‘जी राम जी’ (मनरेगा) 2025 : उत्तर प्रदेश का सच — जहाँ उम्मीदें काम बनीं, और काम सवाल

दुर्गा प्रसाद शुक्ला की रिपोर्ट
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उत्तर प्रदेश जैसे देश के सबसे बड़े और सामाजिक रूप से विविध प्रदेश में कोई भी जनकल्याणकारी योजना केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं रह जाती, बल्कि वह सीधे-सीधे जनजीवन की कसौटी बन जाती है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना—जिसे अब प्रदेश में ‘जी राम जी’ नाम दिया गया है—वर्ष 2025 में भी इसी कसौटी पर परखी गई। यह फीचर किसी एक जिले, किसी एक आंकड़े या किसी एक निष्कर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि योजना के आकार, उसकी लागत, वास्तविक उपयोग, उपलब्धियों और विफलताओं—सभी को एक साथ रखकर तैयार किया गया एक दस्तावेज़ी मूल्यांकन है। इसमें न तो उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया गया है और न ही उन तथ्यों को छुपाया गया है, जो योजना के सामने खड़े गंभीर सवालों की ओर इशारा करते हैं।

योजना का आकार : विशाल भूगोल, असमान ज़मीनी सच्चाई

वर्ष 2025 में ‘जी राम जी’ योजना का दायरा उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों, लगभग 58 से 60 हजार ग्राम पंचायतों और करीब 3.3 से 3.6 करोड़ जॉब कार्डधारकों तक फैला रहा। सरकारी MIS आंकड़ों के अनुसार लगभग 2.1 से 2.3 करोड़ परिवारों ने वर्ष के दौरान काम की मांग दर्ज कराई, लेकिन इनमें से 1.7 से 1.9 करोड़ परिवारों को ही वास्तविक रूप से रोजगार मिल सका। यह अंतर—काम की मांग और काम की उपलब्धता के बीच—योजना की पहली और सबसे बुनियादी चुनौती को उजागर करता है। यही अंतर आगे चलकर जिलों के बीच गहराते असंतुलन का कारण भी बनता है।

लागत और व्यय : संतुलित दिखते आंकड़ों के भीतर की दरारें

वित्तीय दृष्टि से वर्ष 2025 में उत्तर प्रदेश के लिए ‘जी राम जी’ योजना के तहत लगभग 27,000 से 30,000 करोड़ रुपये का कुल आवंटन दर्ज किया गया। इसमें से 24,000 से 26,000 करोड़ रुपये के वास्तविक व्यय की पुष्टि होती है। मजदूरी मद में औसतन 58 से 60 प्रतिशत और सामग्री व परिसंपत्ति निर्माण में 40 से 42 प्रतिशत व्यय दिखाया गया। काग़ज़ों में यह अनुपात नियमों के अनुरूप प्रतीत होता है, लेकिन कई जिलों में सामग्री मद का बढ़ता वर्चस्व यह संकेत देता है कि योजना का झुकाव धीरे-धीरे रोजगार उपलब्ध कराने से अधिक निर्माण-प्रधान गतिविधियों की ओर बढ़ रहा है।

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जहाँ योजना ने सही दिशा पकड़ी : चित्रकूट का उदाहरण

बुंदेलखंड का चित्रकूट जिला वर्ष 2025 में ‘जी राम जी’ योजना के सबसे बेहतर कार्यान्वयन वाले जिलों में गिना गया। यहां योजना केवल रोजगार उपलब्ध कराने का माध्यम नहीं रही, बल्कि पलायन रोकने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को स्थिर करने का साधन बनी। औसतन 78 से 85 दिन प्रति परिवार रोजगार, 90 प्रतिशत से अधिक मामलों में 7 से 10 दिनों के भीतर मजदूरी भुगतान और जल संरक्षण, तालाब, चेकडैम तथा खेत-मेड़ जैसे टिकाऊ कार्यों ने इस जिले को अलग पहचान दी। ग्राम पंचायत स्तर पर मस्टर रोल की सार्वजनिक जांच, सक्रिय सामाजिक अंकेक्षण और प्रशासन की प्रत्यक्ष निगरानी इस सफलता के प्रमुख कारण रहे।

काम मिला, पर भरोसा डगमगाया : बलरामपुर की तस्वीर

तराई क्षेत्र का बलरामपुर जिला योजना की मिश्रित तस्वीर प्रस्तुत करता है। यहां औसतन 60 से 65 दिन प्रति परिवार रोजगार तो उपलब्ध हुआ, लेकिन 15 से 20 प्रतिशत मामलों में मजदूरी भुगतान 20 दिनों से अधिक देर से हुआ। कुछ प्रकरणों में मृत श्रमिकों को कार्यरत दिखाने जैसे आरोप भी सामने आए। योजना यहां पूरी तरह विफल नहीं कही जा सकती, लेकिन निगरानी और पारदर्शिता की कमी ने इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न अवश्य लगाया।

