कोई हमारा न रहा… गांधी परिवार पर केस के बाद देश की सबसे पुरानी पार्टी अलग-थलग! कांग्रेस में भगदड़ और सन्नाटा

🖊️ अंजनी कुमार त्रिपाठी की रिपोर्ट
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संसद का शीतकालीन सत्र 1 दिसंबर 2025 से 19 दिसंबर तक प्रस्तावित है। सरकार इस दौरान 14 अहम विधेयक पेश करने की तैयारी में है, जबकि विपक्ष मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), चीन के मसले और लाल किले के पास हुए ब्लास्ट जैसे मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति बना रहा है। किंतु सत्र शुरू होने से पहले ही सियासी समीकरण बदल गए हैं, क्योंकि दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) ने नेशनल हेराल्ड मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ नई एफआईआर दर्ज कर दी है। इसके साथ ही भारत की सबसे पुरानी पार्टी के भीतर असमंजस, बेचैनी और राजनीतिक अकेलेपन की चिंता साफ देखी जा सकती है।

राहुल–सोनिया सहित 9 लोग आरोपी — पार्टी में स्तब्धता

नेशनल हेराल्ड केस में राहुल और सोनिया गांधी के अलावा तीन कंपनियों और छह अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया है। शिकायत के अनुसार, एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (AJL) का अधिग्रहण कथित रूप से धोखाधड़ी के साथ ‘यंग इंडियन कंपनी’ के जरिए किया गया। इस कंपनी में गांधी परिवार की कुल 76% हिस्सेदारी है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) की धारा 66(2) के आधार पर पुलिस से प्राथमिकी दर्ज कराई है, जिसके बाद माना जा रहा है कि ED की चार्जशीट और भी सख्त हो सकती है।

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एफआईआर की खबर सामने आते ही कांग्रेस दफ़्तर में हलचल तो तेज हुई, लेकिन शीर्ष नेताओं की चुप्पी ने कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति पैदा कर दी है। एक ओर सत्ता वापसी का सपना, दूसरी ओर शीर्ष नेतृत्व पर कानूनी संकट — यह दोहरी चुनौती पार्टी के लिए अब राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई जैसा बनती जा रही है।

16 दिसंबर का फैसला बदल सकता है राजनीति की दिशा

यह केस 2014 में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की शिकायत के बाद शुरू हुआ था। अब 16 दिसंबर 2025 को कोर्ट अपना फैसला सुनाएगी। संसद सत्र के बीच आने वाला यह फैसला देश की राजनीति को हिला सकता है। पार्टी के वरिष्ठ वकील और नेता अभिषेक मनु सिंघवी का कहना है कि “इस मामले में न नया पैसा, न नई कंपनी और न नई संपत्ति है, फिर भी इसे धन शोधन का केस बना दिया गया है।”

दूसरी ओर, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि फैसला कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ जाता है तो पार्टी की रणनीतिक शक्ति, नैरेटिव तैयार करने की क्षमता और विपक्षी नेतृत्व की स्थिति गंभीर रूप से कमजोर हो सकती है। यही वजह है कि सत्र शुरू होने से ठीक पहले यह एफआईआर कांग्रेस के लिए दबाव का बड़ा कारण बन गई है।

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साझीदार दूर — कांग्रेस पर अकेले जाने का खतरा?

कांग्रेस के भीतर यह उम्मीद थी कि पार्टी गांधी परिवार के नेतृत्व पर केंद्रित होकर अपने कार्यकर्ताओं को भावनात्मक रूप से साध पाएगी। लेकिन राहुल गांधी ने कर्नाटक में सत्ता संघर्ष को फिलहाल टालकर 14 दिसंबर की प्रस्तावित महारैली और SIR मुद्दे पर विपक्ष को एकजुट करने की रणनीति बनाई थी। इसी रणनीति के बीच केस दर्ज हो जाना कांग्रेस के राजनीतिक समीकरणों को उलझा ही नहीं रहा, बल्कि विपक्षी एकजुटता पर भी सवाल खड़े कर रहा है।

DMK, TMC और RJD जैसे सहयोगी दलों के खिलाफ भी कई मामलों में भ्रष्टाचार के आरोप हैं, ऐसे में यह साफ नहीं है कि वे संसद में कांग्रेस के साथ खड़े होंगे या दूरी बना लेंगे। राजनीतिक संकेत यह कह रहे हैं कि सरकार सत्र को मजबूती से आगे बढ़ाना चाहेगी, जबकि कांग्रेस को न सिर्फ विपक्ष बल्कि अपनी आंतरिक एकजुटता भी बनाए रखने की चुनौती रहेगी।

कुछ दबी आवाजें, कुछ तीखे सवाल — कांग्रेस को अब निर्णायक रणनीति चाहिए

राजनीति में सहानुभूति और संगठन दोनों का संतुलन जरूरी होता है। गांधी परिवार पर कानूनी दबाव के बाद पार्टी के भीतर संवेदना तो दिख रही है, पर रणनीति और आक्रामकता का अभाव बड़ा खतरा बन सकता है। पार्टी के लिए यह समय किसी भी तरह की अंदरूनी कलह को खत्म करके गठबंधन की राजनीति, जनसंदेश और नैरेटिव की एक सामंजस्यपूर्ण योजना तैयार करने का है।

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राजनीतिक तस्वीर साफ है — संसद का यह सत्र कांग्रेस के लिए सिर्फ बहस की नहीं, बल्कि अस्तित्व और नेतृत्व सिद्ध करने की लड़ाई बन चुका है।



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क्या नेशनल हेराल्ड केस संसद सत्र को प्रभावित करेगा?
हां, विपक्ष के तेवर और कांग्रेस की रणनीति पर इसका साफ असर पड़ेगा। यदि फैसला प्रतिकूल आता है तो सत्र के दौरान राजनीतिक तापमान और बढ़ सकता है।
क्या विपक्षी दल कांग्रेस का साथ देंगे?
फिलहाल तस्वीर स्पष्ट नहीं है। DMK, TMC और RJD जैसे दल सत्र के दौरान अपने राजनीतिक हित और मौजूदा माहौल देखकर ही रणनीति तय करेंगे।
16 दिसंबर के फैसले का कितना असर पड़ेगा?
16 दिसंबर के फैसले से न सिर्फ कांग्रेस नेतृत्व, बल्कि 2026 की राजनीतिक दिशा और विपक्षी गठबंधनों की ताकत पर भी बड़ा असर पड़ सकता है।

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