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“हिंग्लिश” होती “हिंदी” पाठशालाओं में पा रही है सज़ाएं…

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प्रकाश झा

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सत्य है कि संवैधानिक रूप से हिंदी भारतवर्ष की प्रथम राजभाषा है। यह भी ठीक है कि यह भाषा देश में सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है। हिंदी की अपनी अलग खूबियां तथा विशेषताएं हैं। संसार की सभी उन्नत भाषाओं में हिंदी सबसे अधिक व्यवस्थित भाषा है। यह सबसे सरल तथा लचीली भाषा है। इस भाषा में सभी भाषाओं के शब्दों को आत्मसात करने की क्षमता है। इसके अधिकतर नियम अपवाद रहित है।

हिंदी लिखने के लिए प्रयुक्त देवनागरी लिपि अत्यंत वैज्ञानिक है। यह भाषा देशी भाषाओं एवं अपनी बोलियों आदि से शब्द लेने में भी संकोच नहीं करती। भारतवर्ष में हिंदी बोलने एवं समझने वाली जनता 80 करोड़ से भी अधिक है। साहित्यिक दृष्टि से हिंदी एक समृद्ध भाषा है। यह भाषा आम बोलचाल, व्यावहारिकता, भावनात्मकता तथा रूह से जुड़ी भाषा है। हिंदी कभी भी राज्याश्रय के लिए मोहताज नहीं रही। इस भाषा ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को भाषायी दृष्टि से जोडऩे और आंदोलन को गति देने के लिए अतुलनीय कार्य किया है। देश-प्रेम के तराने इस भाषा में गाए जाते हैं। यह भारत को जोडऩे के लिए एक संपर्क भाषा है। हिंदी संपूर्ण भारतवर्ष को एकता तथा अखंडता के एक सूत्र में पिरोने का काम करती है। इसमें कोई संदेह नहीं है।

ज्ञान के प्रवचन, फिल्मी तराने, भजन, गीत, आकाशवाणी, दूरदर्शन तथा टीवी चैनलों की भाषा, अखबारों की भाषा, पाठशालाओं में शिक्षण की भाषा, मानवीय भावनाओं के संप्रेषण तथा जनसंचार के लिए यह भाषा सर्वश्रेष्ठ है। परंतु बदलते परिवेश में अब ज्ञान-प्रवचन भी आंग्ल भाषा में हो रहे हैं। आम बोलचाल की भाषा अब हिंदी या इंग्लिश न रहकर हिंग्लिश हो गई है। वर्तमान में भारतीय पाठशालाओं में प्रारंभिक शिक्षा से ही बच्चों के हिंदी बोलने पर अंकुश लगाया जाता है। विद्यार्थियों को हिंदी बोलने पर जुर्माना किया जाता है। उन्हें सज़ा दी जाती है, कान पकडऩे को कहा जाता है। पाठशालाओं के परिसरों में हिंदी बोलने पर चेतावनी दी जाती है। अंग्रेज़ी बोलने पर बच्चों के अभिभावक तथा अध्यापक प्रसन्न होते हैं तथा गौरवान्वित महसूस करते हैं। यह हिंदी भाषा का दुर्भाग्य है, लेकिन है सत्य और वास्तविकता से परिपूर्ण। हिंदी भाषा हमारे व्यवहार में तो है, लेकिन हम उसकी सत्ता को स्वीकार करने में अपने आप को तुच्छ समझते हैं। यह भी सत्य है कि अंग्रेज़ी भाषा वैश्विक स्तर पर ज्ञान-विज्ञान तथा व्यवसाय के व्यवहार के लिए अंतरराष्ट्रीय भाषा बन चुकी है तथा यह आवश्यक भी है।

भाषाओं के विवाद में अंग्रेज़ी सीखना कोई बुरी बात नहीं है। वैश्विक दौर में जहां पूरा विश्व एक व्यावसायिक बाज़ार बन गया हो, वहां पर दूसरी भाषाओं को सीखना तथा जानना भी अति आवश्यक है। भारतीय परिवेश में हिंदी का प्रचार-प्रसार या हिंदी बोलने, समझने तथा लिखने वाले लोगों में किस तरह बढ़ोतरी हो, यह आवश्यक है। भारतीय शिक्षा, समाज और वैश्विक संस्कृति का आकलन करने पर यह प्रतीत होता है कि हिंदी के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेज़ी का बढ़ता प्रभाव है। सरकार का अधिकतर कामकाज अंग्रेज़ी में होता है। भारतवर्ष में हिंदी तथा ग़ैर हिंदी क्षेत्रों में अंतराल पैदा करके राजनीतिक स्तर पर अंग्रेज़ी के प्रयोग का मार्ग प्रशस्त होता रहा है। संभ्रांत परिवारों तथा समाज में पूरा वार्तालाप और गंभीर आदान-प्रदान अंग्रेज़ी में होता है। साहित्य में भी अस्सी के दशक से भारतीय उपन्यास, नाटक और काव्य लेखन का कार्य भी अंग्रेज़ी में हो रहा है। फिल्म जैसे लोकप्रिय माध्यम में भी अंग्रेज़ी इस तरह घुस आई है कि हिंदी फिल्मों के शीर्षक भी अब अंग्रेज़ी में आने लगे हैं। हिंदी मात्र नाम की राजभाषा बनकर रह गई है।

यहां ये पंक्तियां उद्धृत करना समीचीन होगा

हिंदी के कर्ता-धर्ता सब बनकर पांडव दूर खड़े हैं।
हिंदी प्रेमी दरबारी सब बंधे हाथ मजबूर खड़े हैं।
इज्जत सारी दांव लग गयी, स्थिति है गंभीर।
अंधा राजा, सभा है बहरी, किसे सुनाए पीर।।

पदवी है महरानी की पर दासी सा व्यवहार।
हिंदी सहती देश में अपने कितना अत्याचार।
कहाँ गए अब किशन कन्हाई, कौन बढ़ाये चीर।

लेखक समाचार दर्पण 24 के समाचार संपादक हैं।

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