भारतीय प्रशासनिक इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो केवल अपने पदों से नहीं, बल्कि अपने दृष्टिकोण और संवेदनशीलता से याद किए जाते हैं। सरदार मोहन सिंह रंधावा (M. S. Randhawa) उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक थे। वे स्वतंत्र भारत के पहले कमिश्नर, दिल्ली के रूप में जाने जाते हैं, लेकिन उनका योगदान इससे कहीं व्यापक था। वे एक प्रशासक होने के साथ-साथ कला, संस्कृति, पर्यावरण और ग्रामीण जीवन के गहरे अध्येता भी थे।
उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक प्रशासनिक अधिकारी केवल नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह समाज की आत्मा को समझकर उसे दिशा देने वाला भी हो सकता है।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा: जड़ों से जुड़ा व्यक्तित्व
सरदार एम. एस. रंधावा का जन्म 1909 में पंजाब के अमृतसर जिले में हुआ। उनका बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता, जहाँ प्रकृति, खेती और लोकजीवन से उनका गहरा जुड़ाव बना। यही जुड़ाव आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत बना।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा पंजाब में प्राप्त की और बाद में उच्च शिक्षा के लिए आगे बढ़े। वे मेधावी छात्र थे और भारतीय सिविल सेवा (ICS) में चयनित हुए—जो उस समय देश की सबसे प्रतिष्ठित सेवा मानी जाती थी।
लेकिन रंधावा केवल एक “अफसर” बनकर नहीं रहना चाहते थे। उनकी रुचि साहित्य, चित्रकला और भारतीय संस्कृति में भी गहरी थी। यही कारण था कि उनका दृष्टिकोण हमेशा बहुआयामी रहा।
स्वतंत्र भारत और दिल्ली का पुनर्निर्माण
1947—देश आज़ाद हुआ, लेकिन साथ ही विभाजन की त्रासदी भी सामने आई। लाखों शरणार्थी पाकिस्तान से भारत आए, और दिल्ली इस संकट का केंद्र बन गई।
ऐसे कठिन समय में सरदार एम. एस. रंधावा को दिल्ली का पहला कमिश्नर नियुक्त किया गया। यह पद केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं था, बल्कि एक मानवीय संकट को संभालने की चुनौती भी थी।
शरणार्थियों का पुनर्वास
दिल्ली में लाखों विस्थापित लोग आ चुके थे। उनके पास न घर था, न रोज़गार, न सुरक्षा। रंधावा ने इस स्थिति को केवल “फाइल” की तरह नहीं देखा, बल्कि इसे मानवीय पीड़ा के रूप में समझा।
उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से— शरणार्थी शिविरों की व्यवस्था की, भोजन और स्वास्थ्य सेवाओं को सुनिश्चित किया, पुनर्वास कॉलोनियों का विकास कराया।
आज दिल्ली के कई इलाके—जैसे लाजपत नगर, राजौरी गार्डन, पटेल नगर—इसी पुनर्वास नीति की देन हैं।
दिल्ली का हरित विकास: बागों का शहर
रंधावा का एक और महत्वपूर्ण योगदान था—दिल्ली को हरित और सुंदर बनाना। वे मानते थे कि एक शहर केवल इमारतों से नहीं, बल्कि पेड़ों, बागों और खुले स्थानों से जीवित रहता है।
मुगल गार्डन और उद्यान संस्कृति
उन्होंने दिल्ली के बाग-बगीचों को विकसित करने में विशेष रुचि ली। राष्ट्रपति भवन के मुगल गार्डन के विकास और संरक्षण में उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है।
उन्होंने दिल्ली में वृक्षारोपण को बढ़ावा दिया और शहर को “गार्डन सिटी” बनाने की दिशा में काम किया। उनकी सोच आज भी प्रासंगिक है—जब हम प्रदूषण और शहरीकरण की समस्याओं से जूझ रहे हैं।
