
जम्मू-कश्मीर के खेतों में खाद का संकट: कालाबाजारी, लाचार किसान और टूटता भरोसा
जम्मू-कश्मीर में खेती केवल अन्न उत्पादन का साधन नहीं,
बल्कि ग्रामीण जीवन, आर्थिक संतुलन और सामाजिक स्थिरता की रीढ़ है।
लेकिन आज यही खेती एक गहरे संकट से गुजर रही है।
यूरिया, डीएपी और अन्य आवश्यक खादों की भारी किल्लत,
खुलेआम हो रही कालाबाजारी और प्रशासनिक उदासीनता ने
किसानों को हताशा की उस स्थिति में पहुँचा दिया है
जहाँ खेती लाभ नहीं, बोझ बनती जा रही है।
खाद संकट की जड़ें: आपूर्ति व्यवस्था से लेकर निगरानी तक
जम्मू-कश्मीर में खाद संकट किसी एक मौसम की उपज नहीं है।
यह वर्षों से कमजोर होती आपूर्ति श्रृंखला,
अपर्याप्त निगरानी और बिचौलियों की गहरी पकड़ का नतीजा है।
सरकारी गोदामों से निकलने वाली सब्सिडी युक्त खाद
अक्सर तयशुदा दुकानों तक नहीं पहुँच पाती।
रास्ते में ही यह खाद कालाबाजारी का हिस्सा बन जाती है
और फिर वही खाद किसानों को दोगुने दाम पर खरीदनी पड़ती है।
कागजी आंकड़ों में खाद की उपलब्धता पर्याप्त दिखाई देती है,
लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है।
यह अंतर स्पष्ट करता है कि समस्या उत्पादन की नहीं,
बल्कि वितरण और नियंत्रण की है।
कालाबाजारी और नकली खाद: खेती पर दोहरी मार
खाद की कमी ने नकली और मिलावटी खाद के कारोबार को भी बढ़ावा दिया है।
कई किसान बताते हैं कि उन्हें महंगे दाम चुकाने के बावजूद
ऐसी खाद मिल रही है जिसका फसल पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता।
नकली खाद से न केवल उत्पादन घटता है,बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी लंबे समय के लिए प्रभावित होती है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, एक बार मिट्टी की जैविक संरचना बिगड़ जाए, तो उसे पुनः उपजाऊ बनाने में वर्षों लग जाते हैं। यह संकट केवल वर्तमान फसल का नहीं, आने वाली पीढ़ियों की खेती का भी है।
किसानों पर सीधा असर: लागत बढ़ी, विश्वास घटा
इस खाद संकट का सबसे बड़ा भार छोटे और सीमांत किसानों पर पड़ा है। खाद के लिए घंटों लाइन में लगना,
दुकानों से खाली हाथ लौटना और अंततः कालाबाजारी से महंगी खाद खरीदना अब किसानों की रोजमर्रा की मजबूरी बन चुका है।
खेती की लागत बढ़ने से किसान कर्ज के दलदल में फँस रहे हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में खाद को लेकर तनाव, आपसी विवाद और प्रशासन के प्रति नाराजगी तेजी से बढ़ती जा रही है।
प्रशासनिक दावे और जमीनी हकीकत का टकराव
प्रशासन समय-समय पर छापेमारी और कार्रवाई के दावे करता है, लेकिन इनका असर सीमित नजर आता है। कुछ दुकानों पर जुर्माना या स्टॉक जब्ती समस्या का स्थायी समाधान नहीं बन पाई है।
किसानों का कहना है कि नीतियाँ फाइलों में तो प्रभावी दिखती हैं,लेकिन खेत तक पहुँचते-पहुँचते निष्प्रभावी हो जाती हैं।
समाधान की दिशा: तात्कालिक और दीर्घकालिक उपाय
खाद संकट से निपटने के लिए केवल दंडात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। डिजिटल ट्रैकिंग, क्यूआर कोड आधारित स्टॉक निगरानी,और किसानों के लिए सीधी शिकायत व्यवस्था
इस दिशा में प्रभावी कदम हो सकते हैं।
इसके साथ-साथ जैविक और वैकल्पिक खादों को बढ़ावा देकर रासायनिक खाद पर निर्भरता कम की जा सकती है।
कृषि विभाग को चाहिए कि वह किसानों को वैज्ञानिक खेती का प्रशिक्षण भी दे।
खेती का सवाल, सम्मान का सवाल
जम्मू-कश्मीर का खाद संकट केवल कृषि संकट नहीं,
बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता और नीति-निर्माण की परीक्षा है।
यदि किसान को समय पर खाद नहीं मिलेगी, तो न फसल बचेगी और न आत्मनिर्भरता।
आज जरूरत इस बात की है कि किसान की आवाज को फाइलों में दबने न दिया जाए। क्योंकि जब खेत सूखते हैं,
तो केवल फसल नहीं— पूरा भविष्य दरकने लगता है।
❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
जम्मू-कश्मीर में खाद की कमी क्यों हो रही है?
कमजोर आपूर्ति व्यवस्था, कालाबाजारी और निगरानी की कमी खाद संकट के मुख्य कारण हैं।
खाद की कालाबाजारी से किसानों को क्या नुकसान हो रहा है?
खेती की लागत बढ़ रही है, मुनाफा घट रहा है और नकली खाद से फसल व मिट्टी दोनों को नुकसान हो रहा है।
क्या नकली खाद खेती के लिए खतरनाक है?
हाँ, नकली खाद से मिट्टी की उर्वरता घटती है और दीर्घकालिक उत्पादन प्रभावित होता है।
इस समस्या का स्थायी समाधान क्या है?
पारदर्शी वितरण प्रणाली, डिजिटल ट्रैकिंग और जैविक विकल्पों को बढ़ावा देना स्थायी समाधान हो सकते हैं।
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