हवन-यज्ञ के साथ नवरात्र महोत्सव का भव्य समापन मां गायत्री शक्तिपीठ में गूंजा मंत्रोच्चार, श्रद्धालुओं ने मांगी सुख-शांति


📰 राम कीर्ति यादव की रिपोर्ट

नवरात्र के पावन अवसर पर मां गायत्री शक्तिपीठ में श्रद्धा और भक्ति का अनोखा संगम देखने को मिला, जहां हवन-यज्ञ के साथ महोत्सव का समापन हुआ।

भक्ति, श्रद्धा और वैदिक अनुष्ठान का अद्भुत संगम

सतहरिया क्षेत्र के मुंगराबादशाहपुर स्थित स्टेशन रोड पर मां गायत्री शक्तिपीठ में आयोजित नवरात्र का वार्षिक महोत्सव शनिवार को पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ संपन्न हो गया। समापन दिवस पर मंदिर परिसर में भक्ति का विशेष माहौल देखने को मिला, जहां सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। साफ-सुथरे परिधानों में सजे भक्तों ने मंदिर पहुंचकर मां गायत्री का दर्शन पूजन किया और जीवन में सुख, शांति तथा समृद्धि की कामना की।

नवरात्र के नौ दिनों तक चले इस महोत्सव का अंतिम दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा, जब हवन पूजन और पांच कुंडीय यज्ञ के माध्यम से देवी आराधना का समापन किया गया। इस अवसर पर वातावरण पूरी तरह से वैदिक मंत्रों की ध्वनि से गुंजायमान हो उठा, जिससे पूरे क्षेत्र में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार महसूस किया गया।

पांच कुंडीय यज्ञ में आहुति देकर मांगी सुख-शांति

समापन कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण के रूप में पांच कुंडीय यज्ञ का आयोजन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाओं और श्रद्धालुओं ने भाग लिया। यज्ञ में आहुति देते हुए भक्तों ने अपने परिवार की खुशहाली, स्वास्थ्य और मानसिक शांति की कामना की।

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यज्ञाचार्य आनंद के निर्देशन में यह अनुष्ठान संपन्न कराया गया। उन्होंने पूरे विधि-विधान के साथ गायत्री मंत्र के उच्चारण के बीच यज्ञ को पूर्ण कराया। यज्ञ के दौरान उपस्थित श्रद्धालु मंत्रोच्चार के साथ स्वयं को आध्यात्मिक रूप से जुड़ा हुआ महसूस कर रहे थे।

यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामूहिक ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक बन गया, जिसमें हर व्यक्ति ने अपनी आस्था के साथ भागीदारी निभाई।

गायत्री मंत्र का महत्व बताया गया

इस अवसर पर शक्तिपीठ के आचार्य गुलाब ने श्रद्धालुओं को गायत्री मंत्र और यज्ञ के महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में समस्त देवी-देवताओं का वास माना जाता है।

उन्होंने कहा कि इसी कारण इसे “महामंत्र” और “मंत्रों का मुकुट” कहा जाता है। यह मंत्र केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक विकास का भी आधार है।

आचार्य ने यह भी बताया कि यज्ञ करने से वातावरण शुद्ध होता है, जिससे न केवल पर्यावरण बल्कि मानव जीवन भी निरोग और संतुलित बनता है। यह परंपरा भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण धरोहर है, जिसे बनाए रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।

श्रद्धालुओं में दिखा उत्साह और आस्था

पूरे कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखने को मिला। महिलाएं पारंपरिक परिधानों में सजकर मंदिर पहुंचीं और पूरे मनोयोग से पूजा-अर्चना में भाग लिया। वहीं पुरुष श्रद्धालुओं ने भी पूरे अनुशासन और श्रद्धा के साथ अनुष्ठान में भागीदारी निभाई।

मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़ होने के बावजूद व्यवस्था सुचारु रूप से बनी रही। हर व्यक्ति के चेहरे पर संतोष और आस्था की झलक साफ दिखाई दे रही थी।

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यह आयोजन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक जुड़ाव का भी प्रतीक बन गया, जहां हर वर्ग और आयु के लोगों ने मिलकर भाग लिया।

महाप्रसाद वितरण के साथ हुआ समापन

कार्यक्रम के अंत में श्रद्धालुओं के बीच महाप्रसाद का वितरण किया गया। प्रसाद ग्रहण करते समय भक्तों के चेहरों पर संतोष और भक्ति का भाव स्पष्ट झलक रहा था।

महाप्रसाद वितरण के साथ ही नवरात्र महोत्सव का औपचारिक समापन हुआ, लेकिन इसकी आध्यात्मिक छाप श्रद्धालुओं के मन में लंबे समय तक बनी रहने वाली है।

इस अवसर पर कैलाश, रामलाल, माया देवी, राजेन्द्र प्रसाद साहू, नंदन त्रिपाठी, आशीष मोदनवाल, हेमंत शर्मा सहित कई श्रद्धालु उपस्थित रहे।

आस्था के साथ जुड़ता समाज

नवरात्र महोत्सव जैसे आयोजन केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं होते, बल्कि यह समाज को जोड़ने का भी एक माध्यम बनते हैं। ऐसे आयोजनों से लोगों के बीच सहयोग, सद्भाव और सामूहिकता की भावना मजबूत होती है।

मां गायत्री शक्तिपीठ में आयोजित यह महोत्सव भी उसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण रहा, जहां धर्म, संस्कृति और समाज एक सूत्र में बंधे नजर आए।

❓ अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

➤ नवरात्र महोत्सव का समापन कैसे हुआ?
हवन पूजन और पांच कुंडीय यज्ञ के साथ महोत्सव का समापन किया गया।

➤ यज्ञ का क्या महत्व बताया गया?
यज्ञ से वातावरण शुद्ध होता है और मानव जीवन निरोगी व संतुलित बनता है।

➤ गायत्री मंत्र को विशेष क्यों माना जाता है?
इसके 24 अक्षरों में सभी देवी-देवताओं का वास माना जाता है, इसलिए इसे महामंत्र कहा गया है।

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