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आंकड़ों में मजबूती, ज़मीन पर असंतोष : सीतापुर

सीतापुर उन जिलों में शामिल रहा जहां स्वीकृत कार्यों और व्यय के आंकड़े अपेक्षाकृत मजबूत थे। इसके बावजूद औसतन 48 से 52 दिन प्रति परिवार रोजगार, सामग्री मद का अधिक अनुपात और कई अधूरी या अल्प-उपयोगी परिसंपत्तियां इस जिले की वास्तविक तस्वीर सामने लाती हैं। शिकायतों में ‘काम दिखा, काम नहीं हुआ’, पंचायत स्तर पर पक्षपात और कार्य सत्यापन को लेकर विवाद प्रमुख रहे। यह जिला बताता है कि संख्यात्मक प्रगति सामाजिक संतोष की गारंटी नहीं होती।

कठिन भूगोल, बेहतर सामाजिक असर : सोनभद्र

आदिवासी बहुल सोनभद्र जिले में ‘जी राम जी’ योजना ने 2025 में सामाजिक सुरक्षा जाल की भूमिका निभाई। यहां औसतन 65 से 70 दिन प्रति परिवार रोजगार, 50 प्रतिशत से अधिक महिला सहभागिता और वन-भूमि सुधार तथा जलस्रोत संरक्षण जैसे कार्य सामने आए। हालांकि डिजिटल भुगतान और दूरस्थ कार्यस्थलों पर सुविधाओं की कमी जैसी शिकायतें बनी रहीं, फिर भी कुल मिलाकर योजना का सामाजिक प्रभाव सकारात्मक रहा।

जहाँ शिकायतें सबसे ज्यादा : लखीमपुर खीरी का कड़वा सच

वर्ष 2025 में ‘जी राम जी’ योजना को लेकर सबसे अधिक शिकायतें लखीमपुर खीरी जिले से सामने आईं। मजदूरी भुगतान में 30 से 40 दिन तक की देरी, मस्टर रोल में नाम होने के बावजूद काम न मिलने के आरोप, पंचायत स्तर पर ठेकेदारी प्रवृत्ति और सोशल ऑडिट रिपोर्टों को दबाने जैसे गंभीर आरोप इस जिले की पहचान बने। यह जिला स्पष्ट करता है कि योजना का बड़ा आकार, यदि मजबूत प्रशासनिक नियंत्रण से न जुड़ा हो, तो समस्याओं को और गहरा कर देता है।

महिलाएँ, वंचित वर्ग और डिजिटल व्यवस्था

प्रदेश स्तर पर महिला सहभागिता 44 से 46 प्रतिशत और अनुसूचित जाति-जनजाति परिवारों की हिस्सेदारी 35 से 37 प्रतिशत के बीच रही। यह योजना का मजबूत पक्ष है, लेकिन कई जिलों में क्रेच, पेयजल और छाया जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी ने महिला सहभागिता के वास्तविक लाभ को सीमित कर दिया। डिजिटल और आधार-आधारित भुगतान प्रणाली से फर्जीवाड़ा तो घटा, लेकिन तकनीकी त्रुटियों के कारण कई मजदूरों को समय पर भुगतान नहीं मिल सका।

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आख़िरी पंक्तियाँ : यह दस्तावेज़ क्या दर्ज करता है

यह संयुक्त और संतुलित समीक्षा साफ़ तौर पर दर्ज करती है कि वर्ष 2025 में ‘जी राम जी’ योजना न तो पूरी तरह सफल रही और न ही पूरी तरह विफल। चित्रकूट जैसे जिले इसके बेहतर कार्यान्वयन का उदाहरण बने, सोनभद्र ने सामाजिक असर दिखाया, सीतापुर ने आंकड़ों और यथार्थ के अंतर को उजागर किया और लखीमपुर खीरी ने प्रशासनिक कमजोरियों की कीमत चुकाई। योजना आज भी ग्रामीण उत्तर प्रदेश की आख़िरी सामाजिक ढाल बनी हुई है। इसका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि इसे केवल खर्च की योजना के रूप में चलाया जाता है या विश्वास, पारदर्शिता और सख़्त निगरानी के साथ ग्रामीण जीवन की स्थायी रीढ़ के रूप में विकसित किया जाता है।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जी राम जी और मनरेगा में क्या अंतर है?
योजना की संरचना वही है, केवल प्रदेश स्तर पर नाम और प्रशासनिक प्रस्तुति में बदलाव किया गया है।
2025 में सबसे बेहतर कार्यान्वयन किस जिले में रहा?
उपलब्ध आंकड़ों और शिकायतों के विश्लेषण के आधार पर चित्रकूट जिला सबसे बेहतर कार्यान्वयन का उदाहरण रहा।
सबसे ज्यादा शिकायतें किस जिले से आईं?
वर्ष 2025 में लखीमपुर खीरी जिले से मजदूरी भुगतान और फर्जी उपस्थिति को लेकर सबसे अधिक शिकायतें दर्ज हुईं।

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