बहराइच 2024–25 : वह वर्ष, जब तराई में भेड़िया आतंक चेतावनी बनकर दर्ज हुआ


चुन्नीलाल प्रधान की विशेष रिपोर्ट
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नेपाल सीमा से सटे तराई अंचल का बहराइच जिला वर्ष 2024–25 में किसी एक घटना या किसी एक मौसम की त्रासदी से नहीं, बल्कि एक पूरे सिलसिले से पहचाना गया। यह वह वर्ष रहा, जब भेड़िया हमले केवल खबर नहीं रहे, बल्कि प्रशासनिक फाइलों, अस्पताल रजिस्टरों और ग्रामीण स्मृतियों में दर्ज होती चली गईं। यह लेख उसी कालखंड का एक संयमित और संतुलित दस्तावेज़ है—जिसका उद्देश्य न तात्कालिक उत्तेजना है और न भावनात्मक अतिरंजन, बल्कि भविष्य के लिए रिकॉर्ड छोड़ना है।

तराई का भूगोल और मानव–वन्यजीव टकराव की पृष्ठभूमि

बहराइच की तराई दशकों से जंगल, नदी, दलदली भूमि और बिखरी ग्रामीण बसावट का साझा क्षेत्र रही है। गांव और जंगल के बीच कोई स्पष्ट रेखा नहीं है। कच्चे घर, खुले आंगन, बरामदे में सोते बच्चे, पशुपालन और जलावन की निर्भरता—इन सबने लंबे समय तक सहअस्तित्व का स्वरूप बनाए रखा। लेकिन 2024–25 में यही निकटता मानव–वन्यजीव संघर्ष का स्थायी कारण बन गई। असामान्य कोहरा, ठंड के मौसम में अधखुले घर और जंगल के भीतर भोजन-श्रृंखला में आए बदलाव ने भेड़िये को गांव की सीमा लांघने का अवसर दिया।

पूरे वर्ष का सांख्यिकीय परिदृश्य : संख्या जो साक्ष्य बनी

जिला प्रशासन, वन विभाग, पुलिस रिकॉर्ड, अस्पताल रजिस्टर और मुआवज़ा फाइलों में उपलब्ध प्रविष्टियों को एक साथ रखने पर वर्ष 2024–25 में बहराइच में लगभग 55 से 60 भेड़िया हमले अथवा हमले-प्रयास दर्ज मिलते हैं। इन घटनाओं में लगभग 30 से 32 बच्चे सीधे तौर पर प्रभावित हुए। इनमें से 8 से 10 बच्चों की मृत्यु दर्ज हुई, जबकि एक दर्जन से अधिक बच्चे गंभीर रूप से घायल हुए। महिलाओं पर भी हमले हुए—कुछ खेत से लौटते समय, कुछ रात या भोर में बाहर निकलते हुए। कुल पीड़ितों में 60 प्रतिशत से अधिक बच्चे होना इस संकट का सबसे निर्णायक संकेत है।

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भोर का समय : दोहराता हुआ पैटर्न

रिकॉर्ड यह भी दर्शाते हैं कि लगभग आधी घटनाएं भोर के समय हुईं—जब गांव जाग रहा होता है, लेकिन पूरी तरह सतर्क नहीं होता। यह वह समय है जब बच्चे मां के साथ होते हैं, खेत जाने की तैयारी होती है और कोहरा दृश्यता को सीमित कर देता है। रात के समय की घटनाएं इस पैटर्न को पूरा करती हैं, जबकि दिन में होने वाले हमले प्रायः जंगल या खेत की परिधि से जुड़े रहे। फखरपुर, मिहींपुरवा (मोतीपुर), तेजवापुर और कतर्नियाघाट परिधि बार-बार फाइलों में लौटते रहे।

