चित्रकूट में ‘जी राम जी’ (मनरेगा)
वर्ष 2025 का सांख्यिकीय आईना और व्यवस्था की असहज सच्चाई




संजय सिंह राणा की विशेष रिपोर्ट
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बुंदेलखंड के चित्रकूट जिला में वर्ष 2025 मनरेगा—अब ‘जी राम जी’—के लिए आंकड़ों का वर्ष रहा।
इस वर्ष पहली बार ऐसा हुआ कि काग़ज़ों में योजना न तो पूरी तरह असफल दिखी, न ही पूरी तरह सफल।
सरकारी MIS और जिला स्तरीय समीक्षाओं के अनुसार 2025 में चित्रकूट में मनरेगा के तहत लगभग 42–45 करोड़ रुपये की धनराशि उपलब्ध रही, जिसमें से करीब 36–38 करोड़ रुपये का व्यय दर्ज किया गया।
यह आंकड़ा अपने आप में यह बताने के लिए पर्याप्त है कि योजना बंद नहीं हुई, बल्कि सक्रिय रही।
लेकिन यही आंकड़ा जब कार्य, मजदूरी और शिकायतों के साथ जोड़ा जाता है, तो यह सक्रियता सवालों के घेरे में आ जाती है।

मानव दिवस: संख्या पूरी, भरोसा अधूरा

2025 में चित्रकूट जिले में मनरेगा के तहत लगभग 18–19 लाख मानव दिवस सृजित दिखाए गए।
सरकारी भाषा में यह संख्या “संतोषजनक” मानी गई, क्योंकि यह पिछले दो वर्षों के औसत के आसपास रही।
लेकिन जब इस संख्या को ब्लॉक-स्तर पर तोड़ा गया, तो असमानता सामने आई।
मानिकपुर, राजापुर और पहाड़ी जैसे ब्लॉकों में मानव दिवस का भार अपेक्षाकृत अधिक रहा, जबकि कुछ अन्य ब्लॉकों में काम सीमित दिखा।
यहीं से पहला सवाल उठता है—
क्या मानव दिवस की यह संख्या वास्तविक श्रम का प्रतिबिंब है, या लक्ष्य-पूर्ति का गणित?

मानिकपुर ब्लॉक का वह मामला, जहाँ एक ही कार्य में 460 वास्तविक मानव दिवस के बदले 1100 से अधिक मानव दिवस दर्ज पाए गए, इस पूरे जिले के मानव दिवस आंकड़े पर प्रश्नचिह्न लगा देता है।
यदि एक कार्य में लगभग ढाई गुना मानव दिवस बढ़ाया जा सकता है, तो 18–19 लाख के कुल आंकड़े की विश्वसनीयता स्वतः संदिग्ध हो जाती है।

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कार्य संख्या: काग़ज़ पर बहुत, ज़मीन पर बिखरे हुए

2025 में चित्रकूट में मनरेगा के अंतर्गत लगभग 9,000 से अधिक कार्य स्वीकृत दिखाए गए, जिनमें से करीब 6,500–6,800 कार्यों को ‘पूर्ण’ या ‘लगभग पूर्ण’ बताया गया।
शेष कार्य या तो प्रगति पर रहे या अधूरे छोड़ दिए गए।
यह आंकड़ा सुनने में प्रभावशाली लगता है।
लेकिन जब इन्हीं कार्यों की गुणवत्ता और भौतिक सत्यापन की बात आती है, तो प्रशासनिक बैठकों में यह स्वीकार किया गया कि कम से कम 12–15 प्रतिशत कार्यों पर गुणवत्ता या मापन को लेकर आपत्ति दर्ज हुई।
यानी 2025 में हर आठवाँ–नवाँ कार्य ऐसा रहा, जिस पर सवाल उठा।
यह स्थिति यह बताती है कि समस्या कार्यों की संख्या में नहीं, निगरानी की गंभीरता में है।

मजदूरी भुगतान: आंकड़ों में प्रवाह, खातों में रुकावट

2025 में चित्रकूट में मनरेगा के तहत करीब 28–30 करोड़ रुपये केवल मजदूरी भुगतान के रूप में दिखाए गए।
FTO जनरेशन के आंकड़े बताते हैं कि अधिकांश भुगतान “प्रोसेस” हो गए।
लेकिन शिकायत रजिस्टर और ज़मीनी बातचीत यह बताती है कि कम से कम 8–10 प्रतिशत मजदूरों भुगतान में 30 दिन से अधिक की देरी झेलनी पड़ी।
कुछ मामलों में यह देरी 60 दिनों से भी आगे गई।
यहाँ आंकड़ा बहुत महत्वपूर्ण है— क्योंकि मनरेगा कानून मजदूरी का भुगतान 15 दिनों के भीतर सुनिश्चित करने की बात करता है।
इस दृष्टि से 2025 में चित्रकूट में भुगतान व्यवस्था कानूनी मानक पर खरी नहीं उतरती।

शिकायतें और अनियमितताएँ: संख्या कम, गंभीरता अधिक

2025 में चित्रकूट जिले में मनरेगा से जुड़ी करीब 70–80 औपचारिक शिकायतें दर्ज हुईं।
इनमें से—
लगभग 35–40 प्रतिशत शिकायतें फर्जी मस्टर रोल और गलत भुगतान से संबंधित थीं।
20 प्रतिशत के आसपास जॉब कार्ड और उपस्थिति गड़बड़ी की थीं, शेष भुगतान देरी और कार्य गुणवत्ता से जुड़ी थीं।

