विचार

कहीं देर न हो जाए….

मोहन द्विवेदी

किसान आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में बुधवार का घटनाक्रम इतनी तेजी से घूमा कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गाहे-बगाहे इसकी चर्चा होती रही। संसद में हंगामा हुआ, राज्यसभा से आप के तीन सांसदों का निष्कासन हुआ और राहुल गांधी ने प्रेस कानफ्रेंस करके कृषि सुधारों के मुद्दे पर सरकार पर तीखे हमले बोले। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने 26 जनवरी को किसानों की ट्रैक्टर रैली के दौरान हुई हिंसा की जांच की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार कर दिया। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं को अपनी मांग सरकार के सामने रखने को कहा। मीडिया में सबसे ज्यादा ध्यान हरियाणा के जींद में होने वाली महापंचायत ने खींचा, जिसमें आंदोलन के अगु‍वा किसान यूनियन प्रवक्ता राकेश टिकैत ने भाग लिया। कंडेला खाप द्वारा आयोजित इस महापंचायत को अन्य खापों ने भी सहयोग दिया। दो दशक पहले भी कंडेला खाप ने बड़े किसान आंदोलन की अगुवाई की थी। दरअसल, राकेश टिकैत की आंसुओं की कसक ने इस आंदोलन को फिर से सींच दिया है। आंसू प्रकरण के बाद हरियाणा में सबसे पहले प्रतिक्रिया कंडेला गांव में हुई थी। किसानों ने इसके तुरंत बाद जींद-चंडीगढ़ हाईवे जाम कर दिया था। बहरहाल, कंडेला में पंचायत का मंच टूटा और टिकैत समेत कई किसान चपेट में भी आये लेकिन टिकैत ने इसे आंदोलन के लिये शुभ बताया। टिकैत ने सरकार को चेताया कि यह आंदोलन धीमा नहीं होगा। इस आंदोलन का कोई नेता नहीं है, किसान ही आंदोलन का नेता है। फिलहाल जिन किसान प्रतिनिधियों से सरकार बात कर रही थी, उन्हीं से बात करे। यह भी कि लड़ाई जमीन बचाने की है और हम तिजोरी में अनाज बंद नहीं होने देंगे। वहीं राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि किसान आंदोलन से निपटने की केंद्र की नीति से देश की छवि खराब हुई है। वहीं दूसरी ओर हॉलीवुड की सेलिब्रिटी रिहाना, पर्यावरण योद्धा ग्रेटा थनबर्ग, पूर्व पॉर्न स्टार मिया खलीफा व अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भांजी मीना हैरिस के ट्वीट पर दिन भर घमासान मचा रहा।

इसके बाद विदेश मंत्रालय की टिप्पणी आई और बॉलीवुड से भी आक्रामक जवाब आये। विदेश मंत्रालय ने कहा कि सोशल मीडिया पर अंतर्राष्ट्रीय हस्तियों को तथ्यों को समझकर जिम्मेदारी से व्यवहार करना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय टिप्पणीकारों के विरुद्ध बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत, अजय देवगन, सुनील शेट्टी, करण जौहर व कैलाश खेर की टिप्पणियां सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी रही। निस्संदेह, राकेश टिकैत के द्रवित होने के बाद किसान आंदोलन में एक नयी जान आई है। सरकार दबाव में आई है। दिल्ली की सीमा पर आंदोलन स्थलों से दिल्ली जाने वाले मार्गों पर जिस तरह किलेबंदी सुरक्षा बलों की तरफ से की जा रही है, उसको लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं कि कंक्रीट के अवरोधक, कंटीले तार तथा कीलें किस मकसद से लगायी जा रही हैं? निस्संदेह 26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली के बाद जिस तरह से हिंसा हुई और लाल किले का जो अप्रिय घटनाक्रम घटा, उसने पुलिस को अतिरिक्त सुरक्षा करने को बाध्य किया। लेकिन सवाल उठ रहा है कि ये कवायदें समस्या के समाधान की तरफ तो कदापि नहीं ले जाती। आखिर सरकार ये क्यों नहीं सोच रही है कि सुधार कानूनों की तार्किकता किसानों के गले नहीं उतर रही है। जब जिनके लिये सुधारों का दावा किया जा रहा है, वे ही स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं तो फिर राजहठ का क्या औचित्य है? खेती-किसानी आम किसान के लिये महज कारोबार ही नहीं है, उसके लिये भावनात्मक विषय है। जिसके चलते किसान सुधार कानूनों के चलते खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। सही मायनो में सरकार सुधारों को लेकर किसानों को विश्वास में नहीं ले पा रही है। किसान आंदोलन की हताशा समाज में नकारात्मक प्रवृत्तियों को प्रश्रय दे सकती है। लोकतंत्र में लोक की आवाज को नजरअंदाज करके नहीं चला जा सकता, इस तथ्य के बावजूद भी कि आंदोलन से तमाम राजनीतिक दल अपने हित साधने की कवायद में जुटे हैं।

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