google.com, pub-2721071185451024, DIRECT, f08c47fec0942fa0
संपादकीय

कश्मीर में कितना खून बहेगा?

अनिल अनूप

‘‘गीली मेहंदी रोई होगी छुपकर घर के कोने में

ताजा काजल छूटा होगा चुपके-चुपके रोने में

जब बेटे की अर्थी आई होगी सूने आंगन में

शायद दूध उतर आया हो बूढ़ी मां के दामन में।’’

जांबाज सैनिकों की इतनी शहादत मई, 2020 के बाद हुई है और करीब 17 सालों के बाद पुंछ इलाके ने ऐसी भयावह मुठभेड़ देखी-सुनी है। जम्मू-कश्मीर के पुंछ इलाके में सेना और सुरक्षा बलों का ऑपरेशन तब तक जारी रहेगा, जब तक आतंकियों और उनके स्थानीय मुखबिरों का सफाया नहीं हो जाता। 3 मई, 2020 के आतंकी हमले में हमारे 5 सैनिक शहीद हुए थे। सोमवार के आतंकी हमले में भी एक जूनियर कमीशंड अफसर (नायब सूबेदार) समेत 5 रणबांकुरों ने शहादत दी है। बीते डेढ़ साल के दौरान यह सबसे बड़ी शहादत है। हमारे राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व को कुछ एहसास हुआ होगा कि कश्मीर में आतंकवाद लगातार रंग बदल रहा है, लिहाजा रणनीति पर नए सिरे से मंथन करना होगा। इन विकल्पों को लेकर भी विमर्श करना होगा कि एक और स्ट्राइक कब और कहां की जानी चाहिए, बेशक युद्धविराम घोषित है और हमारे हाथ बंधे हैं। युद्धविराम पाकिस्तान के लिए भी जिम्मेदार मुद्दा होना चाहिए। हमारे रक्षा विशेषज्ञों के आकलन हैं कि युद्धविराम के कारण पाकिस्तान को औसतन हररोज़ 1500 करोड़ रुपए का फायदा हो रहा है। भारत को जो भी निर्णायक फैसला लेना है, वह युद्धविराम के बावजूद लेना होगा।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवादियों के खिलाफ चल रहे अभियान के दौरान घात लगाकर किए गए हमले में 5 जवानों की शहादत इस बात का स्पष्ट संकेत दे रही है कि सुरक्षा बलों की तमाम कोशिशों के बावजूद आतंकवाद की जड़ें अभी कमजाेर नहीं पड़ी हैं। मुठभेड़ में शहीद जसविन्द्र सिंह, मनदीप सिंह, सरज सिंह, गज्जन सिंह और वैशाख एच शामिल हैं। शहीद गज्जन सिंह सेना की 23 सिख रेजिमेंट में तैनात थे। अभी 4 महीने पहले ही उनकी शादी हुई थी। शहीद की पत्नी हरप्रीत कौर के हाथों में लाल मेहंदी का रंग भी अभी फीका नहीं हुआ था। गज्जन सिंह दस दिनों की छुट्टी पर अपने गांव आने वाले थे कि उनकी शहादत की खबर आ गई। गज्जन सिंह अपनी दुल्हन हरप्रीत कौर को ट्रैक्टर पर लेने आए थे। अब उनके परिवार का क्रन्दन सुनकर गांव वालों का कलेजा फट रहा है। ऐसा ही शोकाकुल माहौल अन्य शहीद जवानों के परिवारों का भी है। राष्ट्र फिर आक्रोश में है, देेशवासियों का धैर्य फिर टूट चुका है। आखिर कब तक हम पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद झेलते रहेंगे? कश्मीर में कितना खून बहेगा? माएं कब तक अपने बेटों की शहादत देती रहेंगी?जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खात्मे को लेकर जारी कोशिशें जब भी सार्थक मानी जाने लगती हैं, तब-तब आतंकी गिरोह ऐसे हमलों को अंजाम दे देते हैं। वह दुनिया को बताना चाहते हैं कि जम्मू-कश्मीर आतंकवाद मुक्त होने नहीं जा रहा।इससे पहले आतंकवादियों ने श्रीनगर के ईदगाह इलाके में स्कूल में घुसकर स्कूल प्रिंसिपल सुपिन्दर कौर और उसी स्कूल के शिक्षक दीपक चंद की गोली मार कर हत्या कर दी। इससे पहले एक प्रख्यात कैमिस्ट मक्खन लाल बिंद्रू की गोली मार कर हत्या की गई थी। प्रिंसीपल सुपिंदर कौर और शिक्षक दीपक चंद की हत्या से पहले उनके आई कार्ड देखकर उनकी शिनाख्त पुख्ता की। इन हत्याओं में शहीद किए गए कैमिस्ट और अध्यापक जैसे नोबल पेशे से जुड़े लोगों की हत्या कर देना, जिनका जीवन हर कश्मीरी के जीवन को सुधारने, समाज के लिए समर्पित था, एक सिख महिला शिक्षिका जो घाटी में सिखों को ही नहीं बल्कि हिन्दुओं, मुस्लिमों को सभी को ज्ञान का प्रकाश बांटती थीं, ऐसे निहत्थे लोगों को जान से मार देना यह आखिर कैसा युद्ध अथवा जिहाद है?