मनरेगा पर विपक्ष का बवाल:
क्या देश को कांग्रेस राज का ‘छह नाम–एक दिन’ याद है?




✍️ अनिल अनूप
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देश की राजनीति में योजनाओं के नाम बदलना कोई नई घटना नहीं है, लेकिन जब वही प्रक्रिया सत्ता बदलने के साथ अचानक ‘लोकतंत्र पर हमला’ घोषित कर दी जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। इन दिनों मनरेगा को लेकर विपक्ष का हंगामा इसी चयनात्मक स्मृति का उदाहरण बन गया है। नाम बदलने की आशंका मात्र से संसद ठप कर दी गई, जबकि इतिहास गवाह है कि कांग्रेस शासन में एक ही दिन में छह योजनाओं के नाम बदले गए थे और तब न लोकतंत्र खतरे में दिखा, न संवैधानिक मूल्यों की दुहाई दी गई।

नाम बदलना अपराध है या राजनीतिक परंपरा?

भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर सरकार अपने साथ नई वैचारिक पहचान लेकर आती है। योजनाओं के नाम बदलना इसी पहचान निर्माण का हिस्सा रहा है। चाहे वह कांग्रेस का दौर रहा हो या वर्तमान सत्ता का, नामकरण हमेशा राजनीति का औजार बना है। फर्क बस इतना है कि जब यह औजार अपने हाथ में हो, तो उसे ‘सुधार’ कहा जाता है और जब दूसरे के हाथ में जाए, तो वही ‘इतिहास मिटाने की साज़िश’ बन जाता है।

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कांग्रेस शासन और ‘एक दिन में छह नाम’ की कहानी

कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकारों के दौर में कई योजनाओं के नाम बदले गए। कई मामलों में तो यह बदलाव एक ही दिन में हुआ। उद्देश्य स्पष्ट था—नई सरकार, नई ब्रांडिंग। उस समय न संसद ठप हुई, न सड़कों पर व्यापक आंदोलन चले। आज वही परंपरा अगर दोहराई जा रही है, तो उसे असंवैधानिक बताने का नैतिक आधार आखिर कहां से आता है?

मनरेगा: नाम नहीं, अधिकार का सवाल

मनरेगा का असली मूल्य उसके नाम में नहीं, बल्कि उस अधिकार में है जो वह ग्रामीण गरीब को देता है। सौ दिन का रोज़गार, न्यूनतम मजदूरी और काम की कानूनी गारंटी—यही इसकी आत्मा है। अगर किसी नई संरचना या नाम के भीतर यह आत्मा सुरक्षित है, तो नाम को लेकर इतना उग्र विरोध क्यों?

गांधी के नाम पर राजनीति और स्मृति का चयन

विपक्ष इसे गांधी के नाम से जोड़कर भावनात्मक मुद्दा बनाना चाहता है। लेकिन क्या गांधीवाद केवल नामों तक सीमित है? या वह ग्रामीण स्वावलंबन, श्रम की गरिमा और सामाजिक न्याय में निहित है? जब कांग्रेस शासन में योजनाओं के नाम बदले गए थे, तब गांधी का नाम राजनीतिक ढाल क्यों नहीं बना?

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विपक्ष का शोर और मुद्दों से ध्यान भटकाना

नाम बदलने पर हंगामा करना आसान है, लेकिन असली सवाल पूछना कठिन। बजट में कटौती, मजदूरी भुगतान में देरी, काम के दिनों में कमी—ये वे मुद्दे हैं जिन पर विपक्ष को सरकार को घेरना चाहिए। दुर्भाग्य से प्रतीकों की राजनीति वास्तविक समस्याओं पर भारी पड़ जाती है।

लोकतंत्र की कसौटी: दोहरा मापदंड नहीं

लोकतंत्र में विरोध ज़रूरी है, लेकिन विरोध का भी नैतिक आधार होना चाहिए। यदि नाम बदलना गलत है, तो वह हर सरकार के लिए गलत होना चाहिए। और यदि यह राजनीतिक परंपरा है, तो फिर अचानक इसे लोकतंत्र विरोधी बताने का औचित्य नहीं बचता।

निष्कर्ष: सवाल नाम का नहीं, नीयत और नतीजों का है

देश को आज यह तय करना होगा कि वह नामों की राजनीति में उलझा रहना चाहता है या योजनाओं के वास्तविक प्रभाव पर बहस करना चाहता है। जब कांग्रेस राज में एक ही दिन में छह योजनाओं के नाम बदले गए थे, तब लोकतंत्र सुरक्षित था। आज मनरेगा पर मचा बवाल दरअसल योजनाओं से अधिक राजनीतिक स्मृति के संकट को उजागर करता है।

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❓ क्या पहले भी योजनाओं के नाम बदले गए हैं?

हाँ, कांग्रेस शासन में भी कई योजनाओं के नाम बदले गए, जिनमें एक ही दिन में कई बदलाव शामिल थे।

❓ क्या मनरेगा का नाम बदलना योजना को खत्म करना है?

नहीं, नाम बदलने से योजना स्वतः समाप्त नहीं होती। असली सवाल इसके अधिकार और क्रियान्वयन का है।

❓ विपक्ष का विरोध कितना जायज़ है?

विरोध तब जायज़ है जब वह नीति और परिणामों पर आधारित हो, न कि केवल प्रतीकों पर।

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