घटनाएं जो पूरे वर्ष का रूपक बन गईं

फखरपुर क्षेत्र के रसूलपुर दरेहटा गांव में भोर के समय मां की गोद से तीन वर्षीय बच्चे का भेड़िये द्वारा खींच ले जाना इस वर्ष की सबसे प्रतीकात्मक घटना बनी। इससे पहले मोतीपुर क्षेत्र में सितंबर 2024 की घटना दर्ज है, जब शौच के लिए बाहर निकली छह वर्षीय बालिका भेड़िये का शिकार बनी। तेजवापुर में गर्भवती महिला पर हमला और कतर्नियाघाट परिधि में एक ही सप्ताह में तीन बच्चों पर हमले—ये सभी घटनाएं अलग-अलग नहीं थीं, बल्कि एक ही वर्ष की अलग-अलग प्रविष्टियां थीं।

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प्रशासनिक और वन विभागीय प्रतिक्रिया : दर्ज प्रयास

रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि वन विभाग ने संवेदनशील इलाकों में पिंजरे लगाए, ट्रैंकुलाइजेशन के प्रयास किए और विशेष टीमें गठित कीं। जिला प्रशासन ने कई गांवों को संवेदनशील घोषित किया, रात्रि गश्त बढ़ाई और पीड़ित परिवारों को मुआवज़ा दिया। इन प्रयासों का उल्लेख आवश्यक है, ताकि यह न कहा जाए कि चेतावनी के बाद कुछ नहीं किया गया। लेकिन उतना ही आवश्यक यह दर्ज करना भी है कि इन प्रयासों के बावजूद हमले रुके नहीं।

ग्रामीण समाज पर प्रभाव : एक मौन बदलाव

इस वर्ष का स्थायी प्रभाव ग्रामीण जीवन में आए बदलाव के रूप में दर्ज होता है। बच्चे अकेले नहीं सोए, महिलाएं अकेले नहीं निकलीं, कई गांवों में सामूहिक रूप से जागने और सोने की प्रवृत्ति बनी। कुछ परिवारों ने अस्थायी पलायन किया। यह परिवर्तन किसी आदेश से नहीं, बल्कि भय से आया—और यही भय इस दस्तावेज़ की सबसे मौन लेकिन सबसे मजबूत पंक्ति है।

यह लेख समाधान नहीं सुझाता। यह केवल यह दर्ज करता है कि 2024–25 में बहराइच ने बार-बार संकेत दिए। फाइलों में घटनाएं जुड़ती रहीं, आंकड़े बढ़ते रहे और हर नई सुबह एक नई आशंका लेकर आई। भविष्य में जब पूछा जाएगा कि यह सब अचानक कैसे हुआ, तो यह रिकॉर्ड बताएगा—यह अचानक नहीं था, यह दर्ज था।

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🔎 बहराइच भेड़िया आतंक : पाठकों के प्रमुख सवाल

बहराइच में भेड़िया हमलों की संख्या 2024–25 में क्यों बढ़ी?

जंगल और गांव की सीमाओं का घुलना, तराई में घना कोहरा, खुले आवास और भोजन-श्रृंखला में बदलाव—इन सभी कारणों ने भेड़िया हमलों की आवृत्ति बढ़ाई।

भेड़िया हमलों में सबसे अधिक शिकार कौन बना?

उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार कुल पीड़ितों में 60 प्रतिशत से अधिक बच्चे रहे, जो इस संकट को केवल वन्यजीव समस्या नहीं, सामाजिक असुरक्षा का प्रश्न बनाता है।

बहराइच में भेड़िया हमले किस समय सबसे अधिक हुए?

भोर के समय (सुबह 4 से 7 बजे के बीच) सबसे अधिक घटनाएं दर्ज हुईं, जब दृश्यता कम होती है और ग्रामीण दिनचर्या प्रारंभ होती है।

क्या प्रशासन और वन विभाग ने समय पर कार्रवाई की?

रिकॉर्ड दर्शाते हैं कि पिंजरे, गश्त और मुआवज़ा जैसे कदम उठाए गए, लेकिन तराई के भूगोल और संसाधनों की सीमा के कारण इनके परिणाम सीमित रहे।

क्या बहराइच का भेड़िया आतंक अचानक पैदा हुआ संकट था?

नहीं। 2024–25 में घटनाएं क्रमबद्ध रूप से दर्ज होती रहीं। यह संकट अचानक नहीं, बल्कि चेतावनियों के अनदेखा होने का परिणाम था।

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