‘जी राम जी’ की ज़मीन पर असली कहानी: 64 करोड़ का बजट, अधूरे काम, महीनों लटका भुगतान और जवाबदेही के गंभीर सवाल

मनरेगा जी राम जी योजना के तहत अधूरा तालाब, भुगतान की मांग करते ग्रामीण मजदूर और सामाजिक अंकेक्षण की बैठक का दृश्य
संजय कुमार वर्मा की रिपोर्ट
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देवरिया। ग्रामीण रोज़गार की सबसे बड़ी सरकारी गारंटी कही जाने वाली ‘जी राम जी’—अर्थात महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना—देवरिया ज़िले में वर्ष 2024–25 के दौरान एक साथ उम्मीद और असंतोष, दोनों की कहानी कहती है। भाटपार रानी और सलेमपुर तहसील, जो सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से श्रम-निर्भर इलाक़े माने जाते हैं, वहाँ इस योजना के तहत काम भी हुए, धन भी आया, लेकिन उसी अनुपात में शिकायतें, देरी और अधूरे कार्य भी सामने आए। यह रिपोर्ट किसी प्रचार या आरोप के बजाय, उपलब्ध आँकड़ों, दर्ज शिकायतों और प्रशासनिक प्रतिक्रियाओं के आधार पर योजना की वास्तविक स्थिति को ब्याख्यात्मक शैली में सामने रखती है। वित्तीय वर्ष 2024–25 में देवरिया ज़िले के इन दोनों तहसीलों के लिए मनरेगा के अंतर्गत कुल मिलाकर लगभग पैंसठ करोड़ रुपये का बजट स्वीकृत किया गया। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा मज़दूरी मद का था, क्योंकि योजना का मूल उद्देश्य ही ग्रामीण परिवारों को मज़दूरी आधारित रोज़गार देना है। मार्च 2025 तक उपलब्ध सरकारी अभिलेख बताते हैं कि इस स्वीकृत बजट का लगभग अस्सी प्रतिशत ही वास्तविक रूप से खर्च हो पाया। यानी तेरह करोड़ रुपये से अधिक की राशि वर्ष के अंत तक अप्रयुक्त रह गई। प्रशासनिक स्तर पर इसका कारण कभी “कार्य-योजना में देरी” बताया गया, तो कभी “तकनीकी स्वीकृतियों के लंबित रहने” का तर्क दिया गया। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि बजट का पूरा उपयोग न हो पाना सीधे-सीधे रोज़गार के अवसरों में कटौती के रूप में सामने आया। भाटपार रानी और सलेमपुर, दोनों तहसीलों में इस वर्ष मनरेगा के अंतर्गत मुख्यतः ग्रामीण संपर्क मार्ग, तालाब खुदाई, जल निकासी, वृक्षारोपण और कुछ सामुदायिक परिसंपत्तियों से जुड़े काम स्वीकृत किए गए। काग़ज़ों में इन कार्यों की संख्या प्रभावशाली दिखती है, लेकिन जब पूर्णता की स्थिति देखी जाती है, तो तस्वीर संतुलित नहीं रहती। दोनों तहसीलों में मिलाकर जितने काम स्वीकृत हुए, उनमें से लगभग एक-तिहाई कार्य वर्ष के अंत तक भी पूरे नहीं हो सके। कई जगहों पर सड़क का एक हिस्सा बन गया, लेकिन नालियां अधूरी रहीं। कहीं तालाब की खुदाई आधी होकर रुक गई। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि काम शुरू तो होता है, लेकिन मज़दूरी भुगतान में देरी और सामग्री की अनुपलब्धता के कारण श्रमिकों की रुचि टूट जाती है। रोज़गार सृजन के आँकड़े इस असंतुलन को और स्पष्ट करते हैं। दोनों तहसीलों में कुल मिलाकर डेढ़ लाख से अधिक जॉब कार्ड पंजीकृत हैं, लेकिन इनमें से सक्रिय जॉब कार्ड की संख्या लगभग साठ प्रतिशत के आसपास ही रही। औसतन एक परिवार को साल भर में चालीस से पचास दिन का ही रोज़गार मिल पाया। मनरेगा जिस “सौ दिन के अधिकार” की बात करती है, वह व्यवहार में केवल पाँच से छह प्रतिशत परिवारों तक सिमट कर रह गया। यह स्थिति तब है, जब कई गांवों में काम की मांग लगातार बनी रही। ग्रामीणों का आरोप है कि मांग दर्ज कराने के बावजूद उन्हें समय पर काम नहीं दिया गया, या फिर काम बहुत सीमित अवधि के लिए खोला गया।
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मज़दूरी भुगतान इस वर्ष का सबसे विवादित पहलू बनकर उभरा। नियमानुसार मनरेगा में काम करने वाले श्रमिकों को पंद्रह दिनों के भीतर भुगतान हो जाना चाहिए, लेकिन भाटपार रानी और सलेमपुर में औसत भुगतान अवधि सत्ताईस से पैंतालीस दिनों के बीच रही। कुछ मामलों में यह देरी दो महीने से भी अधिक हो गई। उदाहरण के तौर पर, भाटपार रानी क्षेत्र के एक गांव में तालाब खुदाई में लगे बयालीस मजदूरों को इकसठ दिन बाद भुगतान मिला। आधिकारिक रिकॉर्ड में इसका कारण PFMS प्रणाली में तकनीकी त्रुटि दर्ज किया गया। सलेमपुर के एक अन्य गांव में उन्नीस महिला श्रमिकों को दो किश्तों में अधूरा भुगतान मिला, जिसकी शिकायत जिला स्तर तक पहुंची। इन मामलों में प्रशासन ने संबंधित ग्राम रोजगार सेवकों से स्पष्टीकरण मांगा और एक तकनीकी सहायक का मानदेय अस्थायी रूप से रोका गया, लेकिन मजदूरों को हुई आर्थिक क्षति की कोई भरपाई नहीं की गई।