वास्तव में आतंकवाद की जटिल समस्या की जड़ें सीमा पार से संचालित हो रही हैं। भारत के अलावा वैश्विक मंचों पर भी ऐसे सवाल लगातार उठाए जाते रहे हैं कि पाकिस्तान स्थित ठिकानों से आतंकवादी गतिविधियां संचालित करते हैं। अफगानिस्तान में पाकिस्तान की आईएसआई और उस द्वारा समर्पित आतंकी संगठनों की कामयाबी के बाद उसने अपनी ताकत कश्मीर में झोंक दी है। उन्होंने घाटी को लहूलुहान करना शुरू कर दिया है। जब से जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया तब से कश्मीर में उथल-पुथल की आशंकी थी लेकिन सुरक्षा बलों ने काफी हद तक शांति स्थापित कर दी थी। कश्मीर में शांति पाकिस्तान को हजम नहीं हुई। अब उसने डबल गेम खेलनी शुरू कर दी है। आतंकवादियों ने चुन-चुन कर सिखों और हिन्दुओं की हत्याएं करनी शुरू कर दी हैं। ये सिलसिलेवार टारगेट किलिंग एक चुनौती है कि आतंकवादी कश्मीर में हिन्दुओं की मौजूदगी नहीं चाहते। पाकिस्तान 90 के दशक का माहौल पैदा करने की कोशिश कर रहा है, तब लाखों कश्मीरी पंडितों को उनकी जन्मभूमि से बाहर कर दिया गया था। दहशत का माहौल पैदा करने की कोशिश की जा रही है। 14 सितम्बर, 1989 को भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष टिक्कू लाल टपलू की हत्या से कश्मीर में शुरू हुआ आतंक का दौर समय के साथ-साथ और विभत्व होता गया। टिक्कू की हत्या के महीने भर बाद भी जे.के.एल.एफ. नेता मकबूल बट्ट को मौत की सजा सुनाने वाले सेवानिवृत्त सैशन जज नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई और फिर 13 फरवरी,1990 को श्रीनगर के टेलीविजन केन्द्र के निदेशक लासा कौल की निर्मम हत्या के साथ ही आतंक अपने चरम तक पहुंच गया था। घाटी में शुरू हुए आतंक ने धर्म को हथियार बनाया और निशाने पर लिए गए कश्मीरी पंडित। खुलेआम पोस्टरबाजी कर कश्मीरी पंडितों को घाटी खाली करने या फिर मारने की धमकियां दी जाने लगीं। जिन मस्जिदों के लाऊडस्पीकरों से कभी इबादत की आवाज सुनाई देती थी उन लाउडस्पीकरों से कश्मीरी पंडितों के लिए जहर उगला जाने लगा। लगातर तीन दिन तक इन पर नारा लगाया जाता रहा-‘‘यहां क्या चलेगा निजाम ए मुस्तफाआजादी का मतलब क्या ला इल्लाह इलल्लाह।’’फिर शुरू हुआ कश्मीरी पंडितों का घाटी से पलायन। कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी हो गए। यद्यपि सुरक्षा बल जवानों की शहादत का बदला आतंकवादियों को मार कर ले रहे हैं लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि हमारे जवानों का खून कब तक बहता रहेगा। गृहमंत्री अमित शाह,राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और सुरक्षा एजैंसियों से जुड़े प्रमुखों ने आतंकवादियों को सबक सिखाने के लिए नई रणनीति पर ​विचार किया है और आतंकवाद को मूल स्रोतों से काटने की तैयारी कर ली है। भारतीयों को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पर पूरा भरोसा है। राष्ट्र महसूस करता है कि भले ही भारत और पाकिस्तान सीमाओं पर युद्ध विराम को सहमत है लेकिन ऐसे युद्ध विराम का कोई फायदा नहीं है। क्या पाकिस्तान पर एक और सर्जिकल स्ट्राइक या फिर युद्ध का समय आ चुका है। उम्मीद है कि यह फैसला सही समय पर राजनीतिक नेतृत्व करेगा।

