छत्तीसगढ़ में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर किए जाने वाले दावे और ज़मीनी सच्चाई के बीच का फासला लगातार गहराता जा रहा है।
प्रदेश के जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की वर्तमान स्थिति यह सवाल खड़ा करती है कि क्या केवल इमारतें खड़ी कर देना ही
एक मजबूत स्वास्थ्य व्यवस्था का प्रमाण हो सकता है। जब जीवनरक्षक सुविधाएं ही मौजूद न हों, तो आम नागरिक के लिए सरकारी
अस्पतालों पर भरोसा करना एक मजबूरी भर बनकर रह जाता है।
प्रदेश के 9 जिला अस्पतालों में आज तक आईसीयू की सुविधा उपलब्ध नहीं है, जबकि 12 जिला चिकित्सालय ऐसे हैं,
जहां सीटी स्कैन मशीन तक नहीं है। यह आंकड़े सिर्फ प्रशासनिक रिपोर्ट नहीं, बल्कि उन हजारों मरीजों की पीड़ा का दस्तावेज
हैं, जिन्हें गंभीर स्थिति में इलाज के लिए रायपुर या बिलासपुर रेफर कर दिया जाता है।
कई मामलों में यह रेफरल मरीज के लिए जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी तय करता है।
सड़क दुर्घटनाएं, हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक, गंभीर संक्रमण या आंतरिक चोट जैसे मामलों में समय पर जांच और इलाज बेहद जरूरी होता है।
लेकिन जब जिला अस्पतालों में आईसीयू या सीटी स्कैन जैसी बुनियादी सुविधाएं ही मौजूद न हों,
तो डॉक्टर भी सीमित साधनों में काम करने को मजबूर हो जाते हैं।
परिणामस्वरूप मरीजों को बड़े शहरों की ओर भेज दिया जाता है, जहां पहुंचते-पहुंचते कई बार कीमती समय हाथ से निकल जाता है।
सरकारी तंत्र इस स्थिति को अक्सर “रेफरल व्यवस्था” कहकर सामान्य बना देता है, लेकिन वास्तव में यह व्यवस्था की विफलता को ढकने
का एक तरीका बनती जा रही है। दूरदराज़ जिलों से रायपुर या बिलासपुर तक की यात्रा, एंबुलेंस की उपलब्धता,
सड़कों की स्थिति और मरीज की नाजुक हालत — ये सभी मिलकर जोखिम को कई गुना बढ़ा देते हैं।
इस पूरी प्रक्रिया में सबसे ज्यादा नुकसान गरीब और मध्यम वर्गीय परिवारों को उठाना पड़ता है।
जांच में देरी या बार-बार रेफरल के कारण मजबूरी में मरीजों को निजी अस्पतालों और जांच केंद्रों का सहारा लेना पड़ता है,
जहां इलाज का खर्च उनकी आर्थिक क्षमता से कहीं अधिक होता है।
सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की कमी का सीधा लाभ निजी स्वास्थ्य सेक्टर को मिलता दिखाई देता है।
स्थिति जिला अस्पतालों तक सीमित नहीं है। प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों की हालत भी कोई संतोषजनक तस्वीर पेश नहीं करती।
छत्तीसगढ़ के 10 मेडिकल कॉलेजों में से 6 में एमआरआई मशीन नहीं है,
जबकि 3 मेडिकल कॉलेजों में सीटी स्कैन की सुविधा तक उपलब्ध नहीं।
यह तथ्य उन दावों पर सवाल खड़े करता है, जिनमें मेडिकल कॉलेजों को उन्नत इलाज और विशेषज्ञ प्रशिक्षण का केंद्र बताया जाता है।
महासमुंद और दुर्ग मेडिकल कॉलेजों में तो क्रिटिकल आईसीयू तक की सुविधा नहीं है।
जगदलपुर, रायगढ़, राजनांदगांव, कोरबा, महासमुंद और दुर्ग ऐसे मेडिकल कॉलेज हैं,
जहां एक भी एमआरआई मशीन मौजूद नहीं है।
कोरबा, महासमुंद और दुर्ग में सीटी स्कैन सुविधा के अभाव में मरीजों को निजी जांच केंद्रों पर निर्भर रहना पड़ता है।
मेडिकल कॉलेज केवल इलाज का ही नहीं, बल्कि भविष्य के डॉक्टरों के प्रशिक्षण का भी केंद्र होते हैं।
जब इन संस्थानों में आधुनिक जांच और उपचार सुविधाएं उपलब्ध नहीं हों,
तो इसका सीधा असर चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पर भी पड़ता है।
यह सवाल भी उठता है कि जब बजट स्वीकृत होता है, तो मशीनों की स्थापना और संचालन वर्षों तक क्यों लटका रहता है।
सरकारी फाइलों में यह सभी सुविधाएं “प्रस्तावित”, “प्रक्रियाधीन” या “शीघ्र स्थापित होने वाली” के रूप में दर्ज रहती हैं,
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि हर दिन मरीज इन अधूरी व्यवस्थाओं की कीमत चुका रहा है।
यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय का रूप ले चुकी स्थिति है।
स्वास्थ्य बजट में वृद्धि के दावों के बावजूद प्राथमिकता तय करने में गंभीर कमी दिखाई देती है।
भवन निर्माण, उद्घाटन समारोह और घोषणाएं सुर्खियां बन जाती हैं,
लेकिन उपकरण, विशेषज्ञ डॉक्टरों की नियुक्ति और रखरखाव जैसे बुनियादी मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं।
यदि जिला अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों को समय रहते सशक्त किया जाता,
तो न रेफरल का बोझ बढ़ता और न ही जनता का भरोसा डगमगाता।
छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था इस समय एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है,
जहां सिर्फ घोषणाओं से काम नहीं चलने वाला।
जरूरत है ठोस निर्णय, स्पष्ट प्राथमिकता और वास्तविक जवाबदेही की।
अन्यथा अस्पतालों की ये अधूरी सुविधाएं यूं ही मरीजों के लिए एक अंतहीन संघर्ष बनी रहेंगी।
❓ सवाल–जवाब
क्या जिला अस्पतालों में आईसीयू न होना सामान्य है?
नहीं। गंभीर मरीजों के लिए जिला अस्पतालों में कम से कम बेसिक आईसीयू सुविधा आवश्यक मानी जाती है।
मरीजों को बार-बार रायपुर या बिलासपुर क्यों रेफर किया जाता है?
क्योंकि कई जिलों में सीटी स्कैन, एमआरआई और क्रिटिकल केयर जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
मेडिकल कॉलेजों में जांच सुविधाएं क्यों अधूरी हैं?
उपकरणों की खरीद, स्थापना में देरी और रखरखाव की कमी इसके प्रमुख कारण हैं।
इसका सबसे ज्यादा असर किस पर पड़ता है?
गरीब और मध्यम वर्गीय मरीजों पर, जिन्हें मजबूरी में महंगा निजी इलाज कराना पड़ता है।