कला और संस्कृति के संरक्षक
सरदार रंधावा केवल प्रशासक नहीं थे, बल्कि भारतीय कला और संस्कृति के गहरे जानकार भी थे।
उन्होंने पंजाब की लोककला, चित्रकला और संस्कृति पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखीं। उनकी लेखनी में शोध और संवेदनशीलता दोनों का सुंदर संतुलन था। वे मानते थे कि किसी भी समाज की असली पहचान उसकी संस्कृति में छिपी होती है।
वे ललित कला अकादमी के अध्यक्ष भी रहे। इस दौरान उन्होंने भारतीय कलाकारों को मंच देने और कला को प्रोत्साहित करने का काम किया।
प्रकृति और कृषि के प्रति लगाव
रंधावा का एक और महत्वपूर्ण पक्ष था—उनका प्रकृति और कृषि से प्रेम। उन्होंने भारतीय कृषि, विशेषकर बागवानी के क्षेत्र में भी काम किया।
वे मानते थे कि भारत का भविष्य गांवों और कृषि से जुड़ा है। उन्होंने ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की बात की—जो आज “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” के रूप में जानी जाती है।
लेखक और चिंतक के रूप में योगदान
सरदार एम. एस. रंधावा ने कई पुस्तकें लिखीं— Kangra Paintings, Indian Painting, Punjab: Past and Present— जिनके माध्यम से उन्होंने भारतीय कला और इतिहास को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई।
व्यक्तित्व की विशेषताएँ
रंधावा का व्यक्तित्व कई गुणों का संगम था— वे संवेदनशील प्रशासक थे, दूरदर्शी विचारक थे और सादगी व विनम्रता उनके जीवन का आधार थी।
आज के संदर्भ में रंधावा का महत्व
आज जब शहर तेजी से फैल रहे हैं, पर्यावरण संकट बढ़ रहा है और संस्कृति हाशिए पर जा रही है—ऐसे समय में रंधावा की सोच और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
उन्होंने हमें सिखाया— विकास केवल इमारतों का नहीं, इंसानों का होना चाहिए। प्रशासन केवल व्यवस्था नहीं, संवेदना भी है और संस्कृति केवल अतीत नहीं, वर्तमान की पहचान भी है।
चंडीगढ़: पत्थरों का शहर नहीं, संवेदना का नक्शा
जब चंडीगढ़ की बात होती है, तो अक्सर नाम उभरता है—Le Corbusier। लेकिन शहर की आत्मा को सहेजने में सरदार रंधावा की भूमिका उतनी ही गहरी रही।
उन्होंने “गार्डन सिटी” की अवधारणा को जमीन दी, स्थानीय जलवायु के अनुसार हरियाली विकसित की, उद्यान संस्कृति को बढ़ावा दिया और कला व प्रकृति का अद्भुत संगम तैयार किया।
उनकी मानव-केंद्रित सोच ने चंडीगढ़ को एक संतुलित और जीवंत शहर बनाया—जहाँ सौंदर्य और व्यवस्था साथ-साथ चलते हैं।
एक शहर, एक सोच, एक विरासत
चंडीगढ़ की खूबसूरती केवल उसकी इमारतों में नहीं है। वह उसकी सड़कों की छाया में है… उसके बागों की खुशबू में है… और उसके संतुलित जीवन में है।
यह संतुलन यूँ ही नहीं आया— यह सरदार रंधावा जैसे दूरदर्शी प्रशासक की सोच का परिणाम है।
“कोर्बुज़िए ने चंडीगढ़ का शरीर गढ़ा, लेकिन रंधावा ने उसमें आत्मा बसाई।”
❓ FAQ
एम एस रंधावा कौन थे?
वे स्वतंत्र भारत के पहले दिल्ली कमिश्नर और प्रसिद्ध प्रशासक, लेखक व पर्यावरण प्रेमी थे।
चंडीगढ़ के विकास में उनकी क्या भूमिका थी?
उन्होंने शहर को हरित, संतुलित और मानव-केंद्रित बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
रंधावा की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी?
उनकी संवेदनशील प्रशासनिक दृष्टि, जो विकास को प्रकृति और संस्कृति से जोड़ती थी।