भारत के पास आतंकवाद के खिलाफ सभी प्रमाण और साक्ष्य मौजूद हैं, लिहाजा युद्धविराम के बावजूद संकोच नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यह राष्ट्रीय सरोकार का मसला है। एक-एक सैनिक की शहादत राष्ट्रीय क्षति है। करीब 17 साल पहले 2004 में आतंकियों के खिलाफ इतनी प्रहारक और भयावह मुठभेड़ की गई थी कि आतंकवाद को रास्ता भूलना पड़ा था। उसके बाद पुंछ इलाके में इतना बड़ा आतंकी हमला नहीं किया जा सका। हालांकि उस मुठभेड़ी कार्रवाई में भी हमारे 4 सैनिकों को ‘सर्वोच्च बलिदान’ देना पड़ा। बहरहाल इस बार पाकिस्तान ने आतंकियों की रणनीति में बदलाव किया था। चूंकि जम्मू-कश्मीर में आतंकी गुटों के लगभग सभी प्रमुख कमांडर ढेर किए जा चुके थे और स्थानीय लड़ाकों को भर्ती से बचाया जा रहा था, उन्हें समझाया जा रहा था, लिहाजा काडर की कमी आतंकी गुट महसूस कर रहे थे। कश्मीर में मौसम ठंडा होने लगा है, लिहाजा बर्फबारी से पहले ही आतंकी हमलों की गति तेज करने के मद्देनजर पाकिस्तान ने ‘पार्ट टाइम आतंकियों’ को मोटी रकम की पेशकश की और सिर्फ एक हमला करने की हिदायत दी थी। हमारी मिलिट्री इंटेलीजेंस ने ऐसे संवादों को इंटरसेप्ट किया था और उसी के मुताबिक रणनीति तैयार की थी। आतंकियों ने एक साथ पुंछ, अनंतनाग, बांदीपोरा और शोपियां के इलाकों में हमले किए, लिहाजा सेना को भी मुठभेड़ सभी जगह एक साथ करनी पड़ी। यह लिखते हुए ख़बर आई थी कि मंगलवार को शोपियां में एक और मुठभेड़ शुरू करनी पड़ी और दो आतंकियों को घेरा गया है। इन हमलों में कुल कितने आतंकी ढेर किए गए, यह इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना चिंताजनक पहलू यह है कि इन मुठभेड़ों में हमारे जवान शहीद होते रहे हैं। अभी पुंछ इलाके की मुठभेड़ के पूरे ब्यौरे सार्वजनिक होने शेष हैं।

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने जम्मू-कश्मीर में जिन 16-18 स्थानों पर छापेमारी कर लोगों को गिरफ्तार किया है, उन्होंने ऐसे खुलासे किए हैं। उनकी निशानदेही पर ही दिल्ली के लक्ष्मीनगर इलाके से एक पाकिस्तानी आतंकी अशरफ अली को पकड़ा गया है। उसके पास से ए.के.-47, आधुनिक पिस्टल, 60 राउंड गोलियां, ग्रेनेड आदि हथियार बरामद किए गए हैं। त्योहारों के इस मौसम में राजधानी को दहलाने की साजि़श पर काम चल रहा था। वह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लगातार संपर्क में था। उसके पास से फर्जी भारतीय पासपोर्ट भी बरामद किया गया है। आतंकवाद का यह विस्तार, यकीनन, बेहद चिंताजनक है। जो मुखबिर कश्मीर में और उसके बाहर पकड़े गए हैं, उन्हें भी कठोर दंड दिया जाना चाहिए, ताकि उनकी जमात सबक सीख सके। हम सरहदों वाले इलाकों को पूरी तरह बंद नहीं कर सकते। यह व्यावहारिक और संभव नहीं है, घुसपैठ एक निरंतर समस्या बनी रहेगी, लिहाजा सरकार और सेना को एक और स्ट्राइक, बेशक कई बार, करनी चाहिए।

Tags

samachar

"ज़िद है दुनिया जीतने की" "हटो व्योम के मेघ पंथ से स्वर्ग लूटने हम आते हैं"

2 Comments

  1. बिल्कुल सही पाकिस्तान को और मुखबिरों को कठोर दंड मिलना चाहिए। अब समय चुप रहने का नहीं है।

  2. समय कठोर निर्णय लेने का है। सैनिकों के रक्त की एक-एक बूंद का हिसाब आतंकियों की मौत से लिया जाना चाहिए। घटनाओं को अंजाम देकर घरों में आम नागरिक की तरह रह रहे इन आतंकियों को खोज-खोज कर मारना होगा। पूरी घाटी में यही करना होगा। आपने संपादकीय से देश के जगा दिया है। बधाई

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
Close
Close