दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
उत्तर प्रदेश का बलरामपुर—एक ऐसा ज़िला जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं का मूल्यांकन केवल अस्पतालों की गिनती से नहीं किया जा सकता। यहाँ स्वास्थ्य व्यवस्था को समझने के लिए प्रशासनिक आंकड़ों, विभागीय दावों, वर्ष भर चले विवादों और आम नागरिक के अनुभव—इन चारों को एक साथ पढ़ना पड़ता है। वर्ष 2024–25 में यह अंतर पहले से अधिक स्पष्ट हुआ है कि काग़ज़ पर दर्ज “प्रगति” और ज़मीन पर महसूस की गई “सेवा” एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहीं।
यह रिपोर्ट उसी असंतुलन का दस्तावेज़ है—जहाँ संख्या है, लेकिन संतोष नहीं; भवन हैं, पर भरोसा डगमगाता दिखता है।
स्वास्थ्य ढाँचा: संख्या पर्याप्त, पर प्रभाव सीमित
स्वास्थ्य विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार बलरामपुर में इस समय 1 जिला चिकित्सालय, 4 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), लगभग 22 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और 160 से अधिक उपकेंद्र (Sub-Centre) संचालित बताए जाते हैं। कुल मिलाकर यह ढाँचा लगभग 24–25 लाख की आबादी के लिए निर्धारित है।
राष्ट्रीय मानकों की कसौटी पर देखें तो काग़ज़ी रूप से यह व्यवस्था असंतुलित नहीं दिखती। लेकिन यहीं से असली सवाल शुरू होता है—क्या यह ढाँचा उतनी ही क्षमता से काम भी कर रहा है?
जिला अस्पताल की इमारत, नए वार्ड और बढ़ी हुई OPD संख्या यह संकेत देती है कि निवेश हुआ है। मगर जब इन संस्थानों के भीतर झाँकते हैं, तो साफ़ दिखता है कि ढाँचा मौजूद है, पर उसका उपयोग आंशिक और असंगत है।
डॉक्टरों और स्टाफ की स्थिति: आंकड़े जो व्यवस्था की पोल खोलते हैं
वर्ष 2024–25 में स्वास्थ्य विभाग के अनुसार जिले में डॉक्टरों के लगभग 210 पद स्वीकृत हैं, लेकिन कार्यरत डॉक्टरों की संख्या 135 से 145 के बीच ही सिमटी हुई है। इसका अर्थ यह है कि लगभग 30–35 प्रतिशत पद रिक्त हैं।
विशेषज्ञ डॉक्टरों की स्थिति और अधिक चिंताजनक है। सर्जन, एनेस्थेटिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट और फिजीशियन जैसे अहम पदों में 45–50 प्रतिशत तक रिक्तियाँ दर्ज की गईं।
यह केवल “रिक्त पद” नहीं है—यही वह मूल कारण है जिसकी वजह से जिला अस्पताल और CHC बार-बार मरीजों को लखनऊ, गोंडा या श्रावस्ती रेफर करते हैं। इलाज की जिम्मेदारी काग़ज़ पर स्थानीय व्यवस्था की होती है, लेकिन व्यवहार में किसी और जिले की।
नर्सिंग स्टाफ की स्थिति भी इससे अलग नहीं। स्वीकृत लगभग 480 पदों के मुकाबले करीब 320 नर्सें ही कार्यरत हैं। इसका सीधा असर आपातकालीन सेवाओं, रात्रि ड्यूटी और प्रसव कक्षों पर पड़ता है। कई बार एक नर्स को दो वार्ड संभालने पड़ते हैं—जिसका प्रभाव सेवा की गुणवत्ता पर साफ़ दिखता है।
जिला अस्पताल: भीड़, सीमित सेवा और बढ़ता असंतोष
जिला चिकित्सालय की OPD में प्रतिदिन औसतन 1200 से 1500 मरीजों का पंजीकरण होता है। यह आंकड़ा बताता है कि आम जनता की निर्भरता अब भी सरकारी अस्पतालों पर बनी हुई है।
लेकिन इन्हीं मरीजों में से केवल 25–30 प्रतिशत को ही विशेषज्ञ परामर्श मिल पाता है। शेष को या तो सामान्य दवाओं तक सीमित रखा जाता है या फिर बाहर रेफर कर दिया जाता है।
यही अंतर प्रशासनिक आंकड़ों से कहीं अधिक जनमानस की धारणा को प्रभावित करता है। लोगों के बीच यह भावना गहरी होती जा रही है कि “सरकारी अस्पताल में इलाज नहीं, केवल औपचारिकता होती है।”
डॉक्टरों का व्यवहार और उपस्थिति: सबसे बड़ा अविश्वास