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इन शिकायतों में से लगभग 25–30 मामलों में जांच के बाद अनियमितता की पुष्टि हुई।
लेकिन इनमें से—
निलंबन की कार्रवाई केवल 5–6 मामलों में हुई,
रिकवरी आदेश लगभग 10–12 मामलों में और
एफआईआर की संख्या शून्य रही।
यह आंकड़ा 2025 की सबसे तीखी आलोचना को जन्म देता है।

मृतक के नाम भुगतान: एक मामला, कई सवाल

2025 की समीक्षा में मृतक के नाम भुगतान का मामला संख्या में एक हो सकता है, लेकिन प्रभाव में वह पूरे तंत्र पर भारी पड़ता है।
यदि 6,500 से अधिक कार्यों और 18 लाख मानव दिवस के बीच एक मृत व्यक्ति भी “मजदूर” बना रह सकता है, तो यह स्पष्ट करता है कि सत्यापन की प्रक्रिया सांकेतिक रह गई है।

2025 की आलोचनात्मक समीक्षा : आंकड़े क्या कहते हैं?

आंकड़े यह नहीं कहते कि मनरेगा चित्रकूट में विफल हो गई।
लेकिन वे यह ज़रूर कहते हैं कि—
धन का प्रवाह है, पर नियंत्रण कमजोर है,
काम हो रहा है, पर सत्यापन अधूरा है,
भुगतान हो रहा है, पर समय पर नहीं,
शिकायतें कम हैं, पर गंभीर हैं
और कार्रवाई संख्या के अनुपात में नहीं है।

यह वह बिंदु है जहाँ 2025 में ‘जी राम जी’ एक योजना से अधिक एक प्रशासनिक चरित्र बन जाती है—
जिसमें जवाबदेही न्यूनतम और सहनशीलता अधिक है।

2025 का आईना क्या दिखाता है?

वर्ष 2025 का आईना यह नहीं कहता कि मनरेगा को नकार दिया जाए।
लेकिन यह आईना यह भी नहीं कहता कि उस पर आँख बंद कर भरोसा किया जाए।
चित्रकूट में ‘जी राम जी’ 2025 में—
42–45 करोड़ की योजना थी,
18–19 लाख मानव दिवस का दावा थी,
6,500 से अधिक कार्यों की सूची थी,
लेकिन साथ ही—
30% तक पुष्टि-योग्य शिकायतें,
कानूनी समयसीमा से बाहर भुगतान,
और आपराधिक कार्रवाई का लगभग अभाव भी था।
यही 2025 की सबसे ईमानदार तस्वीर है।

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अंतिम कसक : जो 2025 को एक साल नहीं, एक सवाल बना दे

2025 में चित्रकूट में ‘जी राम जी’ के आँकड़े यह नहीं बताते कि योजना असफल रही, लेकिन वे यह भी साबित नहीं कर पाते कि व्यवस्था ईमानदार रही।
यही सबसे खतरनाक स्थिति है।
क्योंकि असफलता पर बहस होती है, सुधार होता है;
लेकिन ऐसी “आंशिक सफलता” पर केवल फाइलें मोटी होती हैं और जवाबदेही पतली।

जब एक मृत व्यक्ति भी मजदूर बना रह सकता है,
जब 1100 मानव दिवस काग़ज़ों में पैदा हो सकते हैं,
जब असली मजदूर का पसीना ऐप की असफलता में गुम हो सकता है—
तो समस्या योजना की नहीं, शासन की नैतिकता की है।

2025 का चित्रकूट हमें यह नहीं बताता कि मनरेगा को बचाया जाए या बदला जाए;
वह हमें यह बताता है कि अब योजनाओं को नहीं, व्यवस्थाओं को कठघरे में खड़ा करने का समय है।
क्योंकि यदि रोजगार की गारंटी भी भरोसे की गारंटी न बन सके,
तो राज्य और नागरिक के बीच का अनुबंध केवल काग़ज़ रह जाता है—
और इतिहास गवाही देता है कि ऐसे काग़ज़ सबसे पहले हवा में उड़ते हैं।

❓ महत्वपूर्ण सवाल–जवाब

क्या 2025 में चित्रकूट में मनरेगा असफल रही?

नहीं, लेकिन आंकड़े यह भी नहीं दिखाते कि व्यवस्था पूरी तरह ईमानदार रही।

मानव दिवस के आंकड़ों पर सबसे बड़ा सवाल क्या है?

एक ही कार्य में वास्तविक श्रम से ढाई गुना मानव दिवस दर्ज होना।

मजदूरी भुगतान में सबसे बड़ी समस्या क्या रही?

15 दिन की कानूनी समयसीमा के बावजूद 30–60 दिन तक की देरी।

शिकायतों पर कार्रवाई क्यों कमजोर रही?

पुष्टि के बावजूद एफआईआर शून्य और सीमित निलंबन।

2025 का सबसे गंभीर संकेत क्या है?

मृतक के नाम भुगतान—जो सत्यापन तंत्र की विफलता दर्शाता है।

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