
धान खरीद केंद्र शुरू न होने से किसानों की आर्थिक लूट जारी
सिरोंचा तालुका के अमरावती क्षेत्र में किसानों की परेशानी दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। करसपल्ली, अमरावती,
मेदाराम और रंगय्यापल्ली गांवों के किसानों का कहना है कि अभी तक सरकारी धान खरीद केंद्र चालू न होने के कारण
वे आर्थिक संकट के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं। भारी खर्च, वापसी की बारिश से फसल को हुआ नुकसान और कम
उत्पादन – इन तीन मारों के बीच किसान टूट चुके हैं। मजबूरी में अब किसानों के सामने निजी व्यापारियों को
औने-पौने दाम पर धान बेचने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।
वापसी की बारिश ने किसानों की उम्मीदें कुचल दीं
इस वर्ष किसानों को रबी सीजन और खरीफ दोनों की लागत पहले से अधिक पड़ी। महंगे बीज, खाद-कीटनाशक और डीज़ल की
कीमतों ने खेती की लागत को पहले ही बढ़ा दिया था। किसानों ने उम्मीद के साथ मेहनत की थी, लेकिन वापसी की बारिश
ने उनकी पैदावार बुरी तरह प्रभावित कर दी। ग्रामीणों के अनुसार, जिन खेतों से हर साल प्रति एकड़ 25 से 30 क्विंटल
धान मिलता था, वहां इस बार केवल 10 से 15 क्विंटल उत्पादन हुआ है। कुछ किसानों की फसल बारिश से पूरी तरह बर्बाद
हो गई, जिससे उनके सामने रोजमर्रा के खर्च चलाना तक मुश्किल हो गया है।
किसानों का कहना है कि नुकसान इतना गहरा है कि अगर सरकार समय पर समर्थन मूल्य पर खरीद शुरू कर दे, तो शायद उनकी
आर्थिक स्थिति संभल सकती है। लेकिन सरकारी धान खरीद केंद्र अभी भी चालू नहीं हुआ है और तारीखों को लेकर अधिकारियों
की ओर से कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिल रहा। खेतों में खड़ी फसल के नुकसान के बाद अब बाज़ार में सही दाम न मिलना
किसानों के लिए दोहरी मार साबित हो रहा है।
निजी व्यापारियों की सक्रियता, किसानों की मजबूरी
ऐसे हालात में निजी व्यापारी गांवों में सक्रिय हो गए हैं। किसानों के पास तत्काल धन की जरूरत है – चाहे वह खाद,
सिंचाई, मजदूरी, बिजली बिल, बच्चों की फीस, बैंक लोन या घरेलू खर्च के लिए हो। प्राइवेट खरीदार इस मजबूरी का
फायदा उठाकर बहुत कम दाम पर धान खरीद रहे हैं। किसान बताते हैं कि मजबूरी में वे धान 1500–1600 रुपये प्रति क्विंटल
तक बेचने पर मजबूर हैं, जबकि सरकार का समर्थन मूल्य इससे कहीं अधिक है।
किसानों का कहना है कि अगर धान खरीद केंद्र समय पर शुरू हो जाता, तो वे बिना दबाव के समर्थन मूल्य पर अपनी उपज बेच
पाते। लेकिन वर्तमान स्थिति में पैसा तुरंत मिलने की जरूरत के कारण उन्हें वही रेट स्वीकार करना पड़ रहा है, जो
निजी व्यापारी तय कर रहे हैं। इससे न केवल किसानों की लागत भी नहीं निकल पा रही, बल्कि अगली फसल की तैयारी के लिए
पूंजी जुटाना भी मुश्किल होता जा रहा है।
“केंद्र समय पर चालू होता तो हम लूटने से बच जाते”
अमरावती, करसपल्ली, मेदाराम और रंगय्यापल्ली के कई किसानों का आरोप है कि प्रशासन की लापरवाही ने उनकी मुश्किलें
और बढ़ा दी हैं। किसानों का कहना है कि अगर धान खरीद केंद्र सही समय पर खुल जाता, तो उन्हें आज यह अपमानजनक
स्थिति नहीं झेलनी पड़ती, जिसमें उन्हें अपनी मेहनत की उपज औने-पौने दाम पर बेचनी पड़ रही है।