जनशिकायतों के आंकड़े भी इस असंतोष को दर्ज करते हैं। वर्ष भर में दोनों तहसीलों से सैकड़ों शिकायतें दर्ज हुईं, जिनमें सबसे अधिक भुगतान देरी, मस्टर रोल में नाम या दिन की ग़लती, और काम की गुणवत्ता से जुड़ी थीं। आधिकारिक निस्तारण दर साठ प्रतिशत से भी कम रही। इसका अर्थ यह है कि लगभग हर दूसरी शिकायत या तो लंबित रही, या उसका समाधान काग़ज़ी स्तर पर ही हुआ। कई ग्रामीणों का कहना है कि शिकायत दर्ज होने के बाद उन्हें दोबारा बुलाया ही नहीं गया, या फिर मौखिक रूप से “देख लिया जाएगा” कहकर मामला टाल दिया गया।

सामाजिक अंकेक्षण, जो मनरेगा की पारदर्शिता का सबसे अहम औज़ार माना जाता है, इस वर्ष अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा सका। दोनों तहसीलों में दर्जनों पंचायतों में सामाजिक अंकेक्षण की तारीखें तय की गईं, लेकिन वास्तव में आधी से भी कम पंचायतों में बैठकें हो सकीं। जहां बैठकें हुईं, वहां भी लिखित अनुपालन रिपोर्ट बहुत सीमित मामलों में तैयार हुई। सलेमपुर क्षेत्र के एक गांव में तालाब खुदाई पर लगभग सात लाख रुपये खर्च दिखाए गए, लेकिन मौके पर केवल चालीस प्रतिशत काम ही नजर आया। यह मामला सामाजिक अंकेक्षण में सामने आया, पर महीनों बाद भी ब्लॉक स्तर पर लंबित बना रहा।

वित्तीय वर्ष 2024–25 में देवरिया ज़िले के लिए मनरेगा के अंतर्गत कुल 312.84 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ, जिसमें से भाटपार रानी और सलेमपुर तहसील के हिस्से में संयुक्त रूप से 64.55 करोड़ रुपये आए। जिला कार्यक्रम समन्वयक कार्यालय के अनुसार मार्च 2025 तक इन दोनों तहसीलों में कुल 51.41 करोड़ रुपये ही व्यय हो सके। इसका अर्थ यह है कि 13.14 करोड़ रुपये, यानी स्वीकृत बजट का लगभग 20.4 प्रतिशत, वर्ष के अंत तक खर्च ही नहीं हो पाया। यह राशि मुख्यतः मज़दूरी मद में अप्रयुक्त रही, जबकि मनरेगा का मूल उद्देश्य ही अधिकतम मज़दूरी सृजन है। प्रशासनिक नोटशीट में इस अव्यय का कारण “कार्य प्रारंभ में विलंब” और “तकनीकी स्वीकृति लंबित रहना” दर्ज है, लेकिन इसका सीधा असर यह हुआ कि हजारों श्रमिकों को अपेक्षित काम नहीं मिल सका।