इस वर्ष स्वास्थ्य विभाग को लेकर जो शिकायतें सबसे अधिक सामने आईं, वे डॉक्टरों के व्यवहार और उपस्थिति से जुड़ी रहीं। स्थानीय शिकायतों और निरीक्षण रिपोर्टों में यह बात उभरकर आई कि कई PHC और CHC में डॉक्टर नियमित समय पर नहीं पहुँचते।
यह भी सामने आया कि बायोमेट्रिक उपस्थिति दर्ज होने के बावजूद कई मामलों में शारीरिक मौजूदगी संदिग्ध रही। मरीजों से संवाद में संवेदनशीलता के अभाव की शिकायतें भी कम नहीं रहीं।
स्वास्थ्य सेवा केवल तकनीकी नहीं, मानवीय व्यवहार पर भी निर्भर करती है। जब डॉक्टर मरीज को “बोझ” की तरह देखने लगें, तो अस्पताल सेवा केंद्र नहीं, बल्कि भय का स्थान बन जाता है।
इस वर्ष के विवाद: जब व्यवस्था सवालों के घेरे में आई
2024 में जिला अस्पताल की CT-Scan मशीन कई महीनों तक बंद रही। तकनीकी खराबी, रख-रखाव अनुबंध और भुगतान से जुड़े विवादों ने यह स्थिति पैदा की। इस दौरान प्रतिदिन औसतन 35–40 मरीज निजी डायग्नोस्टिक सेंटरों में जांच कराने को मजबूर हुए।
यह केवल मशीन खराब होने का मामला नहीं था, बल्कि ठेकेदारी और निगरानी व्यवस्था की विफलता का उदाहरण बना।
इसी तरह कुछ प्रसव और मातृ-शिशु मामलों में समय पर डॉक्टर न मिलने, रेफरल में देरी और एंबुलेंस की अनुपलब्धता को लेकर गंभीर आरोप लगे। विभागीय जांच और नोटिस जरूर जारी हुए, लेकिन जनमानस में यह संदेश गया कि जवाबदेही से अधिक औपचारिकता निभाई गई।
वर्ष के कई महीनों में PHC और जिला अस्पताल में एंटीबायोटिक, ब्लड प्रेशर और मधुमेह की दवाओं की कमी की शिकायतें भी सामने आईं। यह विवाद सीधे स्वास्थ्य बजट और खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।
स्वास्थ्य संकेतक: आंकड़े जो चेतावनी देते हैं
NFHS और जिला स्तरीय अनुमानों के अनुसार संस्थागत प्रसव दर लगभग 82 प्रतिशत है, लेकिन शिशु मृत्यु दर राज्य औसत से अधिक बनी हुई है। 35 प्रतिशत से अधिक बच्चे किसी न किसी स्तर पर कुपोषण से प्रभावित हैं।
ये आंकड़े बताते हैं कि भवन और योजनाओं के बावजूद परिणाम आधारित सुधार अभी अधूरा है।
प्रशासनिक लेखा-जोखा: प्रक्रिया है, प्रभाव नहीं
स्वास्थ्य विभाग में निरीक्षण रिपोर्ट, ऑडिट टिप्पणियाँ और शिकायत रजिस्टर मौजूद हैं। लेकिन अधिकांश मामलों में कार्रवाई चेतावनी, स्थानांतरण या फाइल बंद करने तक सीमित रहती है।
यही कारण है कि विवाद हर वर्ष लौटते हैं—क्योंकि सिस्टम बदलता नहीं, केवल प्रतिक्रिया देता है।
समग्र दृष्टि
यह समीक्षा स्पष्ट करती है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं है। यह प्रशासनिक इच्छाशक्ति, अनुशासन और संवेदनशीलता की परीक्षा है। जब आंकड़े उपलब्ध हों लेकिन उनका असर मरीज तक न पहुँचे—जब डॉक्टर हों लेकिन भरोसा न हो—और जब विवाद हों लेकिन सुधार न दिखे—तो स्वास्थ्य व्यवस्था केवल एक सरकारी विभाग बनकर रह जाती है, जनसेवा नहीं।
2024–25 का वर्ष एक चेतावनी है कि यदि सुधार को केवल रिपोर्ट और आंकड़ों तक सीमित रखा गया, तो अस्पताल खड़े रहेंगे—लेकिन जनता का भरोसा नहीं।
❓ पाठकों के सवाल
सरकारी अस्पतालों में रेफरल क्यों बढ़ रहे हैं?
विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, सीमित तकनीकी सुविधाएँ और जिला स्तर पर सुपर स्पेशलिटी सेवाओं का अभाव इसका मुख्य कारण है।
डॉक्टरों की उपस्थिति को लेकर शिकायतें क्यों आती हैं?
मानव संसाधन की कमी, प्रशासनिक निगरानी की कमजोरी और निजी प्रैक्टिस की प्रवृत्ति इसके प्रमुख कारण बताए जाते हैं।
क्या जिले की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार संभव है?
यदि जवाबदेही, समयबद्ध निगरानी और संसाधनों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित किया जाए, तो सुधार संभव है।










