूचनाएँ प्रकाशित होती रहीं। स्थानीय रिपोर्टों में चारे की कमी, सीमित क्षमता और अचानक बढ़े गोवंश दबाव का उल्लेख मिलता है।

कुछ पंचायतों में यह स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि गोवंशों को एक गौशाला से दूसरी गौशाला में स्थानांतरित करना पड़ा। इस प्रक्रिया में यदि कोई गोवंश बीमार या मृत हुआ, तो उसका कोई पृथक सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। इस प्रकार बबेरू क्षेत्र में समस्या मौजूद रही, लेकिन वह घटना बनकर सामने नहीं आई, जिससे उसे आधिकारिक स्तर पर दर्ज ही नहीं किया गया।

बांदा सदर के ग्रामीण क्षेत्र : छोटे पैमाने की उपेक्षा

बांदा सदर के आसपास के ग्रामीण इलाकों में स्थित गौशालाएँ संख्या में कम और क्षमता में छोटी हैं। यहाँ से किसी बड़े पैमाने की गोवंश मृत्यु की खबर सामने नहीं आई, लेकिन व्यक्तिगत मौतों और कमजोर पशुओं की सूचनाएँ स्थानीय स्तर पर मिलती रहीं। इन क्षेत्रों में मीडिया कवरेज अपेक्षाकृत कम होने के कारण समस्याएँ व्यापक बहस का विषय नहीं बन सकीं।

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गौशालाओं का ग्रामीण वितरण : पंचायत-आधारित व्यवस्था

बांदा जिले की लगभग सभी गौशालाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं और उनका संचालन ग्राम पंचायतों के माध्यम से होता है। नरैनी, अतर्रा, बबेरू और बांदा सदर—चारों क्षेत्रों में गौशालाएँ मौजूद हैं, लेकिन किस ग्राम पंचायत में कितनी गौशालाएँ हैं, उनमें कितने गोवंश रखे गए हैं और उनकी वर्तमान स्थिति क्या है—इसका कोई सार्वजनिक, अद्यतन दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है।

यही कारण है कि जब गोवंश मृत्यु की घटना होती है, तो वह एक अलग-थलग खबर बनकर सामने आती है, न कि किसी समेकित प्रशासनिक आंकड़े का हिस्सा।

रिकॉर्ड का अभाव : सबसे बड़ा तथ्य

इन सभी घटनाओं और क्षेत्रों को जोड़कर देखने पर सबसे स्पष्ट तथ्य यह उभरता है कि बांदा जिले में—
गौशाला-वार गोवंश संख्या का सार्वजनिक रजिस्टर नहीं है
मृत्यु की तिथि, स्थान और कारण दर्ज करने वाला कोई पारदर्शी दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं है। तहसील-वार या पंचायत-वार समेकित आंकड़े सार्वजनिक डोमेन में नहीं रखे गए हैं। परिणामस्वरूप, गोवंश मृत्यु की घटनाएँ दस्तावेज़ नहीं बन पातीं, और समस्या बार-बार नए सिरे से सामने आती रहती है।

निष्कर्ष के स्थान पर तथ्य

नरैनी, अतर्रा, बबेरू और बांदा सदर—इन सभी ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आई घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि बांदा जिले में गौशालाएँ केवल भौतिक संरचनाओं के रूप में मौजूद हैं। उनके भीतर हो रही मौतें, खर्च और अव्यवस्था आज भी आंकड़ों के बजाय घटनाओं के रूप में दर्ज हो रही हैं।

जब जानकारी इस स्तर पर बिखरी और अपारदर्शी हो, तो जवाबदेही स्वाभाविक रूप से गायब हो जाती है। यही कारण है कि गौशालाओं से जुड़ी हर बड़ी घटना के बाद कुछ दिनों तक हलचल होती है, जांच के आदेश दिए जाते हैं, और फिर मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है—क्योंकि उसे थामने के लिए कोई ठोस आधारभूत रिकॉर्ड मौजूद ही नहीं होता।

इस स्थिति को यदि सख़्त शब्दों में कहा जाए, तो बांदा जिले में गौशालाओं का संचालन प्रबंधन से अधिक भरोसे पर और आंकड़ों से अधिक दावों पर टिका हुआ है। और जब कोई प्रशासन अपने ही दायरे की बुनियादी जानकारी नहीं रखता, तो वह न तो संरक्षण कर सकता है, न निगरानी—और न ही जवाबदेही स्वीकार कर सकता है।

यही वह बिंदु है जहाँ गौशालाएँ केवल पशुओं का नहीं, बल्कि प्रशासनिक असफलता का भी आश्रय स्थल बन जाती हैं।

यह स्थिति किसी एक गौशाला या एक पंचायत की नहीं, बल्कि पूरे जिले की रिकॉर्ड-संस्कृति की कमजोरी को उजागर करती है। यही इस रिपोर्ट का मूल तथ्य है।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बांदा जिले में कुल कितनी गौशालाएँ संचालित हैं?

इसका कोई सार्वजनिक, अद्यतन और समेकित जिला-स्तरीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग विभागों में बिखरे रजिस्टर मौजूद हैं, लेकिन एकीकृत संख्या सामने नहीं आती।

बांदा जिले में गोवंश मृत्यु का आधिकारिक आंकड़ा क्यों स्पष्ट नहीं है?

क्योंकि मृत्यु से जुड़े रजिस्टर गौशाला-वार और पंचायत-वार अलग-अलग रखे जाते हैं, उनका जिला-स्तर पर समेकन और सार्वजनिक प्रस्तुति नहीं की जाती।

क्या गौशालाएँ सरकारी धन से संचालित होती हैं?

हाँ। प्रति गोवंश प्रतिदिन खर्च का सरकारी प्रावधान है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि किस अवधि में कितने गोवंश उस खर्च के दायरे में आए।

क्या यह समस्या केवल बांदा जिले तक सीमित है?

नहीं। बांदा जिला एक उदाहरण है। यह समस्या उत्तर प्रदेश की गौशाला व्यवस्था में व्याप्त रिकॉर्ड-संस्कृति की व्यापक कमजोरी को दर्शाती है।

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