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कार्य निष्पादन की स्थिति और भी स्पष्ट तस्वीर पेश करती है। भाटपार रानी तहसील में वर्ष भर में 630 कार्य स्वीकृत किए गए थे, जिनमें से 417 कार्य ही पूर्ण दिखाए गए, जबकि 213 कार्य मार्च 2025 तक अपूर्ण रहे। सलेमपुर तहसील में 753 कार्य स्वीकृत हुए, लेकिन इनमें से केवल 450 पूरे हो सके और 303 कार्य अधूरे रह गए। यानी दोनों तहसीलों में कुल स्वीकृत 1,383 कार्यों में से 516 कार्य अधूरे रहे, जो कुल का 37 प्रतिशत से अधिक है। कई ग्राम पंचायतों में तालाब खुदाई और ग्रामीण संपर्क मार्ग जैसे कार्य आधे छोड़ दिए गए, जिनके लिए भुगतान तो दिखा, लेकिन भौतिक प्रगति उससे मेल नहीं खाती।

रोज़गार सृजन के आँकड़े भी इसी असंतुलन की पुष्टि करते हैं। भाटपार रानी में 68,412 जॉब कार्ड पंजीकृत हैं, लेकिन इनमें से केवल 39,580 कार्ड ही सक्रिय रहे। सलेमपुर में 71,906 जॉब कार्ड में से 41,223 सक्रिय पाए गए। औसतन एक परिवार को भाटपार रानी में 47 दिन और सलेमपुर में 44 दिन का ही रोज़गार मिला। पूरे 100 दिन का रोज़गार पाने वाले परिवारों की संख्या भाटपार रानी में 2,184 और सलेमपुर में 1,972 रही। यानी दोनों तहसीलों में कुल सक्रिय जॉब कार्डधारकों का लगभग 5.3 प्रतिशत ही वह अधिकार हासिल कर सका, जिसे मनरेगा की कानूनी गारंटी कहा जाता है।

इन तमाम तथ्यों के बावजूद यह कहना भी ग़लत होगा कि मनरेगा का कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा। कई गांवों में कच्चे रास्तों के सुधरने से स्कूल और बाज़ार तक पहुंच आसान हुई। कुछ इलाकों में जल संरचनाओं से सिंचाई को आंशिक सहारा मिला और वृक्षारोपण से हरित आवरण बढ़ने की उम्मीद बनी। विशेषकर महिलाओं और अनुसूचित जाति-जनजाति परिवारों के लिए यह योजना संकट के समय न्यूनतम आय का सहारा बनी। लेकिन यह सहारा अस्थायी और अनिश्चित रहा, क्योंकि भुगतान की देरी और काम की निरंतरता न होने से भरोसा कमजोर पड़ा।

भाटपार रानी और सलेमपुर की यह संयुक्त तस्वीर बताती है कि ‘जी राम जी’ योजना देवरिया में पूरी तरह विफल नहीं है, लेकिन यह अपने घोषित उद्देश्य—रोज़गार की कानूनी गारंटी—को भी पूरी तरह साकार नहीं कर पाई। धन की उपलब्धता के बावजूद उसका पूरा उपयोग न हो पाना, शिकायतों का धीमा निस्तारण और सामाजिक अंकेक्षण की कमजोर स्थिति, इस योजना को काग़ज़ और ज़मीन के बीच अटका हुआ दिखाती है।

यह दस्तावेज़ी समीक्षा किसी एक अधिकारी या विभाग पर दोष मढ़ने के लिए नहीं, बल्कि यह दर्ज करने के लिए है कि यदि मनरेगा जैसी योजना में भी जवाबदेही, समयबद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की गई, तो वह ग्रामीणों के लिए अधिकार से अधिक कृपा बनकर रह जाएगी। देवरिया के भाटपार रानी और सलेमपुर से निकलती यह कहानी दरअसल पूरे तंत्र के लिए एक चेतावनी है—कि आँकड़ों की चमक के पीछे छिपी ज़मीनी सच्चाई को अनदेखा करना, सबसे बड़ी नीतिगत भूल होगी।