अमरावती के किसान सदानंद इंगिली ने सरकार और प्रशासन से अपील करते हुए कहा कि धान खरीद केंद्र
चालू न होने से किसान सबसे ज्यादा नुकसान उठा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बारिश की मार झेलने के बाद अब बाज़ार में
सही दाम न मिलना किसानों के लिए किसी लूट से कम नहीं है। सदानंद इंगिली के मुताबिक, यदि धान खरीद केंद्र शीघ्र चालू
नहीं किया गया, तो किसानों की हालत और खराब हो जाएगी।
किसानों का यह भी कहना है कि वे पहले ही बैंकों और साहूकारों के कर्ज के बोझ तले दबे हैं। अगर इस सीजन में भी उन्हें
उचित दाम नहीं मिला, तो आने वाले सालों में खेती जारी रखना उनके लिए और कठिन हो जाएगा। गांवों में यह चर्चा आम है
कि सरकारी नीतियों की देरी और ढिलाई का खामियाज़ा हर बार किसान को ही भुगतना पड़ता है।
समर्थन मूल्य, देरी से शुरू होती खरीद और सवालों के घेर में व्यवस्था
योजना के अनुसार, हर साल धान खरीद केंद्र नवंबर के पहले सप्ताह में शुरू हो जाना चाहिए, लेकिन इस बार दिसंबर तक
पहुंचने के बाद भी केंद्र शुरू नहीं हुआ है। किसानों का आरोप है कि प्रशासन की धीमी कार्यप्रणाली और उदासीनता के
कारण उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा है। किसानों की यह भी मांग है कि धान खरीद केंद्र की संख्या और क्षमता दोनों
बढ़ाई जाएं, ताकि गांवों से लंबी दूरी तक धान ढोने की मजबूरी कम हो।
किसानों ने यह भी याद दिलाया कि पहले भी कई बार सीजन के दौरान खरीद केंद्र देर से शुरू हुए, जिसके कारण बड़ी संख्या
में किसानों को मजबूरन खुले बाजार में ही धान बेचना पड़ा। इस बार स्थिति इसलिए और गंभीर है कि उत्पादन पहले ही काफी
कम हुआ है। ऐसे में यदि समर्थन मूल्य पर पर्याप्त और समयबद्ध खरीद नहीं हुई, तो किसान आने वाले समय में खेती के प्रति
निराश हो सकते हैं।
क्या सरकार किसानों की पुकार सुनेगी?
किसानों की मांग है कि धान खरीद केंद्र तुरंत शुरू किया जाए, समर्थन मूल्य की गारंटी सुनिश्चित की जाए और निजी
व्यापारियों की मनमानी पर कड़ी रोक लगे। साथ ही, जिन किसानों की फसल वापसी की बारिश से बर्बाद हो गई है, उनका
सर्वे कराकर उन्हें विशेष राहत पैकेज दिया जाए, ताकि वे दोबारा अपनी जिंदगी और खेती दोनों संभाल सकें।
किसानों का कहना है कि खेती उनका पेशा ही नहीं, जीवन का आधार है। वर्तमान परिस्थिति ने उन्हें विकल्पहीन और मजबूर
बना दिया है। यदि समय रहते धान खरीद केंद्र शुरू नहीं किए गए, तो गांवों के हजारों परिवार आर्थिक और मानसिक संकट
से गुजरने को मजबूर हो जाएंगे। सरकार, प्रशासन और कृषि विभाग के लिए यह समय किसानों के साथ खड़े होने की असली
परीक्षा है।
अमरावती और आसपास के गांवों में किसानों की आर्थिक त्रासदी आज केवल एक क्षेत्रीय समस्या नहीं, बल्कि कृषि नीति और
सरकारी व्यवस्था की संवेदनशीलता की भी कसौटी बन चुकी है। यदि प्रशासन तत्परता दिखाए और धान खरीद केंद्र तुरंत शुरू
करे, तो किसानों को बड़ा सहारा मिल सकता है। अन्यथा देर होते-होते किसानों का भरोसा नीतियों और व्यवस्थाओं से उठना
शुरू हो जाएगा।
अंततः किसानों की एक ही मांग है कि अमरावती में धान खरीद केंद्र तुरंत शुरू किया जाए और उन्हें धान का
उचित एवं सम्मानजनक दाम मिले, ताकि वे अपनी मेहनत और जीवन दोनों को बचा सकें।