भुगतान से जुड़ी शिकायतें इस वर्ष सबसे गंभीर मुद्दा बनकर उभरीं। जिला शिकायत निवारण पोर्टल और ब्लॉक रजिस्टर के अनुसार भाटपार रानी और सलेमपुर से कुल 312 शिकायतें केवल भुगतान में देरी को लेकर दर्ज हुईं। इनमें से 197 शिकायतों को “निस्तारित” दिखाया गया, जबकि 115 शिकायतें मार्च 2025 तक लंबित रहीं। उदाहरण के तौर पर भाटपार रानी तहसील के ग्राम बैतालपुर में तालाब खुदाई कार्य में लगे 42 मजदूरों को नियमानुसार भुगतान 15 दिनों के भीतर होना था, लेकिन उन्हें 61वें दिन मजदूरी मिली। जांच में यह बात सामने आई कि मस्टर रोल समय पर अपलोड न करने के कारण भुगतान अटका। इस प्रकरण में संबंधित ग्राम रोजगार सेवक से लिखित स्पष्टीकरण लिया गया और तकनीकी सहायक का एक माह का मानदेय रोका गया, जिसका आदेश खंड विकास अधिकारी की फाइल में दर्ज है।

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सलेमपुर तहसील के लार रोड ब्लॉक के एक गांव में 19 महिला श्रमिकों ने यह शिकायत दर्ज कराई कि उन्हें 12 दिनों के कार्य के बदले केवल 7 दिनों का भुगतान मिला। शिकायत संख्या DRIA/2024/1178 पर हुई जांच में मस्टर रोल में दिन कम दर्ज करने की पुष्टि हुई। इसके बाद संशोधित मस्टर रोल अपलोड कराया गया और शेष भुगतान 23 दिन की देरी से किया गया। इस मामले में ग्राम रोजगार सेवक को कारण बताओ नोटिस जारी हुआ, जिसकी प्रति ब्लॉक कार्यालय में उपलब्ध है।

कार्य गुणवत्ता से जुड़ी शिकायतें भी केवल काग़ज़ी नहीं रहीं। वर्ष 2024–25 में दोनों तहसीलों से कुल 98 शिकायतें सीधे निर्माण गुणवत्ता को लेकर दर्ज हुईं। इनमें से केवल 41 मामलों में ही औपचारिक जांच कराई गई। सलेमपुर तहसील के ग्राम महुआडीह में 6.8 लाख रुपये की लागत से तालाब खुदाई का कार्य स्वीकृत था। सामाजिक अंकेक्षण में यह पाया गया कि मौके पर केवल लगभग 40 प्रतिशत खुदाई ही हुई है, जबकि भुगतान 80 प्रतिशत से अधिक दिखाया गया। इस मामले में सहायक अभियंता की रिपोर्ट के आधार पर आगे के भुगतान पर रोक लगाई गई और पुनः मापन का आदेश दिया गया, लेकिन मार्च 2025 तक यह मामला ब्लॉक स्तर पर ही लंबित रहा, और किसी प्रकार की रिकवरी नहीं हो सकी।

सामाजिक अंकेक्षण की स्थिति भी इन्हीं आँकड़ों से जुड़ती है। वर्ष के दौरान भाटपार रानी और सलेमपुर की कुल 62 पंचायतों में सामाजिक अंकेक्षण प्रस्तावित था, लेकिन वास्तविक बैठकें केवल 37 पंचायतों में ही हो सकीं। इन बैठकों में उठाए गए 54 मामलों में से केवल 19 मामलों में ही लिखित अनुपालन रिपोर्ट तैयार की गई। शेष मामलों में “कार्रवाई प्रक्रियाधीन” या “ब्लॉक स्तर पर विचाराधीन” जैसी टिप्पणियाँ दर्ज की गईं, जो महीनों बाद भी बदली नहीं गईं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जी राम जी योजना में सबसे बड़ी समस्या क्या सामने आई?

भुगतान में देरी, अधूरे कार्य और शिकायतों का समय पर निस्तारण न होना।

क्या शिकायतों पर कोई कार्रवाई हुई?

कुछ मामलों में स्पष्टीकरण, मानदेय रोकने और भुगतान सुधार की कार्रवाई हुई, लेकिन अधिकांश शिकायतें लंबित रहीं।

क्या योजना से ग्रामीणों को वास्तविक लाभ मिला?

सीमित अवधि के लिए लाभ मिला, लेकिन भुगतान देरी और काम की अनिश्चितता से भरोसा कमजोर पड़ा